-तेजपाल सिंह ‘तेज’
ये लेख एक वीडियो-पाठ के आधार पर तैयार किया गया जिसमें अशोक चित्रांशिया और अशोक वानखेड़ेLद न्यूज़ लॉन्चर) ने विस्तार से बताया है कि किस तरह CJI बी.आर. गवई पर ट्रोलिंग और महाभियोग जैसी माँगें सोशल मीडिया पर चल रही हैं। इसमें सबसे आपत्तिजनक हिस्सा वह है जहाँ मनुवादी ट्रोल्स ने गवई को “भीमटा” कहकर संबोधित किया है। अब, “भीमटा” शब्द केवल गवई का नहीं बल्कि सीधे तौर पर डॉ. भीमराव आंबेडकर और पूरे आंबेडकरवादी आंदोलन का अपमान है।
अशोक चित्रांशिया और अशोक बानखेड़े के अनुसार, क्या कोई भक्त चीफ जस्टिस बीआर गवई को सुप्रीम कोर्ट से निकाल देगा? क्या भक्तों की ज़िद गवई पर महाभियोग चलाकर ही रुकेगी? क्या मोदी सरकार संसद में गवई के खिलाफ कोई बड़ा प्रस्ताव लाएगी? ये तीन सवाल बेहद अहम हैं। और ये इसलिए अहम हैं क्योंकि इस देश में भस्मासुरों की संख्या बहुत बढ़ गई है।
एक भस्मासुर था जिसने पूरी दुनिया को खतरे में डाल दिया था। भगवान को भागना पड़ा था। और जब भस्मासुर सड़कों पर घूम रहे हों, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को नष्ट होने में कितना समय लगेगा। और जिस व्यवस्था से ये भस्मासुर पैदा होते हैं, वो व्यवस्था ही सुरक्षित नहीं है। हमने सोशल मीडिया पर इन्हीं भक्तों को मोदी के पीछे पड़ते देखा है। इन्हीं भक्तों ने मोहन भागवत को नहीं कोसा। उन्होंने सोशल मीडिया पर उनका अपमान किया। और इन्हीं भस्मासुरों ने नितिन गडकरी को सोशल मीडिया पर गालियाँ दीं। ये सब एक ही इकोसिस्टम से थे।
अब निशाने पर सुप्रीम कोर्ट है। और ये समझना ज़रूरी है कि सुप्रीम कोर्ट इसके लिए कितना ज़िम्मेदार है। ये एकतरफ़ा प्यार नहीं है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट भी ज़िम्मेदार है। आइए, हर पन्ना खोलें। स्वागत है। सुप्रीम कोर्ट से, मुख्य न्यायाधीश गवई का एक बयान आया था। खजुराहो में एक जवारी मंदिर है। इसमें भगवान विष्णु की मूर्ति उकेरी गई है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और ऑगस्टीन जी. मैसी ने इसे सुनने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह मामला अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। इस बीच, CJI गवई ने कहा, “अब आपको भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए। आप कहते हैं कि आप भगवान विष्णु के प्रबल भक्त हैं। तो अब आपको उनसे प्रार्थना करनी चाहिए।”
यही तो टिप है। सुप्रीम कोर्ट ने कितने ही भक्तों और अंधभक्तों पर हमला किया है। सुप्रीम कोर्ट चुप है। क्योंकि जब खामोशी पर खामोशी है, तो इन भक्तों के खिलाफ आवाज़ कैसे उठाओगे? ये झूठ है। मैं तुम्हें एक-एक करके दिखाऊँगा। आज X पर क्या हो रहा है? गवार गवई महाभियोग पहले, तुम देखो। बहुत सी तस्वीरों को देखने के साथ-साथ आप ऊपर हैशटैग भी देख सकते हैं। हैशटैग है “Impeach the CJI” CJI के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाने का ये अभियान शुरू हो गया है। “हाँ, ये देखो। ये देखो। हम अपनी संस्कृति को नष्ट नहीं होने देंगे। ‘गँवार गँवाई’ को सिखाना ज़रूरी है। तुम सिस्टम के गुलाम हो, हम नहीं।“
अशोक बानखेड़े कहते है कि इन ट्रोलों ने क्या आपने चार किताबें पढ़ी हैं।ये दुनिया को ग्यान बांटते फिरते हैं। “गंवार गवाई” हिंदू विरोधी, अगर आप गंवार गवाई लिखकर हमें बेवकूफ बनाना चाहते हैं, तो बात अलग है। गंवार गवाई हिंदू विरोधी यह लिखा जा रहा है। यह प्रशिक्षित किया जा रहा है।
