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वंदे मातरम के तीन धार्मिक अंतरों के समर्थन में खड़े होकर मोदी ने सांप्रदायिक होने का एक बार फिर से प्रमाण दे दिया

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वंदेमातरम गीत के पहले दो अंतरे को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार कर शेष को अस्वीकार कर सच्चे देशभक्तों ने 1937 में ही स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था भी व्यक्त कर दी थी। नरेंद्र मोदी वंदे मातरम के तीन धार्मिक अंतरों के समर्थन में खड़े होकर सांप्रदायिक राष्ट्रवादी होने का एक बार फिर से प्रमाण दे दिया है।बँकिंचन्द्र इस देश को हिंदुओं का देश मानते हैं और मुसलमानों को हमलावर जबकि रवींद्र के लिए यह देश हिंदुओं और मुसलमानों दोनों का है। उनके अनुसार मुसलमानों के बिना देश की कल्पना भी नहीं की जा सकती।रवीन्द्रनाथ टैगोरे बंकिम के वंदे मातरम गीत की आलोचना भी इसीलिए करते हैं कि उननके यहाँ भारत माता की संकल्पना हिन्दू देवी के रूप में की गई है, न कि ऐसी माता के रूप में जो केवल हिंदुओं की माता न हो। आनंदमठ (1882) में जिस हिन्दू राष्ट्रवाद की संकल्पना बंकिमचंद्र ने रखी थी और जिसमें मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं थी उसे लाला लाजपत राय, लाला हरदयाल, स्वामी श्रद्धानंद के यहाँ आते-आते द्विराष्ट्र के सिद्धांत में रूपांतरित हो गई थी जहां हिन्दू एक अलग राष्ट्र था और मुसलमान एक अलग राष्ट्र।

जवरीमल्ल पारख

भारतीय तिथि के अनुसार 2 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना को सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं। पिछले 11 वर्षों से आरएसएस जो एक सांप्रदायिक फासीवादी संगठन है, देश पर शासन कर रहा है और भारत का प्रधानमंत्री एक ऐसा व्यक्ति है जो लम्बे समय तक आरएसएस का प्रचारक रहा है।

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि नरेन्द्र मोदी का शासनकाल आज़ादी के बाद का सबसे संकटपूर्ण और चुनौती भरा काल है। धर्म के नाम पर जिस तरह एक पूरे धार्मिक समुदाय को देश के दुश्मन की तरह पेश किया जा रहा है और संविधान में मिले नागरिक अधिकारों से वंचित कर उन्हें दोयम दर्जे के नागरिक में तब्दील किया जा रहा है, वह इस राजसत्ता के फ़ासीवादी चरित्र का ही प्रमाण है।

भारत का यह फ़ासीवाद अपने चरित्र में अतिदक्षिणपंथी भी है और ब्राह्मणवादी भी। मौजूदा राजसत्ता के विरुद्ध संघर्ष उन सब भारतीयों का कर्त्तव्य है जो भारतीय संविधान में यक़ीन करते हैं और जो भारत की बहुविध धार्मिक, जातीय, भाषायी और सांस्कृतिक परंपरा को बचाये रखना चाहते हैं क्योंकि असली भारत इसी परंपरा में निहित है जिसे हिंदुत्वपरस्त ताक़तें ख़त्म करना चाहती हैं’।

मौजूदा राजसत्ता के चरित्र को समझने के लिए और भारत के भविष्य के सामने मौजूद खतरे की गंभीरता को समझने के लिए उस दौर को भी समझना जरूरी है जिसमें इस विचारधारा की बुनियाद रखी गई थी। आरएसएस अपनी राजनीतिक विचारधारा को हिंदुत्व नाम देते हैं। हिन्दुत्व की विचारधारा की जड़ें कहाँ है, इसे समझने के लिए भारत में अंग्रेजी राज्य के कायम होने और इसके विरुद्ध भारत की जनता के संघर्ष को समझना भी जरूरी है।

अंग्रेजों की विजय की शुरुआत 1757 के प्लासी के युद्ध से हुई थी। 1757 में प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला को पराजित किया था। लॉर्ड रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी के केवल तीन हजार सैनिकों (जिनमें 800 अंग्रेज सैनिक थे) ने 18 हजार घुड़सवार सेना और 50 हजार पैदल सैनिकों की नवाब की विशाल सेना को पराजित कर दिया था।

कारण यह था कि नवाब सिराजुद्दोला के सेनापति मीरजाफ़र को क्लाइव ने नवाब बनाने का लालच देकर अपने साथ मिला लिया था। इससे पहले उस समय के बहुत बड़े भारतीय व्यवसायी जगत सेठ और अमीचंद को भी अंग्रेज अपने साथ मिलाने में कामयाब रहे थे। इन सबकी गद्दारी के कारण सिराजुद्दोला की हार हुई। लॉर्ड क्लाइव ने वादे के मुताबिक मीरजाफ़र को बंगाल का नवाब बना दिया जो 1757 से 1760 तक नवाब रहा (द्रष्टव्य : भारत का इतिहास)। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि प्लासी के युद्ध के बाद भारत की जनता ने अंग्रेजों की ग़ुलामी को सहज ही स्वीकार कर लिया था।

प्लासी के युद्ध के बाद विद्रोहों का एक लंबा सिलसिला दिखाई देता है। इनमें बंगाल में हुए संन्यासी और फ़कीर विद्रोह खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। संन्यासी और फकीर विद्रोह 1763 से 1800 के बीच यानी लगभग 37 साल तक जारी रहे। इतिहासकारों ने प्राय: इन दोनों विद्रोहों का अध्ययन साथ-साथ किया है। इन विद्रोहों के कारणों को लेकर विभिन्न इतिहासकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं।

इतिहासकार ए. एन. चंद्र ने ‘दि संन्यासी रेबेलियन’ (1977) में विद्रोह को आरंभिक किस्म का राष्ट्रवादी विस्फोट बताया था। संन्यासी और फकीर विद्रोह के बारे में मार्क्सवादी दृष्टि से इतिहास लेखन की आरंभिक कोशिश सुप्रकाश राय ने ‘भारतेर कृषक बिद्रोहो ओ गणतांत्रिक संग्राम’ में की थी। इस पुस्तक में 1857 से पहले के जितने भी साम्राज्यवाद विरोधी और सामंतवाद विरोधी विद्रोह हुए थे उनका उल्लेख भी किया गया है (आनंद भट्टाचार्य पृ. 81)।

एक अन्य इतिहासकार अतीस दासगुप्ता ने ‘फकीर एंड संन्यासी रेबेलियन’ नामक अपने लेख में लिखा है कि “इस बात को याद रखना प्रासंगिक होगा कि पिछली एक शताब्दी से बंगाल में शिक्षित मध्यवर्ग के बीच संन्यासी विद्रोह के विषय में इतिहासकारों द्वारा विद्वतापूर्ण पुस्तकों और लेखों से नहीं बल्कि प्राथमिक रूप से 1882 में प्रकाशित बंकिमचंद्र चटर्जी के ऐतिहासिक उपन्यास ‘आनंदमठ’ से प्रेरणा प्राप्त की है जो विद्रोह होने के लगभग एक सदी बाद लिखा गया था।

अपने गीत ‘वंदेमातरम्’ के साथ उपन्यास आज़ादी की लड़ाई के दौरान पर्याप्त रूप में प्रेरणा का स्रोत रहा है” (सोशल साइंटिस्ट, जनवरी, 1982, पृ. 44)। अतीस दासगुप्ता का मानना है कि “इसके बावजूद कि उपन्यास अत्यंत महत्त्वपूर्ण और साहित्यिक रूप से श्रेष्ठ रचना है, इसमें हिंदू पुनरुत्थानवाद का अतिरंजनापूर्ण विवरण है और ब्रिटिश शासन के साथ सहअस्तित्व को दर्शाया गया है जो फकीर और संन्यासी विद्रोह की वास्तविक घटनाओं से विचलन है” (वही, पृ. 44)।

