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आधारभूत चिंतन : देश-काल-तत्त्व

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 डॉ. विकास मानव

     देश और काल के सम्बन्ध में हम लोगों का जो ज्ञान है, वह बहुत सीमित और संकुचित है। हम लोग प्रायः इस स्थूल देश को ही देश और युग, वर्ष आदि स्थूल काल को ही काल समझते हैं। इनकी गहराई में नहीं जाते।

       देश क्या वस्तु है, उसका मूल स्वरूप क्या है, समय या काल क्या वस्तु है और उसका मूल स्वरूप क्या है, इसे ठीक-ठीक हृदयंगम कर लेने पर देश और काल विषयक हमारा अधूरा ज्ञान बहुत अंशों में पूर्ण हो सकता है और हमारी दृष्टि सीमित देश और परिमित कालसे  परे पहुँच जा सकती है। 

विचारणीय विषय यह है कि हम जिस आकाशादि को देश और युग, वर्ष, मास, दिन आदि को काल समझते हैं, वह देश – काल तो प्रकृति से उत्पन्न है और प्रकृति के अन्तर्गत है; परंतु महाप्रलय के समय जब यह कार्यरूप सम्पूर्ण जगत् अपने कारणरूप प्रकृति में लय हो जाता है, उस समय देश – काल का क्या स्वरूप होता है ? वह देश-काल प्रकृतिका कार्य होता है या कारण ? 

     इस प्रश्नपर विचार करने से यह प्रतीत होता है कि स्थूल देश-काल जिस प्रकृतिरूप देश-काल में लय हो जाता है, वह प्रकृतिरूप देश-काल तो प्रकृति का स्वरूप ही है और इस प्रकृति का जो अधिष्ठान है अर्थात् यह प्रकृति अपने कार्य सम्पूर्ण जड़ दृश्यवर्ग के लय हो जाने के बाद भी जिसमें स्थित रहती है, वह अधिष्ठान प्रकृति का कार्य कभी नहीं हो सकता।

      वह तो सबका परम कारण है और सबका परम कारण वस्तुतः एकमात्र विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही है। उस विज्ञानानन्दघन परमात्मा के किसी अंश में मूल प्रकृति या माया स्थित है। वह प्रकृति कभी साम्यावस्था में रहती है और कभी विकार को प्राप्त होती है। जिस समय वह साम्यावस्था में रहती है, उस समय अपने कार्य समस्त जड़ दृश्यवर्ग को अपने में लीन करके परमात्मा के किसी एक अंश में स्थित रहती है.  जिस समय वही परमात्मा के सकाश से विषमता को प्राप्त होती है, उस समय उससे, परमात्मा की अध्यक्षता से संसार का सृजन होता है।

     सांख्य और योग के अनुसार सत्त्व, रज और तम – ये तीनों गुण प्रकृति के स्वरूप हैं, परंतु गीता आदि वेदान्त शास्त्रों के अनुसार ये प्रकृति के कार्य हैं। 

“गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।”

        (गीता १४।५)

“विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥”

   ( गीता १३।११)

  प्रकृति में विकार होने पर पहले सत्त्वगुण की उत्पत्ति होती है, फिर रजोगुण की और उसके बाद तमोगुण की। सत्त्वगुण से बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियाँ, रजोगुण से प्राण और कर्मेन्द्रियाँ तथा तमोगुण से पंच स्थूल भूतों की उत्पत्ति हुई है।

      इन्हीं भूतों में आकाश है और यही आकाश हमारे इस व्यक्त स्थूल देश का आधार है। इसी प्रकार हमारा युग, वर्ष, मास, दिन आदिरूप स्थूल काल भी प्रकृति से प्रादुर्भूत है। यह देश – काल का स्थूल रूप है। यह जड़ और अनित्य है। सबका अधिष्ठान होने से परमात्मा ही सबको सत्ता और स्फूर्ति देता है, इस प्रकार वह समस्त ब्रह्माण्ड में प्रत्येक वस्तु में व्याप्त होने पर भी इस स्थूल देश-काल से और इस देश काल के कारणरूप प्रकृति से भी परे है।

