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NEP 2020 के तहत इतिहास में बदलाव: रुचिका शर्मा ने तथ्यों के साथ उठाए सवाल

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          इतिहास का मूल उद्देश्य स्मृतियों का संकलन नहीं, बल्कि विवेक का निर्माण है। वह हमें यह सिखाता है कि सत्ता कैसे स्वयं को वैध ठहराती है, समाज किस तरह बदलता है और विचारधाराएँ किस प्रक्रिया में जन्म लेती हैं। इतिहास का छात्र जब किसी निष्कर्ष तक पहुँचता है, तो वह केवल अतीत नहीं समझता, बल्कि वर्तमान को पहचानने की क्षमता भी अर्जित करता है। किंतु यदि इतिहास पढ़ाने से पहले ही यह तय कर लिया जाए कि कौन नायक है और कौन खलनायक, तो शिक्षा की यह प्रक्रिया आरंभ होने से पहले ही समाप्त हो जाती है।

          नई शिक्षा नीति 2020 बड़े आत्मविश्वास के साथ यह दावा करती है कि वह छात्रों में विश्लेषणात्मक और आलोचनात्मक क्षमता का विकास करेगी। यह दावा सुनने में आकर्षक लगता है, प्रेरक भी। किंतु जैसे ही हम कक्षा 6 से 8 तक की इतिहास और सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों को ध्यान से पढ़ते हैं, यह स्पष्ट हो जाता है कि नीति और व्यवहार के बीच एक गहरी खाई है। यह खाई साधारण नहीं है; यह वैचारिक है।

पहले तय किया गया इतिहास:

          इन पाठ्यपुस्तकों में इतिहास किसी खोज की तरह सामने नहीं आता, बल्कि एक सुनाए गए फैसले की तरह प्रस्तुत होता है। छात्र को यह नहीं बताया जाता कि उसने क्या सोचना है, बल्कि यह बताया जाता है कि उसे क्या मान लेना है। सुल्तान और मुगल शासकों के संदर्भ में ‘क्रूर’ और ‘निर्दयी’ जैसे शब्द ऐसे प्रयुक्त किए गए हैं मानो वे आत्मसिद्ध हों। कहीं यह नहीं बताया गया कि क्रूरता को मापने का ऐतिहासिक पैमाना क्या है, किस संदर्भ में यह निर्णय लिया गया है और किन शासकों से तुलना की जा रही है। इतिहास में निष्कर्ष तक पहुँचने की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि वही प्रक्रिया हटा दी जाए और केवल अंतिम निर्णय परोसा जाए, तो छात्र के पास सोचने के लिए कुछ शेष नहीं रहता। वह केवल स्मरण करता है, विश्लेषण नहीं करता।

अंधकार युग’ : इतिहास नहींविचारधारा:

          मध्यकाल को ‘अंधकार युग’ कहकर प्रस्तुत करना इसी समस्या का विस्तार है। आधुनिक इतिहास लेखन ने इस शब्द को बहुत पहले त्याग दिया था, क्योंकि मानव इतिहास में कोई भी ऐसा काल नहीं रहा जिसमें रचनात्मकता, सामाजिक परिवर्तन या बौद्धिक विकास पूरी तरह रुक गया हो। फिर भी यह शब्द पाठ्यपुस्तकों में लौट आता है—बिना व्याख्या, बिना संदर्भ, बिना प्रश्न।

          इस शब्द की वैचारिक जड़ें स्पष्ट हैं। यह इतिहास की खोज से नहीं, बल्कि सावरकर की उस दृष्टि से आता है जिसमें प्राचीन आर्य काल स्वर्ण युग है और उसके बाद का समय पतन का। अहिंसा को कमजोरी और बौद्ध प्रभाव को सभ्यता का क्षय मानने वाली यह दृष्टि इतिहास नहीं, बल्कि वैचारिक पुनर्लेखन है। विडंबना यह है कि जिस अहिंसा को पतन का कारण बताया जाता है, उसी ने भारत को स्वतंत्रता दिलाई और उसी के कारण गांधी वैश्विक नैतिक प्रतीक बने।

जब आप पहले ही यह घोषित कर देते हैं कि कोई काल ‘अंधकार’ है, तो छात्र के लिए उसमें उजाले खोजने की कोई संभावना नहीं बचती।

मंदिर विध्वंस और अधूरा सत्य:

          इतिहास में मंदिर विध्वंस का प्रश्न अत्यंत जटिल है। यह केवल धर्म से नहीं, बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था और सत्ता से जुड़ा हुआ है। किंतु पाठ्यपुस्तकों में इसे लगभग पूरी तरह धार्मिक उन्माद के रूप में प्रस्तुत किया गया है—और वह भी चुनिंदा शासकों के संदर्भ में। यह तथ्य छुपा लिया जाता है कि मंदिर उस समय केवल पूजा-स्थल नहीं थे, बल्कि आर्थिक संस्थाएँ थे। वहाँ भूमि, धन, अनाज और कर संचित होते थे। इसलिए वे राजनीतिक संघर्षों का स्वाभाविक लक्ष्य बने। मराठा आक्रमणों, जैन मंदिरों के शैव मंदिरों में रूपांतरण और हिंदू शासकों द्वारा मूर्तिभंजन जैसे उदाहरणों को या तो हटा दिया गया है या पूरी तरह अनदेखा किया गया है। इतिहास को इस प्रकार काट-छाँट कर प्रस्तुत करना बच्चों को सच्चाई नहीं, बल्कि एक पूर्वनिर्धारित भावनात्मक प्रतिक्रिया सिखाता है।

जाति और सांप्रदायिकता : असुविधाजनक यथार्थ:

          नई शिक्षा नीति यह स्वीकार करती है कि 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौतियों में जातिगत भेदभाव और सांप्रदायिकता शामिल हैं। फिर भी इन्हीं चुनौतियों को पाठ्यपुस्तकों से व्यवस्थित ढंग से गायब कर दिया गया है। ‘जाति’ शब्द को ‘सामाजिक वास्तविकता’ जैसे अस्पष्ट पद में बदल देना, अस्पृश्यता और वर्ण-आधारित भेदभाव के संदर्भ हटाना—ये सुधार नहीं, बल्कि पलायन हैं। जाति व्यवस्था कोई छोटी ऐतिहासिक दुर्घटना नहीं है। यह उपमहाद्वीप की सबसे स्थायी और हिंसक सामाजिक संरचना रही है। यदि बच्चे इसे नहीं समझेंगे, तो वे न तो समाज को समझ पाएँगे और न ही लोकतंत्र को।

विज्ञान के विरुद्ध सुविधा:

          आर्य प्रवास का प्रश्न केवल इतिहास का नहीं, बल्कि विज्ञान का भी है। आनुवंशिकी और पुरातत्व के अध्ययन स्पष्ट रूप से बताते हैं कि आर्य लगभग 1500 ईसा-पूर्व के आसपास ईरान क्षेत्र से आए। यह कोई वैचारिक मत नहीं, बल्कि वैज्ञानिक निष्कर्ष है। फिर भी पाठ्यपुस्तकों में इसे ‘सिर्फ़ एक सिद्धांत’ कहकर संदिग्ध बना दिया गया है। यहाँ समस्या यह नहीं है कि कोई वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत की जा रही है। समस्या यह है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों को वैचारिक सुविधा के अनुसार प्रस्तुत किया जा रहा है।

सांस्कृतिक आत्मसात और दोहरा मानदंड:

          इतिहास में भारत ने अनगिनत संस्कृतियों को आत्मसात किया है। वस्त्र, भोजन, भाषा और तकनीक—सब इस प्रक्रिया के प्रमाण हैं। जब अहोम, शक या कुषाण आते हैं, तो इसे सांस्कृतिक आत्मसात कहा जाता है। किंतु जब सुल्तान और मुगल आते हैं, तो केवल आक्रमण और लूट। कुर्ता, अचकन, बंदगला, बिरयानी, समोसा, सिंचाई की तकनीकें—ये सब उसी सांस्कृतिक प्रक्रिया के परिणाम हैं। इन्हें नकारना इतिहास को नहीं, बल्कि वर्तमान को संकुचित करना है।

शिक्षक से डरप्रश्न से डर:

          इतिहास तभी जीवंत होता है जब शिक्षक संदर्भ देता है, प्रश्न उठाता है और संवाद करता है। लेकिन जब पाठ्यपुस्तकें इतनी सीमित हों कि शिक्षक की स्वतंत्रता ही समस्या बन जाए, तब शिक्षा का उद्देश्य ही बदल जाता है। प्रश्न पूछने वाला छात्र ‘नकारात्मक’ नहीं होता। वह लोकतंत्र की नींव होता है।

        सारांशत: इतिहास से डरने का अर्थ है प्रश्नों से डरना। और प्रश्नों से डरने का अर्थ है लोकतंत्र से डरना। यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल ऐसे छात्र तैयार करना है जो न सवाल करें, न असहज हों और न सत्ता को चुनौती दें, तो वह शिक्षा नहीं—अनुशासन का प्रशिक्षण है। इतिहास को बचाना दरअसल भविष्य को बचाना है। और इतिहास तभी बचेगा, जब उसे पूरा, जटिल और असुविधाजनक होने दिया जाएगा।

(रुचिका शर्मा इतिहासकार https://youtu.be/22mEHcbsF58?si=L86B4ahKdzJDvMwU)

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