संन्यासी और फकीर विद्रोह की पृष्ठभूमि से स्पष्ट है कि 1757 में प्लासी के युद्ध में विजय के बाद बंगाल पर ईस्ट इंडिया कंपनी का बढ़ता नियंत्रण और उसके बाद किसानों और शिल्पकारों की बर्बादी, मुग़ल सेना के सैनिकों का बेरोज़गार होना इन तीन कारणों के साथ-साथ 1770-71 के भयंकर अकाल ने वे परिस्थितियां पैदा की जिसने एक लंबे विद्रोह को मुमकिन बनाया। कई उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए यह विद्रोह 1800 ई. तक किसी न किसी रूप में जारी रहा।

अतीस दासगुप्ता लिखते हैं कि मूल स्रोतों से जो जानकारियां मिलती हैं, उसके अनुसार विद्रोहियों का संगठन अधिकतर मुस्लिम फकीरों और हिंदू संन्यासियों के एकजुट नेतृत्व में होता था। 1763 से लेकर 1857 के बीच के लगभग सौ साल में संन्यासी और फकीर विद्रोह अकेले विद्रोह नहीं थे। किसानों के ऐसे कई विद्रोह लगातार होते रहे और इनकी संख्या लगभग 68 थी और इसके बाद 1857 का महाविद्रोह हुआ था।

इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत की जनता ने अंग्रेजों के राज को कभी भी स्वीकार नहीं किया था और अगर स्वीकार किया भी, तो, उस शिक्षित मध्यवर्ग ने जो अंग्रेजी सत्ता को देश के आधुनिकीकरण के वरदान के रूप में देख रहे थे और जिसका यह दृष्टिकोण हम ‘आनंदमठ’ उपन्यास में भी देख सकते हैं।

इन विद्रोहों के पीछे क्या देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना काम कर रही थी? आनंद भट्टाचार्य के अनुसार, “निस्संदेह संन्यासी विद्रोह ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध था। लेकिन इस अर्थ में वह उपनिवेश-विरोधी नहीं था कि उनका इरादा या उद्देश्य ब्रिटिश शासन को नष्ट करना और मुग़ल सत्ता को वापस स्थापित करना था। इसी तरह जब भी संन्यासियों के हित ज़मींदार और किसानों से टकराये विशेष रूप से जब कर्ज की वसूली पूरी तरह नहीं होती थी तो उन्होंने उनके विरुद्ध संघर्ष किया” (वही, पृ. 98)।

आनंद भट्टाचार्य की इस बात से तो सहमत हुआ जा सकता है कि संन्यासी और फ़कीर विद्रोह को तकनीकी रूप में उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष नहीं कहा जा सकता है, लेकिन जहां तक किसानों से संघर्ष का सवाल है, अतीस दासगुप्ता और सुप्रकाश राय के द्वारा पेश दस्तावेजी प्रमाणों से स्पष्ट है कि उन्होंने ज़मींदारों के विरुद्ध तो संघर्ष किया लेकिन किसानों ने संन्यासियों की मदद ही की न कि उनके विरुद्ध संघर्ष किया।

ऐतिहासिक तथ्यों की दृष्टि से देखें तो संन्यासी विद्रोह को ‘आनंदमठ’ उपन्यास में भिन्न रूप में पेश किया गया है। यह संन्यासी विद्रोह का ऐतिहासिक विवरण नहीं है। संन्यासी विद्रोह केवल संन्यासियों का विद्रोह नहीं था बल्कि वह संन्यासियों, फकीरों और मुग़ल सेना के निकले सैनिकों का सम्मिलित विद्रोह था और किसानों और शिल्पकारों का समर्थन और सहयोग उन्हें हासिल था।

‘आनंदमठ’ उपन्यास में इस संन्यासी और फकीर के सम्मिलित विद्रोह में से मुसलमान फकीरों को न केवल बिल्कुल बाहर कर दिया गया है बल्कि संन्यासी विद्रोह को मुसलमानों के विरुद्ध किया गया विद्रोह बताया गया है जो ऐतिहासिक तथ्यों की दृष्टि से गलत है। पूरा उपन्यास मुस्लिम शासकों के प्रति ही नहीं बल्कि एक जाति के रूप में मुसलमानों के प्रति गहरी नफ़रत और घृणा के साथ लिखा गया है।

यहां इस बात को रेखांकित करने की जरूरत है कि संन्यासी और फकीर विद्रोह (1763-1800) से लेकर 1857 के महाविद्रोह तक अंग्रेजों के विरुद्ध हिंदुओं और मुसलमानों ने एकजुट होकर विद्रोह किये थे। इन विभिन्न विद्रोहों से ब्रिटिश शासक वर्ग यह जान चुका था कि जब तक हिंदुओं और मुसलमानों में एकता बनी रहेगी, भारत को लंबे समय तक उपनिवेश बनाये रखना कठिन होगा।

इसके लिए ज़रूरी था कि भारतीय इतिहास की एक नयी व्याख्या प्रस्तुत की जाये जिसमें यह बताया जाये कि भारत का इतिहास तीन काल खंडों में विभाजित है। हिंदू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल। यानी ब्रिटिश इतिहासकारों के अनुसार, भारतीय इतिहास का मध्ययुग दरअसल मुस्लिम काल है जिसमें इस्लाम धर्म मानने वाले विदेशी शासकों ने हिंदुओं को पराजित कर अपना शासन स्थापित किया और लगभग एक हजार साल तक भारत को गुलाम बनाये रखा।

इससे पहले का जो काल था, जिसे हिंदुओं का इतिहास कहा गया उसे स्वर्ण काल की तरह पेश किया गया। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 19वीं सदी में जो शिक्षित मध्यवर्ग उभर रहा था और जिसे अपने गुलाम होने का एहसास बहुत तीव्र रूप से हो रहा था, वे इतिहास की औपनिवेशिक व्याख्या से प्रेरित होकर केवल वर्तमान की गुलामी से ही नहीं पिछले एक हजार साल की गुलामी से भी गहरे रूप में विचलित थे।

यही नहीं वे कहीं न कहीं अंग्रेजों के इस प्रचार से भी प्रभावित थे कि उन्होंने यहां आकर मुस्लिम शासकों के उत्पीड़न से हिंदुओं को मुक्ति दिलायी। इसलिए अंग्रेजों को औपनिवेशिक शासक के रूप में नहीं बल्कि मुक्तिदाता शासक के रूप में देखने की आवश्यकता है। यह दृष्टिकोण ‘आनंदमठ’ उपन्यास में भी व्यक्त हुआ है।

बंकिमचंद्र प्राच्यवादी बुद्धिजीवियों की इस आलोचना से भी विचलित थे कि हिंदुओं में भौतिक शक्ति और साहस का अभाव है और उनमें पौरुष की बजाय ‘स्त्रैण’ प्रवृत्ति अधिक है। भौतिक ताकत की कमी ही वह कारण है जिस वजह से भारतीय अपनी रक्षा नहीं कर पाते और गुलाम बनने को अभिशप्त हैं।

बंकिमचंद्र इससे सहमत नहीं थे और उन्होंने अपने लेखन द्वारा इसका जवाब देने की कोशिश भी की (द्रष्टव्य : बंकिम चंद्र प्रतिनिधि निबंध)। राष्ट्रवाद की उनकी संकल्पना भी कहीं न कहीं इसके उत्तर से निर्मित हुई है। बंकिमचंद्र के समय की राष्ट्रवाद की संकल्पना दरअसल इतिहास और तथ्यों पर नहीं बल्कि कल्पना पर आधारित है और राष्ट्र के नाम पर वे एक ऐसे समुदाय को राष्ट्र् के रूप में देखते हैं जो भारत के प्रत्येक नागरिक को समाविष्ट करने की बजाय अपनी कल्पना के समुदाय को ही शामिल करते हैं। बंकिम की कल्पना के राष्ट्र् में केवल हिंदू ही राष्ट्र है, मुसलमान उसमें शामिल नहीं है।