ये देखो, एडवोकेट विनीत जिंदल। ये एक वकील हैं। उन्होंने राष्ट्रपति को एक पत्र लिखा है। राष्ट्रपति को दो पत्र भेजे गए हैं। मैंने जस्टिस बीआर गवई को एक पत्र लिखा है। जिसमें भगवान विष्णु और हिंदू आस्था के विरुद्ध अपनी अपील तुरंत वापस लेने की माँग की गई है। यह पत्र भारत के राष्ट्रपति को भी भेजा गया है। जाकर स्वयं भगवान से कहो कि कुछ करें। तो अब जाओ और प्रार्थना करो। जैसे शब्द बहुत अनुचित, असंवेदनशील और असंख्य भक्तों की आस्था के प्रति अनादरपूर्ण है। एडवोकेट विनीत जिंदल: भक्तों में अभिमान की कोई कमी नहीं है। ये मोदी जी के बहुत प्यारे दोस्त हैं।
देश को आज़ाद हुए 75 साल हो गए, लेकिन मानसिकता नहीं बदली। यही मानसिकता है इन लोगों की। इसीलिए बाबासाहेब आंबेडकर ने ‘भीमटा’ कहा था। उनके रास्ते में एक जगह है। आओ और भीमटा कहो। वानखेर्ड)ए जी यह भी कहते है — आप एक कमरे में बैठकर लैपटॉप पर भीमटा लिखिए। बाहर आकर किसी को भीमटा बोलकर दिखाइए। फिर ये अंबेडकर की सेना तुम्हें दिखाएगी कि भीमटा क्या है। बाबासाहेब अंबेडकर ने हिंदू धर्म का त्याग क्यों किया? इन कायरों की वजह से। इन ट्रोल लोगों की वजह से।
भारत की गंदी राजनीति और मनुवादी मानसिकता का असली चेहरा तब सामने आता है जब कोई दलित समाज से आया व्यक्ति सत्ता, न्याय या प्रतिष्ठा की ऊँचाई पर पहुँचता है। हाल ही में यह चेहरा एक बार फिर नंगा हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई को सोशल मीडिया पर “भीमटा” कहकर अपमानित किया गया।
यह केवल एक गाली नहीं है। यह उस आंबेडकरवादी विचारधारा पर हमला है जिसने मनुवाद की नींव हिलाई थी। यह संविधान और लोकतंत्र को नीचा दिखाने की कोशिश है।
अशोक चित्रांशिया और अशोक वानखेड़े: द न्यूज़ लॉन्चर।भारत में न्यायपालिका लोकतंत्र की रीढ़ कही जाती है। सुप्रीम कोर्ट का हर निर्णय, हर टिप्पणी, समाज में एक गंभीर प्रभाव छोड़ता है। लेकिन हाल ही में, मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर सोशल मीडिया पर जो घृणित हमले हुए, वह न केवल न्यायपालिका पर चोट हैं बल्कि दलित अस्मिता और आंबेडकरवाद पर भी सीधा प्रहार हैं।
ट्रोल्स ने गवई को अपमानित करने के लिए “भीमटा” कहा। यह शब्दावली महज़ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी विचारधारा की तौहीन है। गवई दलित समाज से आते हैं और अपनी मेहनत व योग्यता से सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुँचे हैं। ऐसे में उनका अपमान करना केवल एक जज की हैसियत को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि उस सामाजिक न्याय की परंपरा का मज़ाक उड़ाना है, जिसे डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान में प्रतिष्ठित किया।
“भीमटा” क्यों सिर्फ़ गाली नहीं है
डॉ. आंबेडकर को ‘भीम’ कहकर उनका सम्मान किया जाता है। उनकी स्मृति में “भीम सेना”, “भीम गीत”, “जय भीम” जैसे नारों का इस्तेमाल होता है। ऐसे में जब कोई मनुवादी ट्रोल “भीमटा” लिखता है, तो वह केवल गवई को नहीं बल्कि सीधे आंबेडकर को नीचा दिखाने की कोशिश करता है। यह मानसिकता वही है, जिसने सदियों से दलितों को सामाजिक न्याय से वंचित रखा।
आंबेडकरवाद पर हमला
गवई को अपमानित करते हुए ट्रोल्स दरअसल इस संदेश को दे रहे हैं कि दलित अगर न्यायपालिका, सत्ता या किसी उच्च पद पर पहुँचते हैं तो उन्हें अपमान सहना ही होगा। यह मनुवादी मानसिकता है—जहाँ दलित को “नीचे” रखने का जुनून हर रूप में प्रकट होता है।
लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि गवई का अपमान एक व्यक्ति का अपमान नहीं है। यह अम्बेडकरवाद पर हमला है। यह बाबासाहेब आंबेडकर की उस विरासत पर चोट है जिसने भारतीय लोकतंत्र को बराबरी और न्याय की नींव दी।
सवाल सुप्रीम कोर्ट से भी
यहाँ एक सवाल सुप्रीम कोर्ट से भी उठता है। जब ट्रोल्स खुलेआम मुख्य न्यायाधीश को “भीमटा” कह रहे हैं, तो क्या यह सिर्फ़ व्यक्तिगत अपमान है? नहीं। यह न्यायपालिका की गरिमा और भारतीय संविधान के उस मूल ढाँचे पर भी आघात है, जिसे आंबेडकर ने बनाया। क्या सुप्रीम कोर्ट इस अपमान पर चुप रहेगा? अगर दलित जजों को खुलेआम गालियाँ दी जाएँ और अदालत कुछ न कहे, तो यह न्यायपालिका की निष्पक्षता और उसकी सामाजिक ज़िम्मेदारी दोनों पर प्रश्नचिह्न है।
निष्कर्ष
“भीमटा” कहना महज़ एक ट्रोलिंग की घटना नहीं है। यह भारत के दलित समाज और उनकी ऐतिहासिक उपलब्धियों का अपमान है। यह डॉ. आंबेडकर के उस संघर्ष का अपमान है जिसने हमें बराबरी का संविधान दिया। और यही कारण है कि इस पर केवल सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया काफी नहीं है—इस पर संस्थागत और सामाजिक स्तर पर जवाबी हस्तक्षेप होना चाहिए।
क्योंकि याद रखिए—
गवई को गाली देना, गवई का अपमान नहीं है, यह आंबेडकर का अपमान है।
भीमटा कहना: गवई नहीं, आंबेडकर और सामाजिक न्याय का अपमान
ये लेख एक वीडियो-पाठ के आधार पर तैयार किया गया जिसमें अशोक चित्रांशिया और अशोक वानखेड़ेLद न्यूज़ लॉन्चर) ने विस्तार से बताया है कि किस तरह CJI बी.आर. गवई पर ट्रोलिंग और महाभियोग जैसी माँगें सोशल मीडिया पर चल रही हैं। इसमें सबसे आपत्तिजनक हिस्सा वह है जहाँ मनुवादी ट्रोल्स ने गवई को “भीमटा” कहकर संबोधित किया है। अब, “भीमटा” शब्द केवल गवई का नहीं बल्कि सीधे तौर पर डॉ. भीमराव आंबेडकर और पूरे आंबेडकरवादी आंदोलन का अपमान है। आइए इसे ध्यान में रखकर एक आलोचनात्मक लेख का परिष्कृत प्रारूप प्रस्तुत करता हूँ:
भारतीय लोकतंत्र का सबसे मज़बूत स्तंभ न्यायपालिका है। संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका को इसलिए स्वतंत्र बनाया कि वह राजनीतिक दबावों से मुक्त रहकर नागरिकों को न्याय दे सके। किंतु बीते वर्षों में देखा गया है कि न्यायपालिका पर भी राजनीतिक और वैचारिक हमले होने लगे हैं। हाल ही में ऐसा ही मामला सामने आया जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई को सोशल मीडिया पर “भीमटा” कहकर अपमानित किया गया।
यह केवल किसी एक व्यक्ति पर की गई अभद्र टिप्पणी नहीं है। यह सीधे-सीधे डॉ. भीमराव आंबेडकर, उनकी विचारधारा और भारतीय लोकतंत्र की समता-आधारित परंपरा पर प्रहार है। “भीमटा” कहना दरअसल उस गहरी मनुवादी मानसिकता का परिचायक है, जो दलित समाज की उपलब्धियों और नेतृत्व को कभी स्वीकार नहीं कर पाई।
पृष्ठभूमि: विवाद की शुरुआत:
मामला खजुराहो स्थित एक मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति से जुड़ी याचिका का है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकार क्षेत्र में बताते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया। इसी दौरान CJI गवई की एक टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हुई, जिसमें उन्होंने याचिकाकर्ता को कहा—“आप भगवान विष्णु के भक्त हैं, तो उनसे प्रार्थना कीजिए।”
इसके बाद सोशल मीडिया पर गवई को निशाना बनाते हुए हैशटैग चलने लगे—“Impeach the CJI” और “गंवार गवई हिंदू विरोधी”। धीरे-धीरे यह आलोचना गालियों में बदल गई और मनुवादी ट्रोल्स ने गवई को “भीमटा” कहना शुरू किया।
न्यायपालिका पर हमला या दलित अस्मिता पर? CJI गवई पर सोशल मीडिया की आक्रामकता किसी विशेष निर्णय से असहमति की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रही। बल्कि इसमें गालियों और जातिवादी शब्दों का प्रयोग हुआ। “भीमटा” शब्द गढ़कर ट्रोल्स ने यह संदेश देने की कोशिश की कि यदि कोई दलित समाज से जुड़ा व्यक्ति सर्वोच्च पद पर पहुँचता है, तो उसकी उपलब्धि का सम्मान नहीं बल्कि अपमान ही किया जाएगा। यह सवाल केवल न्यायपालिका पर हमला होने का नहीं है। यह दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय पर हमला है। क्योंकि गवई की पहचान केवल एक जज की नहीं है, बल्कि वे उस परंपरा का हिस्सा हैं जिसे डॉ. आंबेडकर ने सामाजिक समानता और संवैधानिक मूल्यों के लिए खड़ा किया।
“भीमटा” शब्दावली का गहरा अर्थ :
भारतीय समाज में “भीम” नाम आंबेडकर के लिए श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक है। “जय भीम” आज भी दलित चेतना का नारा है। लेकिन जब मनुवादी ट्रोल्स इसे “भीमटा” में बदलते हैं, तो वे केवल शब्दों से खिलवाड़ नहीं कर रहे, बल्कि आंबेडकरवाद को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। यह अपमान केवल गवई का नहीं है। यह उस ऐतिहासिक संघर्ष का अपमान है जिसने दलितों, पिछड़ों और वंचितों को समान अधिकार दिलाए। यह उस संविधान का अपमान है जो जाति व्यवस्था के अन्याय को समाप्त करने के लिए रचा गया। और यह उस सामाजिक न्याय की परंपरा का अपमान है, जिसे आंबेडकर ने अपने जीवन भर जिया और जिसके लिए संघर्ष किया।
दलित जज को गाली, मनुवाद की मानसिकता उजागर:
मुख्य न्यायाधीश गवई का अपमान बताता है कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था आज भी दलितों को नेतृत्व की कुर्सी पर बर्दाश्त नहीं कर सकती। गवई को गाली देना दरअसल यह संदेश है कि अगर कोई दलित न्यायपालिका के शीर्ष पर पहुँचेगा, तो उसे अपमानित किया जाएगा।
“भीमटा” कहना इस मानसिकता का नंगा प्रदर्शन है। यह मान लिया गया है कि दलित अगर बोलेंगे तो उन्हें गाली मिलेगी, अगर लिखेंगे तो उनका मज़ाक उड़ाया जाएगा, और अगर कुर्सी पर बैठेंगे तो उन्हें गिराने की साज़िश होगी।
“भीमटा” की गाली : गवई नहीं, आंबेडकर का अपमान:
Ø भारत में न्यायपालिका लोकतंत्र की रीढ़ कही जाती है। सुप्रीम कोर्ट का हर निर्णय, हर टिप्पणी, समाज में एक गंभीर प्रभाव छोड़ता है। लेकिन हाल ही में, मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर सोशल मीडिया पर जो घृणित हमले हुए, वह न केवल न्यायपालिका पर चोट हैं बल्कि दलित अस्मिता और आंबेडकरवाद पर भी सीधा प्रहार हैं।
Ø ट्रोल्स ने गवई को अपमानित करने के लिए “भीमटा” कहा। यह शब्दावली महज़ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी विचारधारा की तौहीन है। गवई दलित समाज से आते हैं और अपनी मेहनत व योग्यता से सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुँचे हैं। ऐसे में उनका अपमान करना केवल एक जज की हैसियत को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि उस सामाजिक न्याय की परंपरा का मज़ाक उड़ाना है, जिसे डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान में प्रतिष्ठित किया।
भीमटा” क्यों सिर्फ़ गाली नहीं है?
