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बांग्लादेश हो या नेपाल, क्यों सरकार जन-आक्रोश की भेंट चढ़ी

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सत्येंद्र रंजन

बांग्लादेश में अगस्त 2024 जन व्रिदोह हुआ। अगुआई छात्रों ने की, जिनके पीछे अवाम का बहुत बड़ा हिस्सा लामबंद हुआ। उन सबकी शिकायत थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद तानाशाह बन गई हैं, उन्होंने लगातार तीन आम चुनाव चुरा लिए, उनके शासनकाल में सिर्फ उनसे जुड़े लोगों का भला हो रहा है, सवाल पूछने वालों को सताया जाता है, इत्यादि। इन सबसे लोगों में असंतोष भरता गया और जब उसका विस्फोट हुआ, तो शेख हसीना को देश छोड़ कर भागना पड़ा।

उनकी पार्टी- अवामी लीग के जो लोग देश में रह गए, उन्हें लोगों का गुस्सा झेलना पड़ा। पांच अगस्त 2024 को शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद बनी अंतरिम सरकार ने अवामी लीग को प्रतिबंधित अवस्था में डाल दिया। 12 मई 2026 को हुए आम चुनाव में ये पार्टी भाग नहीं ले सकी। 

उपरोक्त घटनाओं से शेख हसीना, उनके परिवार और उनकी पार्टी से नाराज लोगों को तसल्ली मिली होगी। लेकिन अब जबकि नए चुनाव के नतीजे सामने हैं, तो विवेकशील लोग यह सोचने को मजबूर होंगे कि इतनी बड़ी उथल-पुथल से आखिर हासिल क्या हुआ? दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में लौटी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) में आखिर नयापन क्या है? पार्टी की स्थापना सैन्य तख्ता पलट के जरिए सत्ता में आए जनरल जियाउल रहमान ने की थी। उनकी हत्या के बाद उनकी पत्नी बेगम खालिदा जिया ने पार्टी की कमान संभाली और दो बार प्रधानमंत्री रहीं। अब उन दोनों के बेटे तारीक रहमान उस पद पर पहुंचे हैं। 

तो एक राजनीतिक परिवार को भगाने का परिणाम दूसरे राजनीतिक परिवार की सत्ता में वापसी के रूप में सामने आया है। अतीत में दोनों की पार्टियां महज उन परिवारों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को साधने का जरिया बनी रही हैं, जैसा कि दक्षिण एशिया के दूसरे देशों में भी होता रहा है। ये पार्टियां आर्थिक-सामाजिक निहित स्वार्थों की नुमाइंदगी करती हैं और असल में वे ही उनकी ताकत का आधार हैं। वे ताकतें अपनी राजनीतिक वफादारी वक्त के साथ बदलती रहती हैं। 

शेख हसीना अगर सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया को बाधित नहीं करतीं, तो संभव है कि 2014, 2019 या 2024 के किसी आम चुनाव में सत्ता बदल के आम चलन के तहत ही बीएनपी की सरकार बन गई होती। जन विद्रोह हुआ, तो इसलिए कि शेख हसीना ने अनुचित तरीके अपना कर चुनाव के जरिये सत्ता हस्तांतरण संभव नहीं होने दिया। तो क्या यह समझा जाए कि जिस जन विद्रोह में लगभग 1400 लोगों की जान गई, उसका मकसद सिर्फ बीएनपी को सत्ता में वापस लाना था?

उसी बीएनपी को, जिसके पास देश को नई दिशा देने या लोगों के जीवन स्तर में सुधार करने की कोई ठोस योजना नहीं रही है। असल में अपने अनुदार नजरिए और मजहबी कट्टरपंथ से अपने रिश्तों के कारण अतीत में वह अवामी लीग की तुलना में कामकाजी जनता के हितों के अधिक खिलाफ नजर आई है। 

अब हकीकत यह है कि बांग्लादेश की सियासत कंजरवेटिव बीएनपी और धार्मिक कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के बीच बंट गई है। बहस के मुद्दे बांग्लादेश के पुराने संविधान को कायम रखने या शरिया कानून से प्रभावित अधिक इस्लामी ढंग से शासन चलाने के बीच सिमट गए हैं। क्या ऐसे ही बदलाव की आकांक्षा लिए बांग्लादेश के छात्र शेख हसीना के खिलाफ लामबंद हुए थे? 