बंकिमचंद्र ने ऐतिहासिकता का इस्तेमाल अपने विचार को साकार करने के लिए किया। वे इस बात के प्रति सजग थे कि एक काल्पनिक अतीत की ओर जनता का ध्यान खींचकर राष्ट्रवादी चेतना को पुनर्जीवित किया जा सकता है। वे मानते थे कि वह अतीत दरअसल स्वर्णकाल था और उससे जब हम वर्तमान की तुलना करते हैं तो हमें अपने पतन का एहसास होता है और इस पतन का कारण मध्ययुग की गुलामी है।

मध्ययुग जिसे स्वर्णकाल के रूप में तो याद नहीं कर सकते लेकिन उन हिंदू शासकों को जरूर नायकों की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है जिनका मुस्लिम शासकों से युद्ध हुआ था। उनमें मुख्य रूप से मराठा और राजपूत राजाओं मसलन, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़, शिवाजी आदि का उल्लेख किया जाता है और बहुत से लेखकों ने उनको लेकर साहित्यिक रचनाएं भी की हैं।

इतिहास को इस दृष्टि से देखने का नतीजा यह है कि मुसलमान विदेशी आक्रांता के रूप में पेश किये जाते हैं। मध्ययुग में इन हिंदू नायकों को राष्ट्रवादी दृष्टि से देखने में उन अंग्रेज इतिहासकारों का विशेष योगदान है जिन्होंने भारत के विभिन्न क्षेत्रों का इतिहास लिखा। उदाहरण के लिए राजस्थान पर लिखी कर्नल टॉड की पुस्तक ने हिंदू नायकों को पेश करने में अहम भूमिका निभायी। लेकिन कर्नल टॉड ने इसके लिए वास्तविक इतिहास खोजने की बजाय चारणों द्वारा लिखे अतिरंजनापूर्ण काव्यग्रंथों को ही इतिहास बनाकर पेश किया। ‘आनंदमठ’ ने भी संन्यासी विद्रोह के साथ ठीक यही किया।

बंकिमचंद्र ने आनंदमठ में राष्ट्रवाद को इतिहास के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया है। इसके साथ उन्होंने भारत माता को एक देवी के रूप में प्रस्तुत किया है। इस तरह उन्होंने उग्र राष्ट्रवाद के कुछ सिद्धांत सामने रखे। उन्होंने दो महत्त्वपूर्ण पक्षों को एक दूसरे से जोड़ दिया है। एक तरफ वे भारत को माता के रूप में चित्रित करते हैं, तो दूसरी तरफ वे दुर्गा और काली के धार्मिक रूप का मां की पहचान के लिए इस्तेमाल करते हैं। दुर्गा के साथ राष्ट्र की यह पहचान धार्मिक भावनाओं को जगाती है।

‘आनंदमठ’ बताता है कि भारत माता जिसका अतीत बहुत ही गौरवपूर्ण था, अब उसकी दुर्दशा शर्मनाक हो गयी है। आज वह अपनी संतानों से कह रही है कि उसका खोया गौरव वापस लेकर आये (इशा तिर्के, पृ. 89)। बंकिमचंद्र वंदेमातरम गीत में भारत माता का संबंध ‘शक्ति’ के साथ जोड़ते हैं जिसका चित्रण ‘वंदेमातरम्’ गीत में किया गया है:

सप्त-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
द्विसप्त-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अवला केन मा एत वले
वहुवलधारिणीं
नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं
मातरम्॥

तुमि विद्या, तुमि धर्म
तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वम् हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे॥
त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम्
अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलाम्
मातरम्॥

वन्दे मातरम्
श्यामलाम् सरलाम्
सुस्मिताम् भूषिताम्
धरणीं भरणीं
मातरम्॥

उसके दस हाथों में शस्त्र हैं, उसमें अनंत शक्ति है और धारदार तलवार उसकी महान शक्ति की छवि प्रस्तुत करती है। इस माता में स्त्रियोचित गुण है तो मातृत्व की शक्ति भी है। वह अपने शत्रुओं का संहार करने के लिए बहुत अधिक हिंसक है। बंकिमचंद्र के यहां देशभक्ति का सर्वोच्च धर्म के रूप में उपदेश दिया गया है (इशा तिर्के, पृ. 89)। फ़िल्म में आनंदमठ में जो देवी की मूर्तियां हैं उनको वंदेमातरम गीत में वर्णित भावों को ध्यान में रखकर बनाया गया है और स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि उन पर हिंदू देवियों का प्रभाव है।

यहाँ यह बात जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि संविधान में वंदे मातरम गीत के निम्नलिखित पहले दो अंतरों को ही राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया है, शेष अंतरे को राष्ट्रगीत में शामिल नहीं किया गया है।

वन्दे मातरम्।

सुजलाम् सुफलाम्
मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलाम् मातरम्।
वन्दे मातरम्।

शुभ्रज्योत्स्नाम्
पुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमित
द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीम्
सुमधुर भाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम्
मातरम्॥
वन्दे मातरम्

संविधान में स्वीकृत किए जाने से पहले वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे को 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा भारत की स्वतंत्रता की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के दौरान राष्ट्रीय गीत के रूप में चुना गया था। यह निर्णय उस समिति की सिफारिश पर लिया गया था जिसमें मौलाना आज़ाद, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, आचार्य नरेंद्रदेव और रवीन्द्रनाथ टैगोर शामिल थे। पूरा गीत इसलिए नहीं अपनाया गया क्योंकि हिंदू नेताओं ने गैर-हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करना उचित समझा।

सभा में यह सहमति बनी कि यदि किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् के कुछ अंश किसी व्यक्तिगत कारण से आपत्तिजनक लगते हैं, तो उसे राष्ट्रीय सभा में कोई अन्य “आपत्तिरहित गीत” गाने की स्वतंत्रता होगी।[48] सभा में उपस्थित नेताओं, जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर भी शामिल थे, के अनुसार गीत के पहले दो पद मातृभूमि की सुंदरता के निष्कपट और सराहनीय वर्णन से आरंभ होते हैं, परंतु आगे के पदों में हिंदू देवी दुर्गा के संदर्भ आते हैं।

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के समर्थन से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि सार्वजनिक सभाओं में केवल पहले दो पद ही गाए जाएंगे।

आनंदमठ उपन्यास की कथा 1770 से 1774 ई. के बीच चलती है। बंकिमचंद्र ने उपन्यास संन्यासी विद्रोह की शुरुआत के 110 साल बाद लिखा था। इन 110 सालों में बहुत से अन्य विद्रोह हुए थे और सबसे बड़ा विद्रोह जिसे गदर के नाम से जाना जाता है, वह 1857 में हुआ था। इस विद्रोह के बाद ही भारत की सत्ता ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से निकलकर सीधे ब्रिटिश सरकार के हाथ में आ गयी थी।

उपन्यास के आरंभिक संस्करण में कुव्यवस्था जिसने स्थानीय अभावों को पैदा किया था, उसका जिम्मेदार स्थानीय मुस्लिम शासकों को बताया गया था। लेकिन अगले संस्करण में स्थानीय शासक गायब हो गये थे और अब उसका आरोप बंगाल के कठपुतली शासक मुस्लिम नवाब के कंधे पर डाल दिया गया था।

आरंभिक संस्करण में संतान (उपन्यास में संन्यासियों को संतान कहा गया है) नायक आर्यधर्म को प्रोत्साहित कर रहे थे, लेकिन अंतिम संस्करण में देशभक्त संतान सनातनधर्म का प्रयोग करने लगे जिसको दयानंद सरस्वती हिंदू धर्म के अपने रूढ़िवादी विरोधियों के लिए इस्तेमाल करते थे (वही, पृ. 3962)।

