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बालाघाट की मिट्टी से जुड़ा खतरनाक खेल…बैलों की रेस

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बालाघाट जिला महाराष्ट्र से लगा हुआ है. ऐसे में महाराष्ट्र के विदर्भ का मशहूर खेल बालाघाट में भी खेला जाता है. खेल को पट कहते हैं, जहां पर दो ट्रैक पर बैलों को दौड़ाया जाता है. दीवाली के बाद खेती के काम लगभग कम से हो जाते थे. ऐसे में काश्तकार यानी किसान भाई अपने बैलों को इस खतरनाक खेल के लिए तैयार किया जाता है. इसमें उनका खास ख्याल रखा जाता है. वहीं, रोज सुबह उन्हें पट की दान यानी ट्रैक पर रोज दौड़ाया जाता है. ऐसी प्रतियोगिता हर गांव में होती है. दिसंबर के बाद से जब खेती के काम खत्म हो जाते हैं, तो गांव के शौकीन लोग इस खेल यानी पट प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं.बालाघाट जिले में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र का पारंपरिक खेल पट प्रतियोगिता लोकप्रिय है. इसमें दो ट्रैक पर बैलों को दौड़ाया जाता है. दिसंबर के बाद खेती समाप्त होने पर गांवों में पट प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है.

सदियों पुरानी लेकिन खतरनाक प्रतियोगिता
यह प्रतियोगिता कब शुरू हुई इस बारे में किसी को पुख्ता जानकारी नहीं है. लेकिन बुजुर्गों का मानना है कि ये खेल सदियों पुराना है. पहले खेल पहले सिर्फ शौकिया तौर पर खेला जाता था लेकिन समय के साथ इसमें अब जीतने की जिद आ गई. ऐसे में बैलों को कटीले तार के रोल पहनाए जाते हैं. वहीं, तुतारी, बांस का एक डंडा जिसके आगे कील लगी होती है. उसे चुभोया जाता है. जीतने की जिद में लोग बैलों के शरीर में केमिकल पहुंचाते हैं. इसमें इनाम हजारों के होते हैं. पट प्रतियोगिता में इनाम कम से कम 50 हजार तो होता ही है. वहीं, बड़ी प्रतियोगिताओं में ये इनाम लाखों तक पहुंच जाता है.

कैसे होती है प्रतियोगिता
यह प्रतियोगिता दो फेस में होती है. पहले फेज में सिंगल ट्रैक पर दौड़ाया जाता है, जिसमें बैल के क्षमता को देखा जाता है कि तय दूरी को वह कितने समय में दौड़ सकता है. इसे सेकंड दौड़ कहा जाता है. फिर जो बैल जोड़ी कम से कम सेकंड में दूरी तय करती है वैसे ही उसकी रैंकिंग तय होती है. और फाइनल में किस इनाम के लिए वह किस जोड़ी से प्रतियोगिता करेगी. पहले इनाम के साथ रनरअप जोड़ी के सांत्वना पुरस्कार दिया जाता है. इसमें दो या तीन इनाम नहीं होते बल्कि हर रैंकिंग के लिए इनाम तय किए जाते हैं. ऐसी ही प्रतियोगिता चलती है.

लाखों का इनाम और हजारों की बेटिंग
बैल जोड़ी के मालिक इस प्रतियोगिता में इनाम जीतते हैं. वहीं, दूसरी तरफ इसमें खूब बेटिंग भी लगती है. हर जोड़ी के छूटने पर शोर मच जाता है कि कौन से ट्रैक की जोड़ी जीतेगी और तत्काल फैसले लिए जाते हैं और पैसे लगाए जाते हैं. इसमें 10 रुपए से लेकर हजारों की बैटिंग होती है. छोटी रकम वाले अलग खड़े होते हैं, तो बड़ी रकम वालों की लॉबी भीड़ से अलग छीप कर करती है. इसमें गांव के युवाओं से लेकर बुजुर्ग तक शामिल होते हैं. इसे वे लोग किस्मत का खेल कहते हैं. जीत गए तो उछल कूद कर नाचने लगते हैं तो हार जानें पर फिर से किस्मत आजमाने के लिए तैयार हो जाते हैं.

एक समय जो खेल मनोरंजन, भाईचारे और मेलमिलाप का साधन था, तो वहीं खेल जिद, जीत और पशुओं से क्रूरता का रूप ले चुका है. इंसानों की जिद के आगे पशु तो शिकार होते ही है. साथ ही छकड़ा पर सवार खेदया की भी जान जोखिम में आ जाती है. कई बार ऐसे हादसे भी हुए, जिसमें बैल और छकड़ा सवार घायल हुआ, तो कई बार किसी की मौत भी हुई. लेकिन खेल कभी नहीं रुका और जारी रहा…

Ramswaroop Mantri

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