         स्थूल देशकाल को तो हमारी इन्द्रियाँ और मन समझ सकते हैं, परंतु सूक्ष्म देश-काल तक उनकी पहुँच नहीं है। महाप्रलय के समय प्रकृति जिस परमात्मा में स्थित रहती है और जबतक स्थित रहती है, वह अधिष्ठानरूप देश और काल वास्तव में परमात्मा ही है। वही मूल महादेश और महाकाल है।

     वह चेतन, उपाधिरहित, नित्य, निर्विकार और अव्यभिचारी है। वह काल का भी महाकाल और देश का भी महादेश है. सारे काल और देश एक उसी में समा जाते हैं।

     परमात्मा का यह नित्य सनातन, शाश्वत और चिन्मय स्वरूप ही देश-काल का आधार है। यह सदा- सर्वदा एकरस है। अव्याकृति मूल प्रकृति महाप्रलय के समय इसी परमात्मारूप देश-काल में रहती है। हमारी बुद्धि में आने वाला यह माया रचित जड़ और अनित्य देश-काल तो बुद्धि का कार्य है और बुद्धि के अन्तर्गत है। बुद्धि स्वयं माया का कार्य है।

     इस माया के स्वरूप को बुद्धि नहीं बतला सकती; क्योंकि यह बुद्धि से परे है। बुद्धि का कारण है। इस माया के दो रूप माने गये हैं- एक विद्या, दूसरा अविद्या। समष्टिबुद्धि विद्यारूपा है और जिसके द्वारा बुद्धि मोह को प्राप्त हो जाती है, वह अज्ञान ही अविद्या है।        

      अस्तु, उपर्युक्त विवेचन के अनुसार देश-काल के ये तीन भेद होते हैं- 

१ – नित्य महादेश या नित्य महाकाल।

२- प्रकृतिरूप देश या प्रकृतिरूप काल। 

३-प्राकृत यानी प्रकृतिका कार्यरूप स्थूल देश या स्थूल काल।

     इनमें पहला चेतन, नित्य, अविनाशी, अनादि और अनन्त है। शेष दोनों जड़, परिवर्तनशील, अनादि और सान्त हैं।

जिसको सनातन, शाश्वत, अनादि, अनन्त, कालस्वरूप, नित्य, ज्ञानस्वरूप और सर्वाधिष्ठान कहते हैं : निर्विकार परमात्माका वह स्वरूप ही मूल नित्य महादेश और महाकाल है।

      महाप्रलय के बाद जितनी देर प्रकृति की साम्यावस्था रहती है, वही प्रकृतिरूप काल है और अपने कार्यरूप समस्त स्थूल दृश्य वर्ग को धारण करने वाली होने से यह कारणरूपा मूलप्रकृति ही प्रकृतिरूप देश है।

     आकाश, दिशा, लोक, द्वीप, नगर और कल्प, युग, वर्ष, अयन, मास, दिन आदि स्थूल रूपों में प्रतीत होने वाला प्रकृतिका कार्यरूप यह व्यक्त देश-काल ही स्थूल देश और स्थूल काल है।

    इस कार्यरूप देश या स्थूल काल की अपेक्षा तो बुद्धि की समझ में न आने वाला प्रकृतिरूप देश-काल सूक्ष्म और पर है; और इस प्रकृतिरूप देश-काल से भी वह सर्वाधिष्ठान रूप देश-काल अत्यन्त सूक्ष्म और परम श्रेष्ठ है; जो नित्य, शाश्वत, सनातन, विज्ञानानन्दघन परमात्मा के नाम से कहा गया है।

      वस्तुतः परमात्मा देश-काल से सर्वथा रहित है, परंतु जहाँ प्रकृति और उसके कार्यरूप संसार का वर्णन किया जाता है, वहाँ सबको सत्ता-स्फूर्ति देने वाला होने के कारण उस सबके अधिष्ठानरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा को ही देश-काल बतलाया जाता है। संक्षेप में यही देश- काल तत्त्व है।

Ramswaroop Mantri

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