पहले संस्करण में ऐसे कई अवसर आते हैं जब अकेले ब्रिटिश सेना को अपमानजनक ढंग से संबोधित किया गया है, लेकिन बाद के संस्करणों में संतान ब्रिटिश सेना के साथ मुसलमानों को भी अपमानजनक ढंग से संबोधित करने लगे थे। पहले संस्करण में भी अंग्रेज सेना की मर्दानगी की प्रशंसा की गयी है (वही, पृ. 3962)।

तनिका सरकार का कहना है कि “इसके अलावा, मुसलमानों की क्रूर भर्त्सना विभिन्न संस्करणों में यथावत बनी रहती है। इसलिए बंकिम के बारे में औपनिवेशिक उत्पीड़न से संचालित आत्म-प्रतिबंध (सेल्फ-सेंसरशिप) की लोकप्रिय धारणा जिसने अंग्रेजों के प्रति नफरत को मुसलमानों के विरुद्ध एक अवसरवादी प्रतिरोध में बदल दिया था, बहुत वैध प्रतीत नहीं होती” (वही, पृ. 3962)।

मीनाक्षी मुखर्जी के अनुसार “…आनंदमठ भारत में लिखा गया पहला राजनीतिक उपन्यास है। यह न तो उनका पहला उपन्यास है और न ही किसी भी रूप में उनका सबसे उत्कृष्ट उपन्यास है, लेकिन ‘आनंदमठ’ साहित्येतर कारणों से महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, विशेष रूप से बंगाल और भारत के अन्य भागों में परवर्ती राष्ट्रवादी आंदोलनों पर उसका जबर्दस्त प्रभाव पड़ा था” (मीनाक्षी मुखर्जी का आलेख, पृ. 903)।

वे आगे लिखती हैं, “आनंदमठ ने पूरे भारत को अपनी तरफ आकृष्ट किया था, कुछ हद तक इसलिए कि इस उपन्यास ने पहली बार पुनर्जीवित हिंदू धार्मिक उत्साह को नये राष्ट्रवादी उत्साह से जोड़ दिया था। इस सदी के आरंभिक भाग में इसने युवा क्रांतिकारियों को प्रेरित किया था कि वे अपने रिवाल्वर के साथ भगवद्गीता की एक प्रति भी रखे।

इस उपन्यास में शामिल मंत्रमुग्ध करने वाले गीत (जिनमें से एक गीत वंदेमातरम् ने अनौपचारिक रूप से धीरे-धीरे राष्ट्रीय गान का दर्जा हासिल कर लिया था) और इसके आख्यान की भावुक, मधुर और बहुत ही उत्तेजनात्मक भाषा ने अच्छे और बुरे दोनों रूपों में स्वतंत्रता सेनानियों की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया था।

यह पहली बार था कि शक्ति के रूप में देवी मां की हिंदू अवधारणा को राजनीतिक इकाई के रूप में देश के विचार के साथ जोड़ दिया गया था और इस विलयन की प्रतीकात्मक शक्ति बहुत दूरगामी प्रभाव वाली थी” (वही, पृ. 903)।

उपन्यास का एक महत्त्वपूर्ण चरित्र भवानंद बताता है कि जो राजा प्रजा का पालन नहीं करता वह कैसा राजा है। भवानंद अपने मकसद को और स्पष्ट करते हुए कहता है कि “सभी देशों में राजा प्रजा की रक्षा करते हैं। हमारे मुसलमान राजा कहां हमारी रक्षा करते हैं। धर्म गया, जाति गयी, मान गया, कुल गया, अब तो प्राण भी जा रहे हैं। इन नशाखोर दढ़ियलों को भगाये बिना क्या हिंदुओं का हिंदुत्व बचा रहेगा?” (‘आनंदमठ’, पृ. 33)।

उनकी बातचीत से स्पष्ट होने लगता है कि ये लोग मुसलमानों के प्रति गहरे विद्वेष से भरे हुए हैं जबकि एक जाति के रूप में अंग्रेजों के प्रति उनके मन में सम्मान हैं। भवानंद अंग्रेजों और मुसलमानों की तुलना करते हुए कहता है, “सुनो! प्राण निकल जाने पर भी एक अंग्रेज नहीं भागता, लेकिन पसीना निकल आने पर मुसलमान भागने लगता है, शरबत ढूंढता फिरता है। फिर अंग्रेजों में जिद है। वे जिस काम को पकड़ते हैं, उसे पूरा करते हैं। मुसलमानों की हर बात में लापरवाही। रहा, रुपयों के लिए प्राण देते हैं—उस पर तनख्वाह भी तो नहीं पाते।

सबसे अंतिम बात यह है कि अंगरेज साहसी होते हैं। एक गोला एक ही जगह जाकर गिरेगा, दस जगह नहीं। एक गोले को देखकर दस आदमियों को भागने की क्या जरूरत है? लेकिन एक गोले के छूटते ही मुसलमानों की पूरी जमात भाग खड़ी होती है। लेकिन सैकड़ों गोले देखकर भी अंगरेज नहीं भागता…” (बंकिम समग्र, पृ.747)।

भवानंद की बातचीत से स्पष्ट हो जाता है कि उनके मन में मुसलमानों के प्रति गहरी नफरत छिपी है और उनका मकसद मुसलमानों को देश से भगाना है। इसीके लिए वे विद्रोही बने हैं।

युद्ध समाप्ति के बाद एक रहस्यमय व्यक्ति के आदेश से सत्यानंद आनंदमठ में चला जाता है। वह रहस्यमय व्यक्ति जिसे उपन्यास में आगंतुक कहा गया है, भी वहीं पहुंच जाता है और वहां दोनों के बीच वार्तालाप होता है। उनकी बातचीत से स्पष्ट हो जाता है कि यह व्यक्ति सत्यानंद का भी गुरु है और गुप्त रूप से संन्यासियों को सत्यानंद के माध्यम से आदेश देता है। सत्यानंद उनसे पूछता है, ‘मैंने जिस समय युद्ध जीतकर सनातन धर्म को निष्कंटक किया, उसी समय मेरे प्रति परित्याग का आदेश क्यों हुआ?’

“आगंतुक ने कहा, ‘तुम्हारा कार्य सिद्ध हुआ है। मुसलमान राज्य विनष्ट हुआ है। अब तुम्हारा कोई काम नहीं है। अकारण जीवहत्या की आवश्यकता नहीं है’। सत्यानंद प्रश्न करता है कि हिंदू राज्य तो स्थापित नहीं हुआ। इस पर सत्यानंद के गुरु कहते हैं कि अभी हिंदू राज्य स्थापित नहीं होगा बल्कि अंग्रेज राज्य स्थापित होगा। अंग्रेज बाहरी विषयों के अच्छे ज्ञाता है और लोकशिक्षा में निपुण हैं। उससे सुशिक्षित होकर हिंदू सनातन धर्म का अच्छे ढंग से प्रचार कर सकेंगे।

तब वह महापुरुष बोले, “अंग्रेज इस समय वणिक हैं। धनोपार्जन की तरफ उनका ध्यान है। वे राज्य-शासन का भार लेना नहीं चाहते। इस संतान-विद्रोह के कारण वे राज्य-शासन का उत्तरदायित्व लेने के लिए विवश होंगे, क्योंकि राज्य-शासन के बिना धनोपार्जन नहीं होगा। अंग्रेजी राज्य स्थापित होगा। इसीलिए संतान-विद्रोह हुआ है। अब चलो, ज्ञान प्राप्त कर तुम स्वयं सभी बातें समझ सकोगे” (आनंदमठ, पृ. 148)।

‘आनंदमठ’ उपन्यास जिस बिंदू पर समाप्त होता है और जो उद्देश्य संन्यासी विद्रोह का बताया गया है, वह भारत पर अंग्रेजी राज के औचित्य को साबित करने के लिए है। लेकिन वास्तविक संन्यासी विद्रोह के पीछे भले ही कोई राष्ट्रवादी दृष्टि न रही हो, लेकिन अंग्रेजों के विरुद्ध उनके संघर्ष में किसानों, शिल्पकारों और निष्कासित सैनिकों का हित अवश्य था।