ये बड़े, लेकिन बेहद आम किस्म के सवाल हैं। ये प्रश्न हर उस देश में वैसी घटना के बाद उठते हैं, जब कोई तानाशाह या आम सरकार जन-आक्रोश की भेंट चढ़ जाती है- जैसा कि पिछले सितंबर में नेपाल में और 2022 के मध्य में श्रीलंका में हुआ था।

अब बांग्लादेश में विद्रोह का जो परिणाम हुआ है, उससे अलग सूरत नेपाल में नहीं होगी, जहां अगले पांच मार्च को आम चुनाव होना है। नेपाल में पिछले सितंबर में कथित जेन-जी प्रतिरोध ने इतना भीषण रूप ग्रहण किया कि तत्कालीन केपी शर्मा ओली सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। वहां भीड़ ने अनेक राजनेताओं की सरेआम पिटाई की और सत्ता के केंद्र एवं प्रतीक भवनों को जला दिया गया।

हालांकि प्रतिरोध सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर रोक लगाए जाने के खिलाफ शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही उसने जारी “राजनीतिक संस्कृति” के खिलाफ पूर्ण विद्रोह का रूप ग्रहण कर लिया। बताया गया कि नौजवान अपने लिए फैलती अवसरहीनता के बीच राजनेताओं और उनके बाल-बच्चों की आलीशान जिंदगी से नाराज थे, जिसका खुला इज़हार उन्होंने सड़कों पर उतर कर किया।

श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए ऐसे ही विद्रोह से नेपाल का घटनाक्रम इस मामले में ही अलग था कि वहां के सत्ताधारी राजनेता देश छोड़ कर नहीं भागे। कुछ समय के लिए वे पृष्ठभूमि में चले गए। इस दौरान एक नया प्रयोग यह हुआ कि जेनेरेशन-जेड के उभरे चेहरों ने सोशल मीडिया ऐप डिस्कॉर्ड के जरिए नई सरकार के मुखिया का चयन किया। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई। उसी कार्की सरकार की देख रेख में वहां चुनाव कराए जा रहे हैं। 

लेकिन चुनाव मुकाबले में फिर से वही चेहरे लौट आए हैं, जिन्हें हटाने के लिए जेन-जी और अन्य पीढ़ियों के लोगों ने उथल-पुथल मचाई थी। जो नया चेहरा सामने है, वह भी जेन-जी आंदोलन से नहीं उभरा। बल्कि उसके पहले सोशल मीडिया के जरिए बनी लोकप्रियता के आधार पर काठमांडू का मेयर बन चुका था। ये बालेन शाह हैं, जिन्होंने अपना करियर रैप म्यूजिक से निर्मित किया। रैपर के रूप में उन्होंने पारंपरिक राजनेताओं और राजनीति का मखौल उड़ाया।

इससे इतनी लोकप्रियता मिली कि नेपाल की राजधानी के लोगों ने उन्हें मेयर चुन लिया। मगर किसी को यह नहीं मालूम कि बालेन शाह के पास देश के विकास एवं जन कल्याण का क्या कार्यक्रम है? उनकी विचारधारा क्या है या देश के बारे में उनकी परिकल्पना क्या है? इसके बावजूद पिछले आम चुनाव में अचानक उभरी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया है। 

इस पार्टी की कथा भी अजीब है। इसकी स्थापना 2022 में हुई। इसके संस्थापक रवि लामिछाने हैं, जो पहले एक लोकप्रिय पत्रकार और टीवी होस्ट थे। पार्टी की विचारधारा के बारे में ज्यादा कुछ मालूम नहीं है, लेकिन 2022 के आम चुनाव में उसका भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडा लोकप्रिय हुआ, जिसे युवाओं का भारी समर्थन मिला। उस चुनाव में 21 सीटें जीत कर आरएसपी ने चौथी सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा पाया।  

