आदित्य कुमार गिरि
मार्क ट्वेन अंग्रेज़ी के एक बड़े व्यंग्यकार थे। अपने संस्मरणों में एक घटना का वर्णन करते हुए कहते हैं
एकबार चर्च गया। वहां पादरी को बोलते सुना। वह इतना अच्छा बोल रहा था कि सोचा जाते वक्त चर्च को 100 डॉलर डोनेट करके जाऊंगा।
कुछ देर बाद ऐसा हुआ कि मार्क ट्वेन का ध्यान प्रवचन से हट गया और बात 100 डॉलर पर आकर टिक गई। उसके बाद मार्क ने सोचा सौ तो बहुत होते हैं पचास देना ठीक रहेगा।
थोड़ी देर बाद पचास डॉलर भी ज़्यादा लगने लगें, तो उसने सोचा पच्चीस ठीक रहेंगे। ऐसे ही करते-करते बात एक डॉलर पर आकर ठहर गयी कि तभी मार्क ट्वेन को बेचैनी होने लगी और थोड़ी देर बाद वे चर्च से उठ भागे। असल में ट्वेन ने लिखा कि थोड़ी देर बाद मेरी हालत ऐसी हो गयी थी कि मुझे डर लगने लगा था कि चर्च का व्यक्ति जब चंदा लेने के लिए मेरे सामने से बॉक्स लेकर गुज़रेगा तो मैं डोनेशन देने की जगह ख़ुद ही उस बॉक्स से पैसे न उठा लूं।
तो बात यह है कि आईटी सेल या जिसे विपक्षी एकेडेमिक ने ‘भक्त’ की संज्ञा दी है उनकी भीयही हालत है। बेचारे जिसे अपना भगवान मानते हैं वही धोखा दे जाता है और 100डॉलर देने की जगह पैसे निकालने की नौबत का कर जाता है। ये बेचारे जिस-जिस के भक्त होते हैं वही बेचारा इन्हें ‘धोखा’ दे जाता है। पहले आडवाणी, फिर मोरारी बापू और अब सद्गुरु।
आज भारत में इस विचारधारा ने देश के माहौल को विषाक्त कर दिया है। हर जगह हिन्दू-मुस्लिम हो रहा है। इस नई राजनीतिक भीड़ ने देश को ऐसे वातावरण की ओर धकेल दिया है जहां लोगों के आपसी सम्बन्ध ख़तरे में पड़ गए हैं। एक दूसरे के प्रति सन्देह और घृणा अब सामाजिक मूल्य बन चुके हैं।इन्होंने राजनीतिक रूप से असहमत लोगों को शत्रु, देशद्रोही और हिन्दूद्रोही कहकर एक अजीब घृणात्मक स्थिति पैदा की है। देश एक सामूहिक घृणा की प्रयोगशाला बनने की ओर अग्रसर है।
अगर कोई व्यक्ति प्रेम की, सद्भाव की, मिलनसारिता की, साझी संस्कृति की बात करता है तो ये उसे ट्रोल करते हैं, गालियां देते हैं, हिंसा करते हैं। उसका जीना दुहाल कर देते हैं। इन्हें मुसलमानों से विशेष घृणा है। इनका राष्ट्रवाद मुसलमानों की घृणा पर विकसित हुआ है। इनके लिए नेहरू मुस्लिम हैं, गांधी मुस्लिम हैं, हर वह आदमी जो घृणा की राजनीतिक विचारधारा से असहमत है सभी-के-सभी मुस्लिम हैं। गोया मुसलमान होना ही कोई पाप हो।
इनकी भाषा में घृणा में, विद्वेष में, नफ़रत में बात करे तो ये उसके भक्त हो जाते हैं और जैसे ही कोई प्रेम की, उदारता की, विविधता की बोली में बोले ये उसके शत्रु होकर डोनेशन देना तो दूर उसी की थाली से डॉलर निकालने लगते हैं। मार्क ट्वेन तो जानकर कि भीतर ग़लत प्रवृति जन्मी है, चर्च से भाग गए, ये तो भागते भी नहीं, उल्टे और घृणा फैलाते हैं।
2014 से पहले देश में, किसी राज्य में किसी की भी सरकार हो, आमजीवन में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था लेकिन जबसे ये नफरती लोग सत्ता में आए हैं हर जगह घृणा, विद्वेष संताप,बस इसी का बोलबाला है।
