-राकेश दुबे
भारत में मनाये जाने वाले बड़े त्योहारों में दशहरा निकल गया, दीवाली करीब है| इनके बीच बीता अक्तूबर २०२१ शुरुआत से अब तक महंगाई के बड़े कारक डीजल-पेट्रोल की दरों में वृद्धि के साथ बीता है और आगे भी कोई राहत दिखने के आसार नहीं हैं।अब हिसाब जोड़िए कि महंगाई कम हो रही है या बढ़ रही है? सरकार और सरकारी पैरोकारों की मानेंगे, तो यह घटती दिखेगी और इसके समर्थन में तर्क भी मिल जाएंगे ,लेकिन ठीक से समझे , तो दीवाली के साथ आम आदमी का दीवाला पिटता दिख रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने दुनिया की आर्थिक तरक्की के जो अनुमान जारी किए हैं, उन्हें समझकर कुछ लोग ढोल पीट रहे हैं कि भारत का विकास दुनिया में सबसे तेज होने वाला है। वे बेचारे यह समझ नहीं रहे कि मुद्रा कोष ने इन आंकड़ों के साथ एक चेतावनी भी है, और वह चेतावनी महंगाई का ही खतरा दिखा रही है। बेशक, भारत का रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति में कह चुका है कि अगले तीन महीनों में महंगाई काबू में रहने के ही आसार दिख रहे हैं। लेकिन मुद्रा कोष की चेतावनी तीन महीनों से आगे की है। जो साफ कह रही है कि अगले साल के मध्य तक दुनिया भर में महंगाई की दर कोरोना से पहले के स्तरों पर पहुंच जाएगी। इसका मुकाबला करने के लिए जल्द ही एहतियाती कदम उठाने की जरूरत है। इसके साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का यह भी साफ किया है कि महंगे पेट्रोल और डीजल का बाकी हर चीज की महंगाई पर थोड़ा असर पड़ता है, लेकिन वही काफी है। दूसरे शब्दों में, कच्चे तेल के दामों में आ रही तेजी और उससे भारत में महंगाई बढ़ने की आशंका को नजरंदाज करना दुस्साहस ही कहा जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अप्रैल२०२१ में कहा था कि चालू साल में भारत की महंगाई दर ४.९ प्रतिशत रह सकती है, लेकिन अब उसने इसे बढ़ाकर ५.६ प्रतिशत कर दिया है अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष । की रिपोर्ट में एक चिंताजनक बात यह भी दिखती है कि कोरोना संकट के दौरान जहां अमीर देशों में महंगाई दर काफी तेजी से और भारत जैसे विकासशील देशों या उभरती अर्थव्यवस्थाओं में कुछ कम रफ्तार से गिरी थी, वहीं गरीब देशों में यह बढ़ती ही रही, और इस वक्त जब दुनिया भर की अर्थव्यवस्था में सुधार की बात हो रही है, तब भी वहां की महंगाई सबसे तेज बढ़ रही है। उभरते बाजार अब उसके साथ मुकाबले में आ गए हैं और अमीर देशों में भी महंगाई का एक नया दौर शुरू होता दिख रहा है।
अमेरिका के अखबारों पर नजर डालें, तो दिखता है कि इस वक्त वहां महंगाई बहुत बड़ी चिंता बन चुकी है। पांच-साढ़े पांच फीसदी महंगाई का आंकड़ा भारत से देखने पर कम दिखता है, लेकिन अमेरिका में यह १० साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के भीतर भी इससे निपटने के मसले पर गंभीर मंत्रणा हो रही है।
दुनिया की खबर रखने वाले फेडरल रिजर्व को आशंका है कि जैसे ही नकदी की सप्लाई घटेगी, और शेयर बाजारों में दीवाली का माहौल भी खत्म हो जाएगा। यह महंगाई कुछ समय की बात है, ऐसा माननेवाला तो अब शायद ही कोई बचा हो। विद्वानों के एक तबका भी है, जिसका कहना है कि इस वक्त दुनिया भर में अर्थव्यवस्था की जो हालत है, उसमें सभी को थोड़ी और महंगाई झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। कोरोना संकट और उसके साथ लगे लॉकडाउन की वजह से दुनिया भर में आपूर्ति शृंखला बिखर चुकी थी। यही वजह है कि ज्यादातर उद्योगों में कच्चा माल या पुर्जे नहीं पहुंच पाए। दाम बढ़ने की वजह यही है कि कंपनियों का खर्च बढ़ गया है। और वह भी तब, जबकि वे किफायत के सारे रास्ते आजमा चुकी हैं। ऐसे में, दाम काबू करने का दबाव शायद बहुत से कारोबारों के लिए खतरनाक भी साबित हो सकता है।
दूसरी तरफ, उन गरीब देशों में करोड़ों की आबादी को देखिए, जो अमेरिका या यूरोप के मुकाबले तीन गुना रफ्तार से चढ़ती महंगाई की मार झेल रही है। मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं को इन सबकी भी फिक्र करनी है। शायद इसीलिए वे तरक्की की बात करने के साथ ही महंगाई के खतरे की तरफ भी आगाह करना जरूरी समझ रही हैं।