संन्यासियों और फकीरों में अभी तक राष्ट्रवाद की संकल्पना जागृत नहीं हुई थी। लेकिन वे इस बात को महसूस करते थे कि अंग्रेज हम गरीबों के जीवन को तबाह कर रहे हैं, हमारा उत्पीड़न कर रहे हैं इसलिए उनका मुकाबला करना जरूरी है।

आनंद भट्टाचार्य और अतीस दासगुप्ता के अनुसंधान से यह स्पष्ट है कि संन्यासी और फकीरों को मुस्लिम शासन के दौरान एक हद तक संरक्षण प्राप्त था। धर्म के आधार पर उनके बीच भेद नहीं किया जा रहा था, लेकिन अंग्रेजों ने शिक्षित हिंदुओं के मन में बैठा दिया कि पिछले एक हजार साल से मुसलमानों ने तुम्हें गुलाम बना रखा था और तुम्हारा उत्पीड़न किया है।

‘आनंदमठ’ की रचना के पीछे इसी औपनिवेशिक समझ का गहरा असर था और संन्यासियों के विद्रोह के माध्यम से मुसलमानों से प्रतिशोध लेने की भावना काम कर रही थी।

बँकिंचन्द्र जब मुसलमानों की बात करते हैं तब वे शासक वर्ग और शासित वर्ग के बीच भेद नहीं करते। यही वजह है कि पूरे उपन्यास में मुसलमानों को लूटा जाता है, उनकी हत्या की जाती है। उनके घर, गांव, मस्जिद और मजार तक जलाये जाते हैं। एक हद तक वे मुसलमानों के नरसंहार में कुछ गलत नहीं मानते।

यह उपन्यास 1857 के महाविद्रोह के लगभग 25 साल बाद लिखा गया था। उनके सामने हिंदुओं और मुसलमानों की एकता और सैनिकों और किसानों की एकता के उदाहरण भी सामने थे और अंग्रेजों के भयावह नरसंहार के उदाहरण भी सामने थे। लेकिन बंकिमचंद्र ने अंग्रेजों की बजाय मुसलमानों को अपने हमले का निशाना बनाया और इसके लिए धर्म और राष्ट्र के एक अपवित्र गठबंधन का विचार सामने रखा जिसका भयावह परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं।

उपन्यास पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि बंकिमचंद्र केवल मुसलमानों के विरोधी ही नहीं थे, दरअसल वे बौद्धधर्म के विरोधी भी थे। आनंदमठ जिसे बौद्ध विहार को समाप्त कर बनाया गया था, उससे भी यह स्पष्ट है। यही नहीं उपन्यास में संतानों द्वारा मस्जिदों और मजारों को तोड़ने की बात करना भी उनके मुस्लिम द्वेष को ही बताता है।

सत्यानंद उपन्यास में संतानों को संबोधित करते हुए कहते हैं, “हम राज्य नहीं चाहते। ये मुसलमान अब विद्वेषी हो गये हैं, इसीलिए इनका सवंश संहार करना चाहते हैं” (आनंदमठ, पृ. 79)। ‘सवंश संहार’ का अर्थ है, पूर्ण जातीय नरसंहार जैसा हिटलर ने यहूदियों का किया था।

आनंदमठ पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि बंकिमचंद्र आम मुसलमान और राज्य-कर्मचारियों और सैनिकों में कहीं भेद नहीं करते। उनके लिए सभी मुसलमान थे। संतानों की लूटपाट के संदर्भ में ही वे वारेन हेस्टिंग्स के बारे में लिखते हैं, “स्वनामधन्य वारेन हेस्टिंग्स उस समय भारत में गवर्नर जनरल थे। भारत में आये अंग्रेजों मे वे प्रभातकालीन सूर्य के समान थे”।

इस उपन्यास में केवल मुसलमानों के प्रति नफरत का भाव प्रकट नहीं हुआ है, दलितों और आदिवासियों के प्रति भी कमोबेश इसी तरह के भाव प्रकट हुए हैं। वे लिखते हैं, “वहां कुछ चुआड़, हाड़ी, डोम, बागदी और जंगली लोग संतानों का उत्साह देखकर लूटपाट करने लगे थे। उन्हीं लोगों ने कैप्टेन टॉमस पर धावा मारा। कैप्टेन टॉमस के सिपाहियों के लिए गाड़ियां भर-भर कर बढ़िया घी, मैदा, चावल और मुरगे चल रहे थे। यह देखकर डोम-बागदी लोग अपना लोभ न संभाल सके।वे गाड़ियों पर पिल पड़े। लेकिन कैप्टेन टॉमस के सिपाहियों की बंदूकों की संगीनें खाकर वे भाग खड़े हुए’ (आनंदमठ, पृ. 92)।

इस अंश से स्पष्ट है कि संतानों में दलित और आदिवासी शामिल नहीं थे। यही नहीं उनके द्वारा सरकारी खजाने को लूटने को वे अपराध की तरह चित्रित करते हैं जबकि संतानों की ओर से की गयी लूट को राज-विद्रोह की तरह।

आनंदमठ उपन्यास का प्रकाशन 1882 में हुआ था और इसे पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों तक राष्ट्रवाद के उदय के साथ-साथ सांप्रदायिकता की भावना का उदय होने लगा था और इन दोनों के मिश्रण से ही वह सांप्रदायिक राष्ट्रवाद आकार लेने लगा था जिसे बाद में हिन्दुत्व के नाम से पहचाना गया था।

बंकिमचंद्र के यहाँ जो मुस्लिम विरोधी राष्ट्रवाद दिखाई देता है, वह लगातार कई अन्य हिन्दू नेताओं के माध्यम से प्रकट होता रहा। कुछ के यहाँ उग्र रूप में तो कुछ के यहाँ अपेक्षाकृत नरम रूप में। इन नेताओं में लाला लाजपत राय, लाला हरदयाल, स्वामी श्रद्धानंद, मदनमोहन मालवीय आदि प्रमुख हैं।

स्वतंत्रता सेनानी और काँग्रेस नेता लाला लाजपत राय (1865–1928) पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सबसे पहले द्विराष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) का प्रतिपादन किया और भारत के विभाजन का प्रस्ताव भी रखा। 1899 में उन्होंने लिखा था —“हिंदू स्वयं में एक राष्ट्र हैं क्योंकि वे एक ऐसी सभ्यता का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पूरी तरह उनकी अपनी है।”

14 दिसंबर 1924 को द ट्रिब्यून (लाहौर) में प्रकाशित लेखों की श्रृंखला में उन्होंने लिखा था, “मेरा सुझाव है कि पंजाब को दो प्रांतों में विभाजित कर दिया जाए — पश्चिमी पंजाब, जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, उसे मुस्लिम शासन वाला प्रांत बनाया जाए; और पूर्वी पंजाब, जहाँ हिंदू-सिख बहुसंख्यक हैं, उसे गैर-मुस्लिम शासन वाला प्रांत बनाया जाए। मैं बंगाल पर चर्चा नहीं करता। मेरे लिए यह अकल्पनीय है कि बंगाल के समृद्ध, अत्यंत प्रगतिशील और जीवंत हिंदू श्री सी.आर. दास द्वारा किए गए समझौते (पैक्ट) को कभी लागू कर सकेंगे। मैं उनके मामले में भी यही सुझाव दूँगा, लेकिन यदि बंगाल श्री दास का समझौता स्वीकार करने को तैयार है, तो मुझे कुछ नहीं कहना है। वह उनकी अपनी चिंता है।”(दि आरएसएस : ए मिनास टू इंडिया, पृष्ठ 68 से उद्धृत)।

