अग्नि आलोक
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देह-तंत्र का विज्ञान

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       डॉ. विकास मानव 

हमारे शरीर में नौ द्वार हैं : दो आँख, दो कान, दो नाभि छिद्र, एक मुख इस प्रकार सिर में सात द्वार हुये. आठवाँ गुद्दा द्वार और नौवाँ मूत्रपथ। 

      मिथक के अनुसार सात द्वार देवताओं के ठहरने का स्थान है। इसपर रहने वाले समस्त  देवता परस्पर एक दूसरे की भलाई के लिये अपने-अपने स्थान पर हर समय सतर्क व जागरुक हैं।

    अग्निदेव, नेत्र और जठराग्नि के रूप में; पवनदेव श्वाँस-प्रश्वाँस व दस प्राणों के रूप में; वरुण देव जिह्वा और रक्त आदि के रूप में रहते हैं। इसी प्रकार अन्य देव भी शरीर के भिन्न-2 स्थानों में निवास करते है।

      चैतन्य आत्मा और परमात्मा का यही निवास स्थान है। ये समस्त देव इस शरीर में सद्भाव और सहयोग से प्रीतिपूर्वक रहते हैं सबके काम बंटे हुये हैं सब अपने कार्यों को सम्पादन करने में सभी सचेष्ट एवं दक्ष हैं। 

     नौ द्वार अर्थात नौ चक्र प्रकृति के है। तीन द्वार अधोमुखी तथा छह ऊर्ध्वमुखी हैं। भौतिक मृत्यु के समय हमारे कर्मों के फल के अनुसार ,किसी एक द्वार से हमारे प्राण निकलते हैं। 

    दशम द्वार जिसे शून्य चक्र भी कहते हैं; परमात्मा का स्थान है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं।

     मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी द्वार से होकर निकले और ऊर्ध्वगामी गति प्राप्त करे।

   योगशास्त्रों के अनुसार ब्रह्मसत्ता का मानव शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है। हमारे शरीर मे कुल 114 चक्र में से 7 मुख्य चक्र, 21 मध्यम चक्र और 86 सूक्ष्म चक्र है। इनमें से दो चक्र हमारे  शरीर से बाहर रहते हैं। 

    मुख्य 7 चक्र में से एक सहस्रार चक्र शरीर से बाहर होता हैं।मध्यम 21चक्र आंखें, नाक, कान,कन्धा, हाथ, घुटना ,पैर आदि में होते है। 

     शरीर मे 108 चक्र कार्यशील रहते हैं बाकी चार निष्क्रिय रहते है. कुंडलिनी जब चक्रों का भेदन करती है तो इन चार में शक्ति का संचार हो उठता है। 

आठ चक्र अष्ट प्रकृति के प्रतीक है जैसे ;

1. पृथ्वी

2. जल 

3. अग्नि

4. वायु 

5. आकाश 

6. मन

7. बुद्धि

 8. अहंकार।

   आज्ञाचक्र में ऊर्जा के तीन स्तर है : ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना या त्रिमूर्ति ब्रह्मा,विष्णु और महेश की ऊर्जा। 

     पहला तीन गुणों का प्रतीक है दूसरा उच्चतर शक्ति का प्रतीक है और तीसरी जो तीनो गुणों से परे जाती है। उन्हें विभिन्न नाम से जाना जाता है।  

     मेरुदण्ड पोला है। उससे अस्थि खण्डों के बीच में होता हुआ एक छिद्र नीचे से ऊपर तक चला गया है। इसी के भीतर अदृश्य रूप से सुषुम्ना नाड़ी विद्यमान है।

    इसी में पाँच मुख्य चक्र हैं परन्तु छठे आज्ञा चक्र का स्थान मेरुदण्ड में नहीं आता। यह दोनों भवों के बीच होता है। यह मन का प्रतीक माना जाता। 