डॉ. आंबेडकर को ‘भीम’ कहकर उनका सम्मान किया जाता है। उनकी स्मृति में “भीम सेना”, “भीम गीत”, “जय भीम” जैसे नारों का इस्तेमाल होता है। ऐसे में जब कोई मनुवादी ट्रोल “भीमटा” लिखता है, तो वह केवल गवई को नहीं बल्कि सीधे आंबेडकर को नीचा दिखाने की कोशिश करता है। यह मानसिकता वही है, जिसने सदियों से दलितों को सामाजिक न्याय से वंचित रखा।
मनुवादी मानसिकता और दलित नेतृत्व:
भारत की सामाजिक संरचना में जातिगत वर्चस्व की मानसिकता गहरी जड़ें जमाए हुए है। दलित समाज का कोई भी व्यक्ति जब सत्ता या नेतृत्व के पद पर पहुँचता है, तो यह मानसिकता उसे स्वीकार करने के बजाय संदेह, उपेक्षा और अपमान से देखती है। गवई को “भीमटा” कहना इस बात का उदाहरण है कि आज भी मनुवादी सोच यह मानने को तैयार नहीं है कि दलित समाज का कोई व्यक्ति सर्वोच्च पद पर बैठकर न्याय बाँट सकता है। यह उस असमानता की मानसिकता का प्रमाण है जिसने सदियों तक दलितों को हाशिए पर रखा और आज भी उनके आत्मसम्मान को चुनौती देती रहती है।
मनुवादी मानसिकता की पोल :
भारत में जब-जब किसी दलित ने ऊँचे पद हासिल किए हैं, तब-तब वर्चस्ववादी ताक़तों ने उसे नीचा दिखाने की कोशिश की है। गवई का अपमान उसी मनुवादी मानसिकता का उदाहरण है जो मानने को तैयार ही नहीं कि दलित समाज का कोई व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय की कुर्सी पर बैठकर फैसले सुना सकता है। “भीमटा” कहना दरअसल यह संदेश देना है कि दलित चाहे कितना भी आगे बढ़ जाए, वह मनुवादियों की नज़रों में हमेशा “कमतर” ही रहेगा। यही वह सोच है जिसे आंबेडकर ने अपने जीवन भर चुनौती दी थी।
आंबेडकरवाद की ध्वजा से डर:
“जय भीम” आज दलित-बहुजन का गर्व है। यह नारा मनुवादियों को हमेशा चुभता रहा है। इसलिए उन्होंने “भीम” को गाली में बदलकर “भीमटा” कहना शुरू किया।
लेकिन वे भूल जाते हैं कि जिस आंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई थी, उसी आंबेडकर ने संविधान भी रचा। आज अगर वे “भीम” का अपमान करते हैं, तो वे पूरे लोकतंत्र की जड़ें खोद रहे हैं।
यह अपमान गवई का व्यक्तिगत नहीं है—यह हर उस दलित, पिछड़े, आदिवासी का अपमान है जिसने सदियों की बेड़ियाँ तोड़कर ऊँचाई हासिल की है।
आंबेडकरवाद पर सीधा हमला:
Ø गवई का अपमान व्यक्तिगत नहीं है; यह आंबेडकर की विचारधारा पर सीधा प्रहार है। डॉ. आंबेडकर ने संविधान बनाते समय यह सुनिश्चित किया था कि भारत समानता और न्याय पर आधारित होगा। उन्होंने जाति व्यवस्था की आलोचना की और समाज को वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा मानवीय मूल्यों की ओर अग्रसर करने का सपना देखा।
लेकिन जब “भीमटा” कहकर आंबेडकरवाद का मज़ाक उड़ाया जाता है, तो असल में यह बाबासाहेब की उस पूरी विरासत को मिटाने की कोशिश है। यह दलित चेतना को हतोत्साहित करने का प्रयास है और लोकतंत्र को कमजोर करने की एक सुनियोजित रणनीति भी।
Ø गवई को अपमानित करते हुए ट्रोल्स दरअसल इस संदेश को दे रहे हैं कि दलित अगर न्यायपालिका, सत्ता या किसी उच्च पद पर पहुँचते हैं तो उन्हें अपमान सहना ही होगा। यह मनुवादी मानसिकता है—जहाँ दलित को “नीचे” रखने का जुनून हर रूप में प्रकट होता है। लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि गवई का अपमान एक व्यक्ति का अपमान नहीं है। यह अम्बेडकरवाद पर हमला है। यह बाबासाहेब आंबेडकर की उस विरासत पर चोट है जिसने भारतीय लोकतंत्र को बराबरी और न्याय की नींव दी।
