सिर्फ 39 साल के थे तभी उन्हें मार दिया गया था. मरने से पहले चे ने कहा था, ‘तुम एक इंसान को मार रहे हो, लेकिन उसके विचारों को नहीं मार सकते’। जिस तरह से भारत में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि क्रांतिकारियों को जाना जाता है ठीक उसी तरह चे लैटिन अमेरिका, क्यूबा ही नहीं पूरी दुनिया में युवाओं के हीरो हैं। 1950 और 1960 के दशकों में, चे ग्वेरा सबसे लोकप्रिय अमेरिकी विरोधी आवाज थे। चे डॉक्टर, लेखक, गुरिल्ला नेता, सामरिक सिद्धांतकार और कूटनीतिज्ञ भी थे, जिन्होंने दक्षिणी अमरीका के कई राष्ट्रों में क्रांति लाकर उन्हें स्वतंत्र बनाने का प्रयास किया।
चे का जन्म 14 जून 1928 को अर्जेंटीना में हुआ था। उन्होंने अर्जेंटीना में चिकित्सा में अपना पाठ्यक्रम पूरा किया। लेकिन, 27 साल की उम्र तक, वह व्यापक गरीबी और अमीर और गरीब के बीच की बड़ी खाई को लेकर बेचैन हो गए थे। चे ग्वेरा की “मोटरसाइकिल डायरिज़” के नाम से मशहूर यात्रा वृतांत के अनुसार दक्षिण अमेरिका की यात्रा चे ग्वेरा के जीवन में बहुत बड़ा बदलाव लेकर आई। दक्षिण अमेरिका के हालत जब चे ग्वेरा ने देखे, तो उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। उन्होंने देखा कि कैसे पूंजीवाद ने लोगों को उनके अस्तित्व से अलग कर दिया है और कैसे खदानों में मजदूरों का शोषण किया जा रहा है। इसी गरीबी और शोषण को देख कर उनका झुकाव मार्क्सवाद की तरफ हो गया और चे ने ग़रीब और हाशिये पर धकेले जा चुके लोगों के लिए जीवनभर लड़ने की कसम खाई।
जब चे ग्वेरा ग्वाटेमाला गए, तब समाजवादी सरकार वहां शासन कर रही थी। इस सरकार की अगुवाई राष्ट्रपति जैकब अर्बेंज गुजमान कर रहे थे। गुजमान ने ग्वाटेमाला में भूमि सुधारों की शुरुआती की थी। इन सुधारों के दौरान अमेरिका की यूनाइटेड फ्रूट कंपनी के कारोबारियों को भारी नुकसान हो रहा था। और उनके हित प्रभावित हो रहे थे। तब अमेरिका की सरकार और सीआईए ने मिल कर गुजमान सरकार का तख्तापलट करवा दिया। यह सब देख कर चे ने निष्कर्ष निकाला कि इस गरीबी और आर्थिक विषमता के मुख्य कारण एकाधिकार पूंजीवाद, नव औपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद है, जिनसे छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका – विश्व क्रांति है। वे मार्कसवाद की ओर आकर्षित हुए । यह वही समय था जब फिदेल कास्त्रो क्यूबा की समाजवादी क्रांति की इंजीनियरिंग कर रहे थे। 1955 में, यानी 27 साल की उम्र में चे की मुलाक़ात फ़िदेल कास्त्रो से हुई। फिदेल से मिलने के बाद उनके सहयोगी के रूप में, चे ग्वेरा को कम्युनिस्ट क्रांतिकारी अनुयायियