सुसंस्कृति परिहार
देश में यूं तो सत्तालोलुप गद्दार लोगों की बड़ी जमात है जो पार्टी को कपड़ों की तरह बदल लेते हैं।ऐसे लोग आमतौर पर लोगों की नफ़रत का हिस्सा होते हैं किंतु राजनीति जब पंजे और कमल पर केंद्रित हो जाती है तो कष्टप्रद स्थिति बनती है।यदि ऐसे में भी कामयाबी नहीं मिलती नहीं दिखती तो बहुमत के करीब पहुंचा उन लोगों को अपनी ओर खींचता है जो बिकाऊ होते हैं तथा सत्ता का हिस्सा बन अपना विकास कर लेते हैं। बसपा जैसे छोटे दल तथा निर्दलीय आमतौर इसीलिए चुनाव लड़ते हैं जहां कांग्रेस या भाजपा कुछ अंतर से बहुमत में पीछे रह जाती है वहां ये अवसर की तलाश में रहते हैं ये अक्सर अपनी शर्तों पर मनोनुकूल काम पा भी जाते हैं।इस ओर युवा पीढ़ी ज्यादा अग्रसर होती हुई नज़र आ रही थी।
लेकिन अब तो इन दलों की यह रणनीति भी पिछले समय की बात हो गई।अब तो सत्तारुढ़ भाजपा ने एक नया सिस्टम विकसित किया है जिसमें उसकी नज़र सीधे कांग्रेस के विजयी उम्मीदवार पर होती है क्योंकि सबसे ज्यादा सत्ता का स्वाद इस पार्टी ने लिया था और स्वाभाविक है कि बिना सत्ता के उनकी सांसें थमने लगती है इसलिए उनकी खरीद-फरोख्त आसान हो जाती है।गोवा, कर्नाटक पूर्वांचल के राज्यों से शुरू हुआ यह सिलसिला इस कदर बढ़ा कि उसने मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पद ना मिलने से नाराज़ कांग्रेस के युवा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ एक लंबी फौज खड़ी कर भाजपा में प्रवेश कर कांग्रेस की बहुमत से बनी सरकार को पटकनी दे दी।इस घटना से ज्योतिरादित्य मुख्यमंत्री नहीं बन पाए किंतु राज्यसभा के द्वार उनके लिए खुल गए वे उड्डयन मंत्री बन ज़रुर बन गए।मगर सरकार पलटने के बाद उनकी साध पूरी नहीं हुई।
इस घटना का असर बुन्देलखण्ड के दो युवा कांग्रेसी विधायक राहुल सिंह और प्रद्युम्न सिंह पर हुआ उन्होंने भी भाजपा मुख्यमंत्री के आगे हथियार डाल दिए। उन्हें भी भाजपा ने उपकृत किया।इसके परिणाम ज्योतिरादित्य और राहुल सिंह,, प्रद्युम्न सिंह को झेलना पड़ा। राहुल सिंह जब उपचुनाव लड़े तो उन्हें दमोह विधानसभा क्षेत्र से अब तक कई बड़ी हार झेलनी पड़ी। ज्योतिरादित्य तो सांसद चुनाव हारे ही थे।आज इन युवाओं की गद्दारी के कारण तमाम चंबल और बुंदेलखंड क्षेत्र में इनकी थू थू हो रही है। बुंदेलखंड में तो यह आग लोधी समाज में इस तरह फैली कि संपूर्ण लोधी समाज अविश्वसनीय हो गया है कहा जा रहा है कि कोई भी पार्टी यदि लोधी समाज को टिकिट देती है अन्य तमाम जातियां एक जुट होकर उन्हें हारने बाध्य कर देंगी। संभवतः इसी स्थिति को भांपते हुए भाजपा के विरोध में काम करने वाले
पूर्व मंत्री जयंत मलैया के पुत्र सिद्धार्थ का निलंबन भी डी शर्मा ने खत्म करने की घोषणा की है।अब सिद्धार्थ को यदि टिकिट दे भी दिया जाए तो राहुल सिंह भाजपा के विरुद्ध जा सकते हैं।ठीक उसी तरह जैसे राहुल सिंह को टिकिट मिलने पर सिद्धार्थ ने भाजपा के विरोध में काम कर उसे हराने काम किया था।यदि राहुल सिंह रिपीट होते हैं तो फिर पुराना परिदृश्य दोहराया जाएगा इसमें दो मत नहीं।मतलब यह कि इन दोनों गद्दारों को दमोह विधानसभा क्षेत्र सबक सिखाने तैयार बैठी है। कांग्रेस के तो दोनों हाथों में लड्डू हैं।
उधर ज्योतिरादित्य अपने क्षेत्र में बुरी तरह घिरे हुए हैं उनके गृहनगर ग्वालियर में कांग्रेस का पिछले चुनाव में बैठ गया। उनके साथ जुड़े विधायकों का भी जनता गद्दारी को लेकर जगह जगह प्रतिरोध कर रही है।हाल ही में पता चला है कि चंबल क्षेत्र के विधायक और वर्तमान में विपक्ष के नेता गोविंद सिंह से पहली दफा ज्योतिरादित्य ने फोन पर बात की।बहाना था उनकी खराब तबियत का हाल चाल पूछने का लेकिन गोविंद सिंह ने उन्हें तवज्जो नहीं दी। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा मैं बीमार नहीं हूं सब ठीक है।यह इस बात का इशारा करता है बीमार तो ज्योतिरादित्य है भाजपा की डूबती नैया को देखते हुए अपने ज़मीर को फिर बेचने तैयार हो रहे हैं वरना यकायक गोविंद सिंह जैसे चंबल के कांग्रेस नेता से इस तरह कुशल क्षेम नहीं पूछी जाती।
आजकल युवा नेताओं में यह बीमारी बढ़ चली है वे में केन प्रकारेण सत्ता सुख हासिल करने बेताब नज़र आ रहे हैं उन्हें इन नेताओं से सबक सीखने की ज़रुरत है। राजनीति में स्थायित्व प्राप्त करने का यह चलन अब बंद होने जा रहा है क्योंकि मतदाता अब गद्दारों के आचरण से अपने आपको ठगा महसूस कर रहे हैं। कामयाबी के लिए सतत् काम की ज़रूरत है।अब वही जीतेगा जो विश्वसनीय होंगा। भविष्य पुख्ता करना है तो सत्तासुख के इस उतावलेपन को छोड़ना होगा।वरना जनता की नज़रों से उतरे लोग पुनः वापस नहीं आ पाते।