     बुद्धि का प्रतीक ललाट चक्र माथे के बीच स्थित होता है। ललाट पूरे माथे को कहा जाता ओर यह पीनियल ग्रन्थि और तन्त्रिका तन्त्र को नियन्त्रित करता है। 

    अहंकार का प्रतीक रोहिणी चक्र बिंदु चक्र के भीतर छुपा होता नवम द्वार जहाँ पर शून्य चक्र तक पहुंचने का सरलतम मार्ग हैं।

    बिंदु विसर्ग को संक्षेप में ‘बिंदु’ कहा जाता है। बिन्दु का अर्थ ‘बूँद’ है। विर्ग माने ‘गिरना’। इस प्रकार बिंदु विसर्ग का तात्पर्य ‘बूँद का गिरना’ हुआ। 

    उच्चस्तरीय साधनाओं के दौरान जब मस्तिष्क से यह झरता है, तो ऐसी दिव्य मादकता का आभास होता है, जिसे साधारण नहीं असाधारण कह सकते हैं।

    संपूर्ण मानव प्रगति काल के इतिहास में बिंदु की शक्ति अभी तक रहस्यात्मक ही बनी हुई है ओर इसे सृष्टि का मूल माना गया है।

     ध्यानतंत्र में प्रत्येक बिन्दु शक्ति का केन्द्र है। यह शक्ति स्थायी चेतना के आधार की अभिव्यक्ति है।शास्त्रों में बिन्दु को वह आदिस्रोत माना गया है।

     जहाँ से सभी पदार्थों का प्रकटीकरण और  जिसमें सभी का लय हो जाता हैआकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी आदि सभी उसी की निष्पत्तियाँ है।

    ललाट चक्र और बिन्दु चक्र की गुप्त शक्तियाँ प्रकट नहीं होती है बल्कि आज्ञाचक्र में ही छिपी रहती है। इसीलिए आज्ञाचक्र को युक्त त्रिवेणी कहते हैं। 

     आठवा चक्र तक प्रकृतिलय ही हैं। नवम द्वार ,बिन्दु चक्र आत्मा  का स्थान हैं । इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव एवं शक्ति का नाम देते हैं।

      यह सृजन से पहले की अवस्था हैं,अर्थात ब्रह्मा की ऊर्जा। शक्ति से मिलकर शिव आत्माराम हो जाते हैं अर्थात इड़ा और पिंगला का मिलन और सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश।

    दो चक्र हमारे शरीर से बाहर रहते हैं। सहस्रार चक्र हैं,जिसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं,तथा दूसरा हैं ,निर्वाण चक्र।

    सहस्रार चक्र ,आत्मा का प्रतीक भौतिक शरीर से साढे 3 इंच ऊपर हजार पंखुड़ियों का कमल है ,और अद्वैत, निर्गुण,निराकार ब्रह्म: का आसन हैं। यह वास्तव में चक्र नहीं है बल्कि साक्षात तथा सम्पूर्ण परमात्मा और आत्मा है।

     सहस्रार चक्र  6 सेंटीमीटर व्यास के एक अध खुले हुए कमल के फूल के समान होता है। ऊपर से देखने पर इसमें कुल 972 पंखुड़ियां दिखाई देती है।

   इसमें नीचे 960 छोटी-छोटी पंखुड़ियां और उनके ऊपर मध्य में 12 सुनहरी पंखुड़ियां सुशोभित रहती हैं। 

    इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहते हैं। जो असीम आनन्द का केन्द्र होता है। इसमें इंद्रधनुष के सारे रंग दिखाई देते हैं लेकिन प्रमुख रंग बैंगनी होता है।

   इस चक्र में अ से क्ष तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है. पिट्यूट्री और पिनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इससे सम्बंधित है। यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाई आंख को नियंत्रित करता है। 

    यह आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, एकीकरण,स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केन्द्र है। यह आत्मा का उच्चतम स्थान है।