लाला लाजपत राय यह भी कहते हैं, “मौलाना हसरत मोहानी ने हाल ही में कहा है कि मुसलमान कभी भी ब्रिटिश शासन के अधीन भारत को “डोमिनियन स्टेटस” (अधिराज्य का दर्जा) दिए जाने पर सहमत नहीं होंगे। उनका लक्ष्य भारत में अलग-अलग मुस्लिम राज्यों की स्थापना है, जो हिंदू राज्यों के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय संघीय सरकार के अधीन रहें। वे ऐसे छोटे-छोटे राज्यों के पक्ष में हैं जिनमें हिंदू और मुसलमानों की आबादी सघन और पृथक रूप से बसी हो। यदि साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का सिद्धांत और पृथक निर्वाचक मंडल (सेपरेट इलेक्ट्रोरेट) कायम रहना है, तो मौलाना हसरत मोहानी की छोटी प्रांतों वाली योजना ही एकमात्र व्यवहार्य प्रस्ताव प्रतीत होती है।

मेरी योजना के अनुसार, मुसलमानों के चार मुस्लिम राज्य होंगे —(1) पठान प्रांत या उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, (2) पश्चिमी पंजाब, (3) सिंध, और (4) पूर्वी बंगाल। यदि भारत के किसी अन्य भाग में भी पर्याप्त रूप से बड़ी और सघन मुस्लिम आबादी मौजूद है, तो उन्हें भी इसी प्रकार अलग प्रांत के रूप में गठित किया जाना चाहिए। लेकिन यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि यह एक संयुक्त भारत नहीं है। इसका अर्थ है — भारत का साफ-साफ विभाजन, एक मुस्लिम भारत में और एक गैर-मुस्लिम भारत में” (ए जी नूरानी, पृष्ठ 69 से उद्धृत)।

लाला हरदयाल ने 1925 में वही दृष्टिकोण अभिव्यक्त किया जो लाला लाजपत राय के यह व्यक्त हुआ है। उन्होंने प्रताप (लाहौर) में अपने राजनीतिक इच्छापत्र निम्नलिखित रूप में प्रकाशित करवाया। उनके अनुसार, “मैं घोषणा करता हूँ कि हिंदुस्तान और पंजाब की हिंदू जाति का भविष्य इन चार स्तंभों पर टिका है:

(1) हिंदू संगठन, (2) हिंदू राज, (3) मुसलमानों का शुद्धिकरण, और (4) अफ़ग़ानिस्तान और सीमाप्रांत पर विजय तथा उनका शुद्धिकरण। जब तक हिंदू राष्ट्र ये चारों कार्य सिद्ध नहीं कर लेता, हमारे बच्चों और प्रपौत्रों की सुरक्षा भी ख़तरे में रहेगी, और हिंदू जाति की सुरक्षा असंभव रहेगी। हिंदू जाति का केवल एक ही इतिहास है, और उसकी संस्थाएँ एकरूपी हैं।

परंतु मुसलमान और ईसाई हिंदू धर्म की सीमाओं से बहुत दूर हैं, क्योंकि उनके धर्म पराये हैं और उनका झुकाव फ़ारसी, अरब और यूरोपीय संस्थाओं की ओर है… यदि हिंदू स्वयं की रक्षा करना चाहते हैं, तो उन्हें अफ़ग़ानिस्तान और सीमाप्रान्तों पर विजय प्राप्त करनी होगी और सभी पर्वतीय जनजातियों को धर्मान्तरित करना होगा (उद्धरण: B.R. Ambedkar, Pakistan or the Partition of India, 1946, पृ. 117; ए जी नूरानी , पृष्ठ 69 से उद्धृत)।

आर्य समाजी मुंशी राम (1857–1926), जिन्होंने संन्यास ग्रहण कर स्वामी श्रद्धानंद का रूप धारण किया, 1920 के दशक के प्रारंभ में पुनर्जीवित हुई हिंदू महासभा से उभरे हिंदू संघठन आंदोलन के प्रमुख संस्थापकों में से एक थे। श्रद्धानंद ने आग्रह किया कि ब्राह्मणों को अपने बीच की जातिगत भेदभावों को समाप्त करनी चाहिए, और यह कि क्षत्रिय, खत्री, जाट, गुर्जर तथा अन्य जातियों के आचरण को ही किसी हिंदू के वर्ण निर्धारण का आधार बनना चाहिए। लेकिन सभी जातियों के बीच सहभोजन (एक साथ भोजन करने) की प्रथा तुरंत आरंभ की जानी चाहिए—हालाँकि यह मुसलमानों की तरह एक ही प्याले और थाली से मिश्रित रूप से खाने जैसी न हो, बल्कि यह व्यवस्था हो कि शुद्ध-स्वच्छ शूद्रों द्वारा परोसे गए भोजन को सब अपने-अपने अलग बर्तनों में ग्रहण करें।

श्रद्धानंद ने पूरे भारत में हिन्दी और देवनागरी लिपि को अपनाने का आग्रह किया, और हिंदू राष्ट्रीय एकता तथा संगठन की दिशा में प्रथम कदम के रूप में प्रत्येक नगर और प्रमुख शहर में एक हिंदू राष्ट्र मंदिर के निर्माण का प्रस्ताव रखा। यह मंदिर उत्तरी भारत की प्रमुख मस्जिदों जितने लोगों को समायोजित कर सके, ऐसा होना चाहिए।हिंदू राष्ट्र मंदिर की आधारशिला गौ माता की पूजा, ज्ञान की देवी की आराधना और मातृभूमि की उपासना पर आधारित होगी।(Bhatt, Hindu Nationalism, pp61-8; ए जी नूरानी, पृष्ठ 71 से उद्धृत)।

हिन्दू महासभा जिसकी स्थापना 1907 में हो गई थी, 1925 तक आते-आते एक सशक्त हिंदू महासभा बन चुकी थी, जिसका नेतृत्व मदनमोहन मालवीय और लाला लाजपत राय जैसे व्यक्तियों के हाथ में था, जो आर.एस.एस. के समान ही विश्वदृष्टि रखते थे।

ए जी नूरानी यह सवाल उठाते हैं कि मजबूत हिन्दू महासभा के होते हुए फिर आर.एस.एस. की स्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ी? अपने प्रश्न का उत्तर देते हुए वे स्वयं लिखते हैं, “इसके दो स्पष्ट कारण थे।पहला, हिन्दू महासभा के नेता राजनेता थे, जो चुनाव लड़ते थे। मालवीय और लाजपत राय केंद्रीय विधायी परिषद (Central Legislative Assembly) के सदस्य थे। दूसरा, वे हिंसा से घृणा करते थे।

उन्नीसवीं सदी से हिंदू पुनर्जागरण के जो प्रमुख नेता हुए— और जो उनसे सहानुभूति रखते थे— वे सभी संस्कृति, विद्वत्ता और गरिमा के प्रतीक थे— दयानंद सरस्वती, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, विवेकानंद, अरविंद घोष, लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और मदनमोहन मालवीय। इसके विपरीत, आर.एस.एस. के नेता— हेडगेवार से लेकर गोलवलकर और आज तक— बिल्कुल भिन्न प्रकार के रहे हैं। वे कठोर, अशिक्षित और अधिनायकवादी हैं। वे घृणा फैलाते हैं और हिंसा का महिमामंडन करते हैं” (ए जी नूरानी, पृष्ठ 71 से उद्धृत)।

बंकिमचंद्र और 19वीं सदी के अंतिम दशकों और बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में जिस मुस्लिम विरोधी राष्ट्रवाद का उदय हो रहा था, उसे देश ने पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर लिया था। बंकिम के ही राज्य बंगाल में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने हिन्दुत्व प्रेरित सांप्रदायिक राष्ट्रवाद को पूरी तरह से नकार दिया था। दरअसल वे राष्ट्रवाद की अवधारणा को भी सही नहीं मानते थे। वे राष्ट्रवाद की जगह मानवतावाद को सही मानते थे।