Ø गवई का अपमान केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं है। यह आंबेडकरवाद को कमजोर करने की कोशिश है। यह उस संविधान को चुनौती देना है जिसे आंबेडकर ने बनाया। याद कीजिए, आंबेडकर ने कहा था—“जाति भारत को सामाजिक और राजनीतिक रूप से खोखला कर रही है।” आज जब गवई को “भीमटा” कहा जा रहा है, तो यह दिखाता है कि आंबेडकर की चेतावनी कितनी सटीक थी और आज भी कितनी प्रासंगिक है।
सुप्रीम कोर्ट और जिम्मेदारी:
Ø यहाँ एक सवाल सुप्रीम कोर्ट से भी उठता है। जब मुख्य न्यायाधीश को ही खुलेआम अपमानित किया जाए, तो यह केवल व्यक्तिगत गाली नहीं रह जाती, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा पर हमला बन जाती है। यदि सर्वोच्च न्यायालय इस पर मौन रहता है, तो यह संदेश जाएगा कि दलित जजों का अपमान कोई बड़ा अपराध नहीं है। न्यायपालिका को यह स्पष्ट करना होगा कि वह जातिवादी गालियों और मनुवादी मानसिकता के खिलाफ खड़ी है। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो आम नागरिकों का न्यायपालिका पर से विश्वास डगमगाने लगेगा।
Ø सवाल सुप्रीम कोर्ट से भी: सवाल तो यह भी है कि जब ट्रोल्स खुलेआम मुख्य न्यायाधीश को “भीमटा” कह रहे हैं, तो क्या यह सिर्फ़ व्यक्तिगत अपमान है? नहीं। यह न्यायपालिका की गरिमा और भारतीय संविधान के उस मूल ढाँचे पर भी आघात है, जिसे आंबेडकर ने बनाया। क्या सुप्रीम कोर्ट इस अपमान पर चुप रहेगा? अगर दलित जजों को खुलेआम गालियाँ दी जाएँ और अदालत कुछ न कहे, तो यह न्यायपालिका की निष्पक्षता और उसकी सामाजिक ज़िम्मेदारी दोनों पर प्रश्नचिह्न है।
Ø सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी खतरनाक: जब मुख्य न्यायाधीश को खुलेआम जातिवादी गालियाँ दी जा रही हों और सुप्रीम कोर्ट चुप रहे, तो यह चुप्पी भी अपराध से कम नहीं। अगर न्यायपालिका दलित जजों के सम्मान की रक्षा नहीं कर पाएगी, तो आम दलित नागरिक के लिए कौन खड़ा होगा? न्यायपालिका को यह समझना होगा कि उसकी चुप्पी मनुवादियों को और ताकत देती है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने जातिवादी गालियों पर सख्ती नहीं दिखाई, तो यह दलितों के खिलाफ सामाजिक युद्ध को और तेज़ करेगा।
सामाजिक संदर्भ और दलित अस्मिता:
भारतीय समाज में दलितों ने अपने संघर्ष और आंबेडकर की विचारधारा के बल पर शिक्षा, राजनीति, साहित्य और न्यायपालिका जैसे क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। लेकिन जब-जब उन्होंने वर्चस्ववादी ढाँचों को चुनौती दी है, उन्हें “भीमटा” जैसी गालियों का सामना करना पड़ा है। इसलिए यह घटना केवल सोशल मीडिया ट्रोलिंग भर नहीं है। यह भारतीय समाज में दलित अस्मिता की स्वीकृति को लेकर जारी संघर्ष का हिस्सा है। यह दिखाता है कि जाति का सवाल आज भी उतना ही ज्वलंत है जितना आंबेडकर के ज़माने में था।
सामाजिक संदर्भ: दलित अस्मिता बनाम मनुवाद:
