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*चंद्र-यात्रा : अतीत के जलते प्रश्न*

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           ~ प्रखर अरोड़ा

    नासा से बढ़कर झांसा इस दुनिया में कोई नहीं है. Disney walt Recording Studio ( डिस्नी वाल्ट रिकार्डिंग स्टूडियो ) में शुटिंग कर आपको आकाशगंगा , मंगल , ग्रह , उपग्रह , चांद पर मानव पहुंचाने का झांसा देकर चुटिया काट लेता है. देख लो सच्चाई. सब इल्युमिनाटी का खेला है. उसका सिम्बोल भी मौजूद हैं , इससे पहले हमारी एक पोस्ट थी , जिसमें हमने यह बताया था कि इल्युमिनाटी के नकाबपोश चेहरे ही दुनिया में दुसरी दुनिया से आए हुए एलियन फेलियन साबित कर लोगों का चुटिया काटने का प्रयास किया जा रहा है. वैश्विक पूंजीवाद ही दुनिया की तमाम व्यवस्था का शासक वर्ग है.

जिस चन्द्रमा मिशन को नासा ने बंद कर दिया था उसे 80 करोड़ गरीबों के देश ने क्यों जारी रखा है? 

      जब हम पृथ्वी की समस्याओं को सुलझा नहीं पा रहे हैं  दिन प्रतिदिन जल जंगल जमीन व अन्य प्राकृतिक संसाधनों को नाश कर रहे हैं…यहां सबको भोजन वस्त्र आवास जैसी सुविधाएं नहीं दे पाये ,तो  चांद पर यान भेजने का औचित्य क्या है?

स्पेस एजेंसी , स्पेस शटल , स्पेस स्टेशन , मून लैंडिंग , मंगलयान , चंद्रयान , हब्बल , वॉयजर , जेम्स वेब , सेटेलाइट , स्पेसवॉर ये सब फ्रॉड है। 

पृथ्वी से 400 से 500 किलोमीटर से अधिक ऊपर जाना संभव ही नहीं है।

     एक पारदर्शी अभेद्य कवच रास्ता रोक लेता है। इस कवच को भेदने की सभी कोशिशें नाकाम रही हैं। जिन्हें विश्वास नहीं वे नेट पर खोजें बहुत कुछ मिलेगा।

लेकिन~

   इसी मामले में अमेरिका वैश्विक स्तर पर हंसी का पात्र बन गया था. बात है उन दिनों की है जब रूस और अमेरिका में प्रतिस्पर्धा थी कि कौन पहले अंतरिक्ष में अपनी विजय की कहानी लिख दे और फिर आया वह ऐतिहासिक दिन.

    21 जुलाई 1969 जब नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर पहला कदम रक्खा और वहाँ अमेरिकन झंडा गाड़ दिया. असल में वह झंडा चांद पर कम रूस की छाती पर ज्यादा गाड़ा गया था. वे लोग अभी बधाइयां ले ही रहे थे विश्व भर से.  तब तक वह बात फैल गई।

    असल में अमेरिकनों ने जो वीडियो डाला था झंडा गाड़ने का उसमें झंडा फहरा रहा था तो पहली बात ये उठी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर की बिना वायुमंडल के फ्लैग फहरा कैसे रहा था ? दिखाई गई तस्वीरों में अमेरिकी झंडा हवा में उड़ता हुए दिखाई दे रहा है। जबकि एक्सपर्ट मानते हैं कि चंद्रमा पर जो वायुमंडल नहीं है इस कारण झंडा यूं लहरता हुआ नहीं दिखाई दे सकता। जब लोगों का ध्यान इन बिंदुओ पर पड़ा तो उनके दीमाग में भी यह चीजे आई. अमेरिका के पास चुप रहने के अलावा कोई जवाब न था इसका।

फिर दूसरा सवाल उठा :

     नील आर्मस्ट्रांग जहां खड़ा था चंद्रमा पर वहां से एक तरफ उसकी छाया बन रही थी.  तो उस समय जब छाया पूर्व की तरफ बन रही थी तो सूर्य पश्चिम में होना चाहिए. जबकि उस समय जिधर छाया बन रही थी वीडियो में असल में सूर्य भी उधर ही था तो छाया सूर्य की तरफ कैसे बनी?