आज देश को ज़्यादा-से-ज़्यादा प्रतिरोधी और प्रगतिशील आवाज़ की ज़रूरत है। भारतीय जनता पार्टी ने देश के माहौल को बिगाड़ रखा है। एक समय था जब एक मित्रमण्डली विरोधी राजनीतिक मत रखते हुए भी मित्र होती, औरएक आज है एक परिवार में ही इस नेता, उस नेता के नाम पर युद्ध ठन जा रहे।
बताइए एक, दो देशों में बड़ा भीषण युद्ध छिड़ा है और यह पार्टी वहां केंद्रीय मंत्रियों को भेजकर एजेंडाबाज़ वीडियोज़ बनवा रही है, अपने प्रधानमंत्री के झूठे ‘जय-जयकार’ करवा रही है। लोग मरें- जियें, ‘नेताजी’ की छवि बनी रहनी चाहिए। यूक्रेन में और यहां देश में भाजपा के मंत्री जिस तरह का नाटक कर रहे हैं वह मानवता विरोधी है। ख़ैर फ़िलहाल जग्गी वासुदेव को सौ डॉलर देने वाले भक्त अब उन्हीं की टोकरी से पैसे निकालने को आतुर हैं।
यह नया राष्ट्रवाद है। इसके तहत देश में रहना है तो ‘हिन्दू-हिन्दू’ कहना है। भारत की विविधतावादी भावभूमि को नष्ट कर एक कट्टर राजनीतिक भीड़ का ‘हो-हो’ इस देश को चौपट न कर दे।जिस हिंदूवादी दर्शन ने कुषाण, हुन, मंगोल, तुर्क, मुग़ल सबको ‘स्पेस’ दिया उसी के नाम पर नया राष्ट्रवाद आया है जहां एकरसता होगी। विविधता की जगह सिर्फ ‘हम’ होंगे। विरोधी हर जमात शत्रु।
भक्तों को अखण्ड भारत चाहिए। लेकिन अखण्ड भारत का मतलब हुआ उसमें पाकिस्तान भी होगा, अफगानिस्तान भी, म्यांमार भी और बांग्लादेश भी। तबकैसे निभेगी सरकार। जब इतने मुसलमान, इतने बौद्ध अखण्ड भारत में आ जाएंगे तब वे तो ‘हिन्दू-हिन्दू’ करेंगे नहीं। तोअखण्ड भारत कैसा होगा।
जिस विचारधारा के लोग अखण्ड भारत की बात कर रहे हैं उनका राष्ट्रवाद शायद इसपर खड़ा है कि ‘हम श्रेष्ठ तुम हीन।’ हमें बड़ा मानकर या ‘घर वापसी’ करके ही हमारे राष्ट्र में रह सकते हो।
असल में इस विचारधारा के लिए ‘मैं श्रेष्ठ, बाकी सभी हीन’-मंत्र है। इसीलिए तो जो कट्टर नहीं वह सभी या हिंदूद्रोही है या देशद्रोही है या ‘मुसलमान’ है। आज दक्षिणपंथ के हीरो जग्गी वासुदेव भी गद्दार ठहरे। गद्दार अथवा कहें ‘मुसलमान।’
देश की ऐसी स्थिति कर दी गयी है कि आज मुसलमान होना या उनकी बात करना गद्दार होना हो गया है। आज भाजपा से असहमत हर नेता या तो मुसलमान है या मुसलमान प्रेमी। कोई ‘मुल्लायम’ है तो कोई ‘ममता बानो’, कोई पण्डित(नेहरू) नहीं, मुसलमान है तो कोई सीधे रविशुद्दीन है।
इस विचारधारा के लिए मुसलमान होना ही समाजद्रोही होने या देशद्रोही होने के समतुल्य है। यूपी में योगी आदित्यनाथ के चुनावी भाषणों का खाका तैयार कीजिये, आप पाएंगे इस आदमी ने हिन्दू-मुसलमान के अलावे कुछ नहीं किया। हर घटना को एंटी-मुस्लिम चाशनी लगाकर प्रस्तुत किया है और इस कार्य में सहायता पहुंचाई है गोदी मीडिया या कहें मोदी मीडिया ने। इस विचारधारा ने देश को रसातल में पहुँचाने की कसम खाई है।
अजब माहौल है। इससे निकलना है तो बोलना होगा, विरोध करना होगा। भारत की, साझी संस्कृति की बात करनी होगी। भारत एक विविधतावादी, बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है यहां कट्टर साम्प्रदायिक समझ कभी भी राज नहीं कर सकता। भारत को एक रखना है तो उदारवादी दृष्टि ही एकमात्र राजनीतिक विकल्प है।
आदित्य कुमार गिरि