रवींद्रनाथ के लिए मानवतावादी दृष्टि कोई अमूर्त विचारधारा नहीं थी। उसमें राष्ट्र की स्वाधीनता का विरोध नहीं था। लेकिन वे ऐसे किसी राष्ट्रवादी नज़रिए की हिमायत करने के लिए तैयार नहीं थे, जो अपने ही देश के नागरिकों को धर्म और जाति के आधार पर विभाजित करता है।

‘घरे बाइरे’ (1916) की पृष्ठभूमि में स्वदेशी आंदोलन ही नहीं है, बल्कि सांप्रदायिकता का वह उभार भी है, जो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विभाजन रेखा खींचता है। जिस सांप्रदायिकता के जहर को उन्होंने बीसवीं सदी के पहले दशक में पहचान लिया था और उसके प्रति देश को सावधान किया था, वही बाद में प्रबल होकर देश के विभाजन का कारण बना।

उपन्यास कई स्तरों पर उन विचारों से टकराता है जो देश को विघटन की ओर ले जाते हैं। उनका मानवतावादी विचार हर तरह की संकीर्णता और सांप्रदायिकता से ही मुक्त नहीं है, बल्कि उसके मूल में स्वाधीनता, समानता और धर्मनिरपेक्षता का भाव समाहित है।

यह उपन्यास इस बात को कई-कई ढंग से कहता है, कभी बहुत शांत और संयमित भाषा में और कई बार बहुत रोष और तीखेपन के साथ भी। यहां तक कि वे ऐसी बहुत सी बातों की आलोचना करने से नहीं हिचकते, जिनके कारण उन्हें गलत भी समझा जा सकता था।

बंकिमचंद्र के उपन्यास आनंदमठ जिसमें देश को देवी और माँ बताया गया, रवींद्र इस धारणा को पूरी तरह से नकार देते हैं। देश को देवी और मां समझकर पूजा करने को वे उचित नहीं समझते। वंदे मातरम का नारा उस दौर में बंगाल में ही सबसे ज्यादा गूंज रहा था, उन नारों के पीछे निहित खतरे को वे बहुत गहराई से महसूस करते थे। आज फिर एक बार हम उस खतरे से दो चार हो रहे हैं।

स्वदेशी आंदोलन के दौरान जब रवींद्रनाथ ने देखा कि स्वदेशी वस्तुएं खरीदने और बेचने का दबाव निम्नजाति के गरीब हिंदुओं और मुसलमानों पर डाला जा रहा है, तो उन्होंने इस प्रवृत्ति की तीखी आलोचना की (बंगाल में स्वदेशी आंदोलन, पृ. 56)। उन्होंने देखा कि स्वदेशी का समर्थन न करने वाले लोगों को डराया-धमकाया जाता है, उन पर हमला किया जाता है। इन प्रवृत्तियों ने ही उस दौर में ऐसे हालात पैदा किये कि जगह-जगह दंगे होने लगे। इन्हीं सब घटनाओं ने उन्हें ‘घरे-बाइरे’ उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित किया।

उपन्यास का प्रकाशन 1916 में हुआ लेकिन इसमें वर्णित घटनाओं का काल 1907 है। यह एक ज़मींदार निखिलेश चौधरी और उनकी पत्नी बिमला की कहानी है। निखिलेश ‘नष्टनीड़’ के भूपति की तरह इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है जो उसी की तरह आधुनिक सोच का एक उदारवादी ज़मींदार है और राजनीतिक रूप से जागरूक भी। उसकी पत्नी बिमला एक घरेलू स्त्री है, लेकिन निखिलेश चाहता है कि वह घर के दायरे में अपने को कैद रखने की बजाय बाहर की दुनिया से भी अपने को जोड़े।

इस उपन्यास का एक अन्य प्रमुख पात्र संदीप उस दौर में राष्ट्रवाद की उस संकीर्णतावादी दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे वे देश के लिए ही नहीं मानवजाति के लिए भी काफी खतरनाक समझते हैं। संदीप को एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में चित्रित करते हुए भी अपने प्रतिगामी विचारों के कारण रवींद्र की थोड़ी भी सहानुभूति उसे नहीं मिली है। इस उपन्यास में रवींद्र के विचार निखिलेश के माध्यम से व्यक्त हुए हैं, जिसे काफी हद तक रवींद्र का वैचारिक प्रतिरूप कहा जा सकता है।

उपन्यास में एक जगह निखिलेश कहता है, “मैं देश की सेवा करने के लिए तैयार हूं, पर देश की वंदना करना देश का सत्यानाश करना है” (घर और बाहर, पृ. 14)। स्पष्ट ही यहां संकेत वंदेमातरम की तरफ है जिसका नारा लगाते हुए उस दौर में युवक गरीबों पर, मुसलमानों पर हमला करते थे। यहां तक कि वह देश को मां या देवी कहकर पूजने को भी सही नहीं ठहराता।

वह एक जगह कहता है, “मेरा विश्वास है कि जो लोग देश को साधारण और सत्य भाव से देश समझकर, मनुष्य पर मनुष्यवत श्रद्धा रखकर सेवा और भक्ति का उत्साह नहीं पाते, जो गुल मचाकर मां कहकर, देवी कहकर, मंत्र पढ़कर केवल उत्तेजना की ही खोज में रहते हैं, उनके मन में देशभक्ति नहीं बल्कि नशेबाजी का ध्यान रहता है” (वही, पृ.30)।

एक और जगह निखिलेश संदीप से बहस करते हुए कहता है, “भारतवर्ष यदि कोई वास्तविक वस्तु है तो उसमें मुसलमान भी मौजूद है” (वही, पृ. 133)। एक जगह मास्टर चंद्रनाथ के मुख से रवींद्र कहलाते हैं कि “देश से मतलब देश की मिट्टी नहीं है, बल्कि देश की जनता है”।

चंद्रनाथ स्वदेशी के समर्थक युवाओं को पूछते हैं, “इस जनता की ओर कभी पहले तुमने दृष्टि उठाकर देखा हैॽ आज अकस्मात् बीच में कूदकर बताते हो कि वह नमक खाओ, यह नमक मत खाओ, यह कपड़ा मत पहनो, वह कपड़ा पहनो। यह सब अत्याचार जनता क्यों सहेगी और हम क्यों सहने देंगेॽ (वही, 103)”।

सत्यजित राय ने इस उपन्यास पर बांग्ला में 1984 में फ़िल्म बनाई थी। फ़िल्म में काफी हद तक रवींद्र के विचारों को अक्षुण्ण रखा है। मसलन, एक जगह बिमला संदीप से बात करते हुए कहती है कि मेरे पति कहते हैं कि जिस काम से गरीबों को तकलीफ होती है, उससे देश का भला नहीं हो सकता। इसी तरह निखिलेश हिंदुओं की एक सभा में कहता है कि मुसलमानों के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती।

रवींद्र उस राष्ट्रवाद को घातक मानते हैं, जो दूसरे देशों के प्रति शत्रुता और विद्वेष बढ़ाता हो। संदीप से बहस करते हुए निखिलेश कहता है कि देश की “पूजा करने को मैं मना नहीं करता। पर अन्य देशों में जो नारायण है, उसके प्रति विद्वेष रखते हुए यह पूजा किस प्रकार पूर्ण हो सकती हैॽ” (वही, पृ. 25)

संदीप बाज़ार में स्वदेशी को लेकर भाषण देता है। उसकी मुसलमानों से कहा-सुनी हो जाती है। मुसलमान उससे कहते हैं कि आप जो कहते हैं, वह हम अपने ज़मींदार के मुख से सुनना चाहते हैं। संदीप उनसे कहता है कि उनका ज़मींदार मेरा दोस्त है और मैं उसीके यहां रहता हूं। इस पर मुसलमान कहते हैं कि अगर तुम्हारी बात मानलें तो हम खायेंगे क्या और जियेंगे कैसेॽ