    इस मजेदार वाकये ने उन्हें कहीं का न छोड़ा  उनका झूठ पकड़ा गया था।

लेकिन तब तक तीसरा सवाल उठा :

    जिस तरफ छाया बन रही थी उस तरफ छाया की लंबाई को एक खास कोण पर सिर के ऊपर से सीधी रेखा में गुजारने पर वह मात्र 35 फिट दूर किसी बिंदु पर मिल रही थी जहां से प्रकाश आ रहा था जबकि सूर्य वहां से लाखों करोड़ों किलोमीटर  दूर है. तो रोशनी इतनी नजदीक से कैसे आ रही थी ? क्या कोई बड़ी लाइट लगाकर किसी स्टूडियो में चंद्रमा पर उतरने का वीडियो बनाया गया है ?

चौथा सवाल :

 चांद पर नील आर्मस्ट्रांग के जूतों के निशान कैसे बन गए।

सिर्फ इतना ही नहीं चांद पर नील आर्मस्ट्रॉन्ग के पैरो के निशान देखकर पहले लोगों को बेहद खुशी हुई थी. लेकिन चांद पर ऐसा हो पाना मुमकिन नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि चन्द्रयान जिसका वजन 4 टन था उसने चन्द्रमा पर कोई निशान नहीं छोड़े, तो फिर आर्मस्ट्रॉन्ग के पैरों के निशान कैसे बन गए? यह सवाल एक्सपर्ट टीम ने उठाया। 

पांचवा सवाल :

एक तस्वीर ऐसी सामने आई जिसमें चांद से तारों का नजर नहीं आना बेहद चौंकाने वाली बात थी क्योंकि चांद पर कोई वायुमंडल नहीं है, लेकिन इस तस्वीर में तारे दिख ही नहीं रहे हैं। चौंकाने वाली बात ये भी है कि दुनिया के सबसे बड़े मिशन की मशीन के ब्लूप्रिंट्स आज तक किसी ने नहीं देखे। अमेरिका का कहना है कि वो किसी तरह से गायब हो गए। जिस वजह ये तस्वीरें इस मिशन की सच्चाई को बंया करती है। 

छठवां सवाल :

  बताया गया कि इस तस्वीर का राज खुद इस हेलमेट में छुपा हुआ है  दरअसल अंतरिक्ष यात्री के हेलमेट पर स्पॉट लाइट का प्रतिबिंब साफ दिखाई दे रहा है। उल्लेखनीय है कि चांद पर पहले से ही मौजूद स्पॉट लाइट क्या कर रही है। तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अपोलो 11 मिशन स्टूडियो में शूट किया गया था ?

    ऐसे ऐसे 32 सवाल उस समय उठाए गए थे जिसमें से एक का भी जवाब अमेरिका ने नहीं दिया था।

 केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के खगोल विज्ञान के प्रोफेसर माईकल रिच ने बयान दिया था कि असल में यह चंद्रमा अभियान राजनैतिक कारणों से जल्दबाजी में अंतरिक्ष में हमारा नियंत्रण है यह सिद्ध करने के लिए किया गया था।

    अभी कुछ दिन पहले रूस ने घोषणा की थी कि हम 2031 तक चंद्रमा तक पहुंच जाएंगे. ध्यान देना मेरे भाई! अभी और आज से 12 साल बाद. जबकि अमेरिका ने आज से 50 साल पहले एक झूठा दावा किया और बेइज्जती के शिकार हुए भारत में यह बात क्यों नहीं पढ़ाई जाती हमारे बालकों को ये एक अलग विषय है।

     1960 के दशक में अमेरिका का फोकस मून मिशन था, लेकिन तकनीक की कमी के कारण वो शुरुआती दौर में सफल नहीं हो पाया था. यह बात लोगों को याद रही.