दलित समाज ने शिक्षा, राजनीति और न्यायपालिका तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। लेकिन हर उपलब्धि के साथ-साथ उसे उपहास और विरोध का सामना भी करना पड़ा है। गवई पर हमला इसी लंबी कड़ी का हिस्सा है। दरअसल, यह घटना हमें याद दिलाती है कि जाति का प्रश्न आज भी भारतीय समाज में पूरी तरह मिटा नहीं है। मनुवादी मानसिकता आज भी जीवित है और समय-समय पर आंबेडकरवाद को चुनौती देती रहती है
यथोक्त के आलोक में कहा जा सकता है कि मुख्य न्यायाधीश गवई को “भीमटा” कहना किसी एक जज का अपमान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। यह डॉ. आंबेडकर और उनके विचारों का अपमान है। यह संविधान और सामाजिक न्याय की नींव को हिलाने की कोशिश है। इस अपमान को केवल सोशल मीडिया की गाली समझकर टालना आसान है, लेकिन यह भूलना खतरनाक होगा कि ऐसी गालियाँ दरअसल उस मानसिकता की देन हैं जो दलित नेतृत्व और समानता की अवधारणा को स्वीकार ही नहीं कर पाती।
आज ज़रूरत है कि समाज, न्यायपालिका और बुद्धिजीवी वर्ग मिलकर इस मनुवादी मानसिकता को चुनौती दें। क्योंकि याद रखिए—गवई को गाली देना, गवई का अपमान नहीं है; यह आंबेडकर का अपमान है, यह भारतीय संविधान का अपमान है।
CJI गवई को “भीमटा” कहना किसी एक व्यक्ति को गाली देना नहीं है। यह डॉ. आंबेडकर का अपमान है। यह दलित अस्मिता पर हमला है। यह भारतीय संविधान और न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाने की कोशिश है। ऐसी गालियों को महज़ “ट्रोलिंग” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के खिलाफ़ खड़ी एक गहरी साजिश है। आज ज़रूरत है कि समाज, मीडिया और न्यायपालिका मिलकर इस मानसिकता को बेनक़ाब करें। क्योंकि अगर गवई को गाली देना सामान्य माना जाएगा, तो कल यह हमला पूरे संविधान पर होगा।
निष्कर्षत:“भीमटा” कहना महज एक ट्रोलिंग की घटना नहीं है। यह भारत के दलित समाज और उनकी ऐतिहासिक उपलब्धियों का अपमान है। यह डॉ. आंबेडकर के उस संघर्ष का अपमान है जिसने हमें बराबरी का संविधान दिया। और यही कारण है कि इस पर केवल सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया काफी नहीं है—इस पर संस्थागत और सामाजिक स्तर पर जवाबी हस्तक्षेप होना चाहिए।
गवई को “भीमटा” कहना मनुवादियों का असली चेहरा है। यह दिखाता है कि दलित नेतृत्व को आज भी उनके लिए हज़म करना मुश्किल है। लेकिन यह भी सच है कि आंबेडकर की मशाल बुझाई नहीं जा सकती। आज ज़रूरत है कि हर दलित-बहुजन, हर आंबेडकरवादी यह कहे— “गवई का अपमान हमारा अपमान है। यह लड़ाई अदालत में भी लड़ी जाएगी और सड़क पर भी।” मनुवादियों को यह समझना होगा कि भीम को गाली देने से भीम की ताक़त कम नहीं होती। भीम हर गाली में और मज़बूत होकर लौटता है। दलित-बहुजन समाज को समझना होगा कि “भीमटा” जैसी गालियाँ केवल ट्रोलिंग नहीं हैं। ये हमें डराने की, हतोत्साहित करने की और हमारी अस्मिता कुचलने की साजिशें हैं।
इसलिए जवाब भी उतना ही तेज़ होना चाहिए। गालियों का जवाब चुप्पी से नहीं, संगठित आंदोलन से दिया जाएगा।
- सड़कों पर उतरना होगा।
- आंबेडकर के विचारों को और मजबूती से फैलाना होगा।
- हर गाली का जवाब “जय भीम” से देना होगा।
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