गठबंधन की राजनीति में सत्ता का सुख भोगने के लिए इतनी सीटें काफी होती हैं, तो लामिछाने चुनाव के बाद बनी सरकार में गृह मंत्री बन गए। लेकिन उन पर सहकारी घोटाले में शामिल होने का आरोप लगा। यह मामला नेपाल में सहकारी संस्थाओं में जुड़ी वित्तीय हेरफेर और धोखाधड़ी से संबंधित था। मामला इतना भड़का कि लामिछाने को जेल जाना पड़ा। मगर जेन-जी आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने जेल पर धावा बोल कर रवि लामिछाने समेत 1500 से अधिक कैदियों को रिहा करा लिया। अब लामिछाने की पार्टी सत्ता के प्रमुख दावेदारों में शामिल होकर चुनाव लड़ रही है। 

चूंकि बालेन शाह की अपनी कोई पार्टी नहीं थी, तो वे आरएसपी में शामिल हो गए। चूंकि लामिछाने की छवि धूमिल हो गई थी, तो उन्होंने बालेन शाह को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया है। यानी यह सुविधा का रिश्ता है, मगर नेपाल में फिलहाल यही एक नया विकल्प है। बाकी पार्टियां वही हैं, जो राजशाही के खात्मे के बाद से सत्ता में भागीदार रही हैं। उन्होंने आपस में इतनी बार गठबंधन बनाए और तोड़े कि उसे एकबारगी से याद रखना शायद उनके लिए भी मुमकिन नहीं होगा! तो वही ओली  हैं, वही पुष्प कमल दहल हैं, और वही नेपाली कांग्रेस है- हालांकि पार्टी में विभाजन के बाद गगन थापा नेपाली कांग्रेस के नेता बन चुके हैं। पांच मार्च के बाद इन नेताओं से ही कोई एक प्रधानमंत्री बनेगा। 

मगर उससे नेपाल में क्या बदलेगा? राजकाज की शैली या राजनीतिक संस्कृति में क्या बदलाव आएगा? देश के विकास और लोगों के जीवन स्तर में क्या फर्क पड़ेगा? 

तजुर्बे के आधार पर इन सवालों की पड़ताल करनी हो, तो हम अपना ध्यान श्रीलंका की तरफ ले जा सकते हैं। श्रीलंका में 2022 में अरागलया नाम से हुए जन विद्रोह के कारण तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे को सपरिवार देश छोड़ कर भागना पड़ा था। उसके बाद लगभग दो साल तक वहां एक कार्यवाहक सरकार रही। सितंबर 2024 में नया चुनाव हुआ, तो श्रीलंका में कम-से-कम इतना तो ज़रूर हुआ कि एक ऐसा नया चेहरा उभरा, जिसकी ठोस राजनीतिक पृष्ठभूमि थी।

अनुरा कुमारा दिसानायके तब राष्ट्रपति चुने गए, जो मार्क्सवादी- माओवादी जनता विमुक्ति पेरामुना से आए हैं। उनके मौजूदा दल नेशनल पीपुल्स पॉवर को भी वामपंथी माना जाता है। इसलिए दिसानायके की जीत को एक नए और बेहतर विकल्प तलाशने की जनता की आकांक्षा का प्रतीक समझा गया था।

लेकिन उनके डेढ़ साल के शासनकाल का अनुभव क्या है? श्रीलंका या उसके बाहर का शायद ही कोई मार्क्सवादी आज यह कहने की स्थिति में हो कि दिसानायके सरकार ने श्रीलंका को कोई नई दिशा दी है, अथवा उन्होंने वामपंथी सरकार चलाई है। अधिकतम उपलब्धि यही बताई जाती है कि दिसानायके प्रशासन ने देश को राजनीतिक स्थिरता प्रदान की है और सरकार से जुड़े लोगों पर अब तक भ्रष्टाचार के कोई गंभीर आरोप नहीं लगे हैं।