     20 जुलाई, 1969 को जब नील आर्म स्ट्रॉन्ग ने चांद पर कदम रखा तो कई लोगों ने विश्वास नहीं किया. लोगों का कहना था, सोवियत संघ से पिछड़ने के कारण अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने चांद तक पहुंचने की बात झूठी कही है. वह झूठ बोलकर अपनी छवि को खराब होने से बचाना चाहता है.

    इसके बाद इस घटना का प्रसारण हुआ और तस्वीरें सामने आईं. जिसे अपने-अपने नजरिए से लोगों ने देखा और इसे छल बताया।

वो किताब जिसने मून मिशन पर सवाल उठाए :

     लोगों के बीच चल रही अफवाहों को बल तब मिला जब 1976 में पत्रकार बिल केसिंग की किताब वी नेवर वॉन्ट टू द मून : अमेरिकाज थर्टी बिलियन डॉलर स्विंडल प्रकाशित हुई. केसिंग नासा के जनसम्पर्क विभाग के ऑफिसर रहे हैं. उन्होंने अपनी किताब में बताया कि कैसे नासा का चांद पर उतरने का दावा झूठा था. लोगों ने उनके तर्कों का समर्थन भी किया।

पहला तर्क : 

चांद पर बिना हवा के लहराता झंडा

केसिंग ने अपनी किताब में तर्क दिया कि जांच पर बिना हवा वाले वातावरण में कैसे अमरीकी झंडा लहरा रहा है. इसके अलावा इस तस्वीर में कोई तारा भी नहीं दिख रहा है. इस पर अमेरिकी खगोलशास्त्री ने अपना पक्ष रखा  उन्होंने कहा, इस झंडे को जमाने में बल का प्रयोग किया गया है. इसलिए उनसे सिलवटें नजर आईं. झंडे का आकार ऐसा इसलिए रहा क्योंकि चंद्रमा पर धरती की तुलना में 6 गुना कम गुरुत्वाकर्षण है।

  Was Moon Landing Fake All You Need To Know About The Facts Apollo Mission Facts.

दूसरा तर्क : 

यह कैसा आकाश है जहां तारे ही नहीं हैं? इंसान के मून पर उतरने की बात का मजाक बनने वाले लोगों ने कहा कि यह कैसा आसमान में जहां तारे ही नहीं नजर आ रहे हैं. जो तस्वीर नासा ने दिखाई है उसमें अंधेरा और उजाला एक तरह का है.

   इस तर्क का जवाब रोचेस्टर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर ब्रायन केबरेलिन ने दिया. उन्होंने कहा, चंद्रमा की सतह पर सूरज की रोशनी होती है. यह इतनी तेज होती है कि तारों की चमक को भी मंद कर सकती है. इसलिए तारे नहीं देखे जा सकते।

तीसरा तर्क : 

झूठे हैं चांद पर जूते के निशान.

इतना ही नहीं चांद की सामने आई तस्वीरों में दिखे जूतों के निशान तक को झूठा बताया गया.

कहा गया कि चांद पर नमी नहीं है, इसलिए वहां पर जूतों के निशान भला कैसे पड़ सकते हैं. यह भी बताया गया कि तस्वीर में अंतरिक्षयात्री की परछाईं दिख रही है तो फिर झंडे की परछाईं क्यों नहीं दिख रही।

    इस तर्क का जवाब एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रो. मार्क रॉबिन्सन ने दिया. उन्होंने कहा –  चांद पर मिट्टी की चट्टान और धूल की परत जमी हुई है. अगर यहां पर कदम रखे जाएं तो आसानी से ये संकुचित हो जाती है ; इसलिए पैरों के निशान देखे जा सकते हैं।

Ramswaroop Mantri

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