बाद में संदीप अपने लोगों के बीच कहता है कि अगर क्रांति के रास्ते में समझौता किया तो, क्रांति कैसे आगे बढ़ेगीॽ अब शब्दों से काम नहीं चलेगा, कोई दूसरा रास्ता अपनाना होगा। इसके बाद ही स्वदेशी के कुछ युवा कार्यकर्ता मुसलमानों से उनका सामान छीनकर जला डालते हैं। संदीप इस हमले को दूर से देखता है। उपन्यास की तरह फ़िल्म में भी संदीप को एक कमजोर चरित्र का व्यक्ति बताया गया है। एक ओर वह स्वदेशी के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है, तो दूसरी ओर वह स्वयं बेझिझक विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल करता है। रेल में प्रथम श्रेणी में यात्रा करना पसंद करता है।

बिमला इस बात में यकीन करने लगती है कि संदीप सचमुच सच्चा देशभक्त है। वह उसे हर तरह की मदद करने के लिए तैयार हो जाती है। मीरज़ान नामक एक मुसलमान नाविक के जहाज को डुबोने की साजिश करता है और मुक़दमेबाजी से बचने के लिए जब उसे रुपये की ज़रूरत पड़ती है, तो वह बिमला से मांगने में नहीं हिचकिचाता। इसके लिए वह दलील देता है कि देश में जो भी धन है, वह देश का है।

बिमला उसकी बातों में आकर अपने घर में ही चोरी करने के लिए तैयार हो जाती है। जब संदीप उससे आंदोलन के नाम पर छह हजार रुपये मांगता है और उसे अपने पति की अलमारी में रुपये नहीं मिलते, तो वह सोने की गिन्नियां संदीप और अमूल्य को लाकर दे देती है।

अमूल्य 17 वर्ष का युवक है और संदीप के गहरे प्रभाव में है। उसमें देश के लिए कुछ भी कर गुजरने का सच्चा जज्बा है। वह भगवद्गीता के इस विचार से बहुत प्रभावित है कि मरता शरीर है, आत्मा नहीं। अमूल्य के संदर्भ में गीता का उल्लेख उपन्यास में भी है। उपन्यास में अमूल्य जेब में गीता भी रखता है और पिस्तौल भी जबकि फ़िल्म में उसके पास पिस्तौल ही रहती है, लेकिन वह गीता के श्लोक द्वारा अपनी जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करता है। स्वतंत्रता आंदोलन में गीता का प्रभाव काफी व्यापक रहा है।

लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि रवींद्र गीता के दर्शन के राजनीतिक उपयोग से सहमत नहीं है, जो हत्या को जायज ठहराता है। वह युवकों पर गीता के प्रभाव को सही नहीं समझते। बिमला और अमूल्य की पहली मुलाक़ात में अमूल्य द्वारा गीता के श्लोक के वाचन द्वारा वे इसी प्रभाव की ओर ही संकेत करते हैं। यह गीता के प्रभाव का ही नतीजा होता है कि वह सरकारी खजाने को पिस्तौल के बल पर लूटता है और वहां पहरा देने वाले मुसलमान पहरेदार को घायल भी कर देता है।

लेकिन यही अमूल्य संदीप की चारित्रिक कमजोरियों को पहचान जाता है और उसके प्रभाव से बाहर भी निकलने लगता है और बिमला को भी सावधान करता है। संदीप के कार्यकर्ताओं द्वारा वंदे मातरम का नारा लगाते हुए मुसलमानों की बस्ती में आग लगाने, उन्हें लगातार परेशान करने का नतीजा यह होता है कि ढाका से मौलवी आकर मुसलमानों को हिंदुओं के विरुद्ध भड़काने लगते हैं। इससे दंगा होने का भय मंडराने लगता है।

निखिलेश हिंदुओं के नेताओं को अपने यहां बुलाकर उन्हें समझाने की कोशिश करता है। वह उन्हें कहता है कि “मुसलमानों को दोष देने से पहले हमें यह देखना चाहिए कि हम खुद उनके साथ कैसा व्यवहार करते हैं। जो उनका हक़ है क्या हमने उन्हें दिया है। मुसलमानों के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती”। लेकिन हिंदू नेताओं पर उसकी बात का कोई असर नहीं होता। संदीप की तरह हिंदू नेता भी यही कहते हैं कि मुसलमानों को दबाकर रखना ज़रूरी है।

आनंदमठ और घरे-बाइरे की तुलना से स्पष्ट है कि आनंदमठ में संन्यासियों द्वारा मुसलमानों के प्रति जो नफरत और घृणा का रवैया अपनाया गया है, घरे-बाइरे में वैसा बिल्कुल भी नहीं हैं। बँकिंचन्द्र इस देश को हिंदुओं का देश मानते हैं और मुसलमानों को हमलावर जबकि रवींद्र के लिए यह देश हिंदुओं और मुसलमानों दोनों का है। उनके अनुसार मुसलमानों के बिना देश की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

रवीन्द्रनाथ टैगोरे बंकिम के वंदे मातरम गीत की आलोचना भी इसीलिए करते हैं कि उननके यहाँ भारत माता की संकल्पना हिन्दू देवी के रूप में की गई है, न कि ऐसी माता के रूप में जो केवल हिंदुओं की माता न हो। आनंदमठ (1882) में जिस हिन्दू राष्ट्रवाद की संकल्पना बंकिमचंद्र ने रखी थी और जिसमें मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं थी उसे लाला लाजपत राय, लाला हरदयाल, स्वामी श्रद्धानंद के यहाँ आते-आते द्विराष्ट्र के सिद्धांत में रूपांतरित हो गई थी जहां हिन्दू एक अलग राष्ट्र था और मुसलमान एक अलग राष्ट्र।

वंदेमातरम गीत के पहले दो अंतरे को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार कर शेष को अस्वीकार कर सच्चे देशभक्तों ने 1937 में ही स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था भी व्यक्त कर दी थी। नरेंद्र मोदी वंदे मातरम के तीन धार्मिक अंतरों के समर्थन में खड़े होकर सांप्रदायिक राष्ट्रवादी होने का एक बार फिर से प्रमाण दे दिया है।

आधार ग्रंथ

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय : आनंदमठ (उपन्यास), 2016, हिंदी अनुवाद, लोकभारती पेपरबैक्स, इलाहाबाद।
बंकिम समग्र : संपादक (हिंदी) : निहालचंद्र वर्मा, 1987, हिंदी प्रचारक संस्थान, वाराणसी।
घर और बाहर (उपन्यास) : रवींद्रनाथ टैगोर, अनुवाद : रघुकुल तिलक, द्वितीय संस्करण : मार्च, 1925, प्रकाशक : शिवनारायण मिश्र वैद्य, प्रकाश पुस्तकालय, कानपुर।
संदर्भ ग्रंथ

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मीनाक्षी मुखर्जी : आनंदमठ : ए पोलिटिकल मिथ, इकॉनोमिकल एंड पोलिटिकल वीकली, मई, 29, 1982।
तनिका सरकार : बर्थ ऑफ ए नेशन : ‘वंदे मातरम्’ , ‘आनंदमठ’ एंड हिंदू नेशनहुड, इकॉनोमिकल एंड पोलिटिकल वीकली, सितंबर, 16-22, 2006।
चंद्रिमा चक्रवर्ती : रीडिंग आनंदमठ, अंडरस्टेंडिंग हिंदुत्व : पोस्टकोलोनियल लिटरेचर्स एंड पॉलिटिक्स ऑफ केननॉइज़ेशन, 2006, पोस्ट जर्नल सिस्टम्स।
इशा तिर्के : अंडरस्टेंडिंग बंकिमचंद्र चटर्जी’ज व्यूज ऑन नेशनलिज्म, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इन्नोवेटिव स्टडीज इन सोशयोलॉजी एंड ह्युमनिटिज, मार्च, 2019।
A.G.Noorani : The RSS: A Menace to India, 2019, Leftword, New Delhi.

Ramswaroop Mantri

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