मगर इसे किसी रूप में वामपंथी उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता। दिसानायके ने आर्थिक नीतियों में कोई गुणात्मक या बुनियादी बदलाव नहीं किया, आईएमएफ की शर्तों के मुताबिक सरकार चलाने को सहज राजी हो गए, और इस क्रम में देश के बहुसंख्यक अवाम के जीवन स्तर में किसी बदलाव की उम्मीद उनसे नहीं बची है। 

दिसानायके को सिर्फ इतना श्रेय दिया जा सकता है कि उनके शासनकाल में श्रीलंका में राजनीतिक स्थिरता रही है और उन्होंने हालात को बदतर नहीं होने दिया। जबकि कई अन्य देशों का अनुभव ऐसा ही है, जहां जन विद्रोह के बाद बनी राजनीतिक व्यवस्था पहले से भी खराब साबित हुई। 2010 का दशक दुनिया में ऐसे प्रतिरोध और विरोध से भरा रहा। गौरतलब है कि 2011 में टाइम मैगज़ीन ने “The Protester” को पर्सन ऑफ ईयर घोषित किया था। इस चयन का कारण था कि उस वर्ष अरब स्प्रिंग, यूरोप और अमेरिका में हुए बड़े पैमाने पर जन आंदोलन हुए। 

अमेरिका और यूरोप में ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट मूवमेंट, ट्यूनिशिया, मिस्र, और कई अन्य अरब देशों में व्यापक उथल-पुथल उस वर्ष हुई थी। ट्यूनिशिया और मिस्र में उससे तख्ता पलट भी हुआ। लेकिन आज शायद ही कोई कह सकता है कि वहां हालात पहले से बेहतर हैं। 2010 के आंदोलनों का गंभीर अध्ययन लेखक विंसेट बेविन्स ने 2023 में प्रकाशित अपनी किताब If We Burn: The Mass Protest Decade and the Missing Revolution में किया है। उनके मुताबिक उस दशक में विश्वव्यापी स्तर पर जितने बड़े जन प्रतिरोध हुए, उतना संभवतः इतिहास में कभी नहीं हुआ।

मगर बेविन्स की दलील है कि विशाल पैमाने के बावजूद ज्यादातर आंदोलन अपने घोषित मकसदों को पाने में नाकाम रहे। टिकाऊ लोकतंत्र स्थापित करने या क्रांतिकारी बदलाव लाने के बजाय वे उथल-पुथल का जरिया भर बन कर रहे गए। आंदोलन थमने के बाद कई देशों में अधिक क्रूर तानाशाहियां कायम हुईं।

बेविन्स ने कहा है कि नेता-विहीन, विकेंद्रित और डिजिटल माध्यमों से आयोजित आंदोलन एक समय मजबूत दिख सकते हैं, लेकिन वे अपने उद्देश्य तक नहीं पहुंच पाते। यानी निष्कर्ष यह है कि बिना सुसंगठित ढांचे और स्पष्ट नेतृत्व के या तो आंदोलन बिखर जाते हैं या फिर उन्हें संगठित निहित स्वार्थी राजनीतिक ताकतें हथिया लेती हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल की घटनाओं की चर्चा बेविन्स की किताब में नहीं है, लेकिन हम आसानी से उन्हें भी उनके निष्कर्ष की पुष्टि करने वाले अन्य घटनाक्रम के रूप में देख सकते हैं।

तो चाहे बांग्लादेश हो या श्रीलंका या नेपाल- सवाल वही है। क्या बिना ऐसी संगठित पार्टी की मौजूदगी के- जिसके पास स्पष्ट विचारधारा और सुपरिभाषित संगठन हो- कोई ऐसा परिवर्तन हो सकता है, जिससे मूलभूत ढांचा बदले और आम जन के जीवन स्तर में सुधार का मार्ग प्रशस्त हो? विद्रोही जन समुदाय के अग्रिम दस्ते की भूमिका निभाने वाली पार्टी के अभाव में हुए हर हालिया जन विद्रोह का आखिरी परिणाम इस प्रश्न को और अधिक प्रासंगिक बनाता चला गया है। 

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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