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भारत के क्रिमिनल लॉ में 77 बार बदलाव और संशोधन किए गए

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कानून बनाया जाए मगर ये दंड के सिद्धांत पर पर आधारित ना हो। पुराने कानून भी लागू रहेंगे मगर नए कानून में इसमें कुछ बदलाव हुए है। नए कानून भी बनाए गए 77 बार क्रिमिनल लॉ में बदलाव और संशोधन किए गए है। मगर कोई केंद्रीकृत कानून नहीं बनाया गया।भारत के प्रमुख हिंदी समाचार पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम की 23वीं वर्षगाँठ पर नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में ‘विचार संगम’ कार्यक्रम के आयोजन के दौरान भारत के न्याय और लोकतंत्र के बीच तालमेल पर चर्चा की गई है। इस दौरान उदय सहाय, अश्विनी दुबे और आशुतोष पाठक ने चर्चा में शिरकत की है

चर्चा के दौरान उदय सहाय ने कहा कि अब वॉटर कैनन, लाठीचार्ज और फायरिंग का उपयोग लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए किया जा सकता है। फोर्स का उपयोग गलत तरीके से हुआ या नहीं ये देखना जरुरी होता है। उन्होंने अन्य सवाल का जवाब देते हुए कहा कि न्यूज परसेप्शन लोगों के काफी अलग है। सुरक्षा की स्थिति अगर मन में नहीं होती है तो ये गलत होता है। महिलाओं में खासतौर से दिल्ली जैसे शहर में असुरक्षित माहौल महसूस होता है। कांग्रेस, बीजेपी, आम आदमी पार्टी के एजेंडा में ये मुद्दा नहीं है। ये जरुरी है कि देश में लॉ एन्फोर्समेंट के महत्व को समझा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि जो न्याय की प्रक्रिया है उसे पुख्ता तरीके से लागू किया जाए।

अश्विनी दुबे ने कहा कि भारत की जो न्यायिक व्यवस्था में जबतक अंतिम अदालत से फैसला नहीं होता तबतक दोषी को नहीं माना जाता है। कई मामलों में राष्ट्रपति से भी फैसले की सुनवाई की जाती है। 1860 में लॉर्ड मैकाले ने अपनी सुविधा के लिए कानून बनाया था, जो कि आजादी के 75 वर्षों तक जारी रहा है। ये कानून बदलना था मगर कानून उस तरह से नहीं बदले थे। एक प्रश्न सभी के सामने खड़ा हुआ था कि कानून बनाया जाए मगर ये दंड के सिद्धांत पर पर आधारित ना हो। पुराने कानून भी लागू रहेंगे मगर नए कानून में इसमें कुछ बदलाव हुए है। नए कानून भी बनाए गए 77 बार क्रिमिनल लॉ में बदलाव और संशोधन किए गए है। मगर कोई केंद्रीकृत कानून नहीं बनाया गया। अकाउंटेबिलिटी भी कानून में काफी अहम है। पुलिस की अकाउंटेबिलिटी भी पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है। पुलिस के लिए कानून बनाया गया है कि उसे समयबद्ध तरीके से कार्रवाई करनी होगी। 

कानून में न्यायपालिका की अकाउंटेबिलीटी भी तय की गई है जिसके जरिए समय में न्याय और फैसला देने को कहा गया है ताकि अन्य आरोपी या पीड़ित समय पर आगे की कार्रवाई कर सके। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक जैसे अपराध आ गए है। वहीं दूसरी तरफ प्रोग्रेसिव पार्ट में कोई विकास नहीं हुआ है। 

आशुतोष पाठक ने कहा कि अपराध नहीं होगा तो स्वच्ंछ तरीके से जी सकेंगे। ऐसे मुक्त समाज को कानूनों के घेरे में लाया गया है। उन्होंने कहा कि जब अपराध हद से गुजर जाता है तो बाबा का बुल्डोजर जैसे कदम उठाए जाते है। इतना बुल्डोजर नहीं चलता है मगर दिखाया अधिक जाता है। मीडिया को संयमित रुप से अपराध को रिपोर्ट करना चाहिए। बाबा का बुल्डोर ही न्याय का उल्लंघन ना करने लगे इसका ध्यान रखना होगा। अपराधी को ही विचलित होने की जरुरत है। मीडिया को अपना चरित्र बहाल कर चलना चाहिए।

Ramswaroop Mantri

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