    सहस्रार का सम्बन्ध रीढ़ की हड्डी से सीधा नहीं है। पर फिर भी सूक्ष्म शरीर पाँच रीढ़ वाले और दो बिना रीढ़ वाले सभी सातों चक्रों को श्रृंखला में बाँधे हुए है।

   सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना में यह सातों चक्र जंजीर की कड़ियों की तरह परस्पर पूरी तरह जुड़े हैं। 

शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है। वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है।

     वे धाराएँ मस्तिष्क के अगणित केन्द्रों की ओर दौड़ती है। इसमें से छोटी-छोटी चिनगारियाँ तरंगों के रूप में उड़ती रहती हैं। उनकी संख्या की सही गणना तो नहीं हो सकती, पर वे हैं हजारों। 

    इसलिए हजारों का उद्बोधक ‘सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है सहस्र फन वाले शेषनाग की परिकल्पना का यही आधार है।

    यह संस्थान ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क साधने में अग्रणी है इसलिए उसे ब्रह्मरन्ध्र भी कहते हैं। आज्ञाचक्र को सहस्रार का उत्पादन केन्द्र कह सकते हैं।

   सहस्रार चक्र के भीतर विद्यमान है निर्वाण चक्र जिसके भीतर निर्गुण, निराकार ब्रह्म: विराजमान है। 

   निर्वाण का सही अर्थ है- ज्ञान की प्राप्ति- जो मन की पहचान को खत्म करके मूल तथ्य से जुड़ाव पैदा करता है।

    सैद्धांतिक तौर पर निर्वाण एक ऐसे मन को कहा जाता है जो “न आ रहा है भाव, और न जा रहा है विभाव और उसने शाश्वतता की स्थिति को प्राप्त कर लिया है, 

    सामान्य मृत्यु में केवल हमारा स्थूल शरीर ही नष्ट होता है। शेष छः शरीर बचे रहते हैं जिनसे जीवात्मा अपनी वासनानुसारअगला जन्म प्राप्त करती है। किंतु महामृत्यु में सभी छः शरीर नष्ट हो जाते हैं फ़िर पुनरागमन संभव नहीं होता। इसे ही मोक्ष,निर्वाण,कैवल्य कहा जाता है।

    मृत्यु के समय तक जिसका सहत्रार खुल गया फिर मोक्ष मिल जाती है | स्थिरता, और शांति भी इसके अर्थ हैं। निर्वाण की प्राप्ति की तुलना अविद्या के अंत से की जाती है। 

     जिससे उस मन:स्थिति की चेतना जागृत होती है जो जीवन चक्र से मुक्ति दिलाती है। एक स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति निर्वाण को मानसिक चेतना की तरह अनुभव करता है। 

    संसार मूलत: तृष्णा और अज्ञानता की उपज है। व्यक्ति बिना मृत्यु के भी निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है। ओर जब मृत्यु होती है, तो उस मृत्यु को मोक्ष कहते हैं।

   क्योंकि वह जीवन-मरण से छूट जाता है और उसका फिर से जन्म नहीं होता। पुराण कथा के अनुसार राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में था।

    भगवान् ने वामन रूप में उससे साढ़े तीन कदम भूमि की भीक्षा माँगी। बलि तैयार हो गये। तीन कदम में तीन लोक और आधे कदम में बलि का शरीर नाप कर विराट् ब्रह्म ने उस सबको अपना लिया।

    हमारा शरीर साढ़े तीन हाथ लम्बा है। चक्रों के जागरण में यदि उसे लघु से महान्-अण्ड से विभु कर लिया जाय तो उसकी साढ़े तीन हाथ की लम्बाई लोक- लोकान्तरों तक विस्तृत हो सकती है।

     उस उपलब्धि की याचना करने के लिए भगवान् वामन रूप धारण करके हमारे दरवाजे पर हाथ पसारे हुए उपस्थित हो सकते हैं!

Ramswaroop Mantri

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