डॉ. विकास मानव
_दुनिया के किसी भी धर्म और उसके धर्मग्रंथों में कभी भी मूर्तिपूजा का कॉन्सेप्ट नहीं रहा है। आप वेद पढ़ लीजिए चाहे कुरान। यहां तक कि वेदों में भी हिन्दू, मूर्ति, चित्र, इत्यादि कुछ भी नहीं मिलेगा। मूर्ति तथा उनकी पूजा का विरोध ही मिलेगा।_
स्वयं बुद्ध और महावीर तक ने कथित भगवान को झूठ बताया और ध्यान का मार्ग प्रशस्त किया. आज उन्हें भी भगवान मानकर उनकी भी मूर्तिपूजा का जाल बिछ गया है.
आपकी मान्यताएं क्या मानती है उसे बेशक मानते रहें लेकिन यह जरूर जान लें कि मूर्ति या मूर्ति पूजा का यदि कहीं कोई जिक्र है तो उसका इतिहास आज से पच्चीस सौ साल पहले से लेकर पांच सौ साल पहले तक के बीच का है।
यह इतिहास भी बड़े प्रयोग के दौर से गुजरने के बाद आप तक आया है। सर्वप्रथम विश्व में मूर्ति का कॉन्सेप्ट नालंदा, तक्षशिला आदि में पढ़ाई करने छात्रों के विषय से यह विचार पैदा हुआ और दुनिया में पहला शिल्प बुद्ध के “पैर” बने थे।
मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा इत्यादि हो या फिर बड़े से बड़े देवता, ईश्वर की मूर्ति l आकृति, स्मृति हो यह इसी शिल्प का विस्तार था जब छात्रों ने लोगों के वचन और वाणी से बुद्ध की कल्पना की और उनकी पहली मूर्ति बना ली थी।
छात्रों के समूह के केंद्र में स्तूप बने और यहीं से धूप, बारिश तथा ठंड इत्यादि से बचने हेतु आसरे की कल्पना अस्तित्व में आई जो मठ हुआ। यही मठ में मूर्ति की स्थापना हुई और सदियां बीतते, बीतते यही प्रक्रिया अभिवादन तक पहुंची।
यहीं से अन्य धर्मों खासकर जो मूर्ति पूजा के खास विरोधी रहे हैं जैसे ईसाई और इस्लाम इत्यादि में भी मस्जिद, मजार, चर्च इत्यादि पहुंचे क्योंकि यह शुरूआत केवल इंसानों की सुलभता हेतु मात्र जगहें थी। आज झगड़े की बन गई हैं।
आप यदि पाली भाषा में मठ या बौद्धविहार का अर्थ देखेंगे तो वह “आराम” मिलेगा। यह तमाम जगहें आराम हेतु ही थी। अशोक काल में सबसे पहले शिलालेख, लिपिलेख, शिल्पकारी, चित्रकारी इत्यादि को अधिक तवज्जो मिली।
गुप्तकाल आते–आते यह कलाएं एक परंपरा बन चुकी थी और अन्य राजाओं तथा मुगलकाल तक यह कला और संस्कृति का रूप धारण कर चुकी थी और आज सबका आदि और अंत का धर्म बन चुका है जबकि इतिहास ऐसा नहीं है।
इतिहास की उन्हीं मूर्ति कलाओं को कुछ चित्रकारों ने अपनी कला के रूप में प्रदर्शित कर सांस्कृतिक, धार्मिक विस्थापन किया जिनमें राजा रवि वर्मा प्रमुख थे। फिर मीडिया, फिल्म, टेलिवीजन के दौर ने इसे घर – घर स्थापित किया।
विज्ञान का युग आने के बाद लगता है इन धार्मिक धारणाओं से जोरदार पर्दा उठेगा जैसे अंग्रेजों के आने के बाद अशोक के इतिहास से पर्दा उठा था अन्यथा आधुनिक काल में अशोक को ना कोई जानता था और ना ही उनका जिक्र था।
आप वास्तविकता की बजाय भले ही मान्यताओं को लेकर चलें कारण यह कि अभी सबकुछ पारदर्शी नहीं हुआ है लेकिन सभी संभावनाओं को स्थान देकर चलें। क्योंकि इतिहास का क्रम आपके सामने ही संदिग्ध अवस्था में पड़ा हुआ है।





