सुसंस्कृति परिहार
बाॅस के इशारे पर नहीं नाचे तो कुछ भी हो सकता है। भारत के साथ ऐसा ही व्यवहार आजकल बुड़बक डोनाल्ड ट्रम्प का चल रहा है। चाबहार प्रोजेक्ट भारत के आयात निर्यात को बढ़ाने में मील का पत्थर था। जिसके ज़रिए पाकिस्तान की भूमि को बिना छुए भारत मध्य एशिया के तमाम देशों से चाबहार बंदरगाह सीधे सड़क- रेलमार्ग से जुड़ जाता।ओमान की खाड़ी के तट पर दक्षिण-पूर्वी ईरान में स्थित चाबहार शहर में एक बंदरगाह है। यह ईरान के एकमात्र समुद्री बंदरगाह के रूप में कार्य करता है,इसे भारत, ईरान और अफगानिस्तान के सहयोग से संयुक्त रूप से विकसित किया गया है।इसे पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित और प्रबंधित ग्वादर पोर्ट के रणनीतिक जवाब के तौर पर भी देखा जाता रहा है

विदित हो,भारत ने 2003 में ही चाबहार बंदरगाह विकसित करने का प्रस्ताव रखा था।तब से इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई जिसके लिए राजनैतिक परिस्थितियां जिम्मेदार रहीं और 2012-13 के बाद इसमें तेजी से काम की पहल शुरू हुई चूंकि
ईरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए बेहद अहम ट्रेड हब है। 2016 से भारत ने यहां पर निवेश किया जा रहा है। इस पोर्ट को विकसित करने के लिए हमने 4,700 करोड़ रुपए का निवेश किया हुआ है।
दरअसल अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा रखे हैं, जिससे चाबहार बंदरगाह से होने वाला व्यापार भी शामिल है. भारत 2024 के 10 वर्षीय समझौते के तहत ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रहा है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास में भारत की लगभग एक दशक पुरानी और उतार-चढ़ाव भरी भागीदारी अब समाप्त होती दिख रही है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 12 जनवरी को कहा था कि जो भी देश ईरान के साथ कारोबार करेगा, उस पर अमेरिका के साथ किए जाने वाले किसी भी और हर तरह के व्यापार पर 25 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया जाएगा। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ने चाबहार से कंट्रोल छोड़ दिया है। दावा किया गया है कि ट्रंप के आगे मोदी सरकार ने सरेंडर कर दिया है जिससे भारत को फिलहाल करीबन 1100 करोड़ का सीधा नुकसान हुआ बताया गया है।
अमेरिका ने ईरान पर 29 सितंबर 2025 को अतिरिक्त प्रतिबंध लगाते हुए कहा था कि ईरान के चाबहार बंदरगाह का संचालन करने वाले लोगों पर सितंबर महीने के अंत से प्रतिबंध लागू होंगे।अमेरिका ने 2018 में चाबहार पर भारत के कारोबार को छूट दी थी। मगर पिछले साल अमेरिका ने छूट वापस लेने का फैसला किया हालांकि बाद में अप्रैल 2026 तक बिना प्रतिबंध काम करने की मंजूरी दे दी।कांग्रेस का कहना है कि अप्रैल के बाद अमेरिकी प्रतिबंध फिर से लागू हो जाएंगे, लेकिन विदेश मंत्रालय का कहना है कि हम अमरीका से बात कर रहे हैं इन ख़बरों और अटकलों को देखते हुए भारत सरकार ने बीते शुक्रवार को जवाब दिया है। भारत सरकार का कहना है कि चाबहार के संचालन को जारी रखने के लिए वह अमेरिका के अलावा ईरान के साथ भी संपर्क बनाए हुए है। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से ये दावा किया गया था कि भारत अब ईरान के चाबहार पोर्ट से दूरी बना रहा है।यह भी सामने आया है कि इस प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों की वापसी भी शुरू हो गई है।
आ रही खबरों की मानें तो यह सच है कि अमेरिका के दवाब में हमारे साहिब जी फिर घुटने टेक कर सरेंडर कर दिया। कहा जा रहा है कि यह समझौता अप्रेल 2026 में ख़त्म होना है। हालात तो ऐसे बन रहे हैं कि इससे पहले ही यह बंद ना हो जाए। क्योंकि बंदरगाह से दूरी बनाने का मतलब तो यही है कि सब कुछ हमने वहां जो लगाया है वह को दिया है।अब ईरान और अमेरिका से संपर्क बनाने की बात कहना बेमानी है।हम तो घर के रहे ना घाट के। अमेरिका हमारा बेशकीमती प्रोजेक्ट ले उड़ा।यानि सीधे-सीधे यह हमारी हार का प्रतीक है।
सच्ची बात यह है कि भारत अमेरिका दादागिरी का बुरी तरह शिकार बनता जा रहा है। वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति हरण के बाद डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर आधिपत्य की चेतावनी सब मिलकर लगता है। कि सरेंडर बाबू अब चीन की चौखट पर माथा रगड़ रहे हैं और अमरीका के खौफ को सहजता से झेलते जा रहे हैं। उन्हें सिर्फ सत्ता सुरक्षित रखनी है।भले ही भारत भूमि चीन हड़प ले या अमेरिका हमारे आर्थिक व्यापार को तहस नहस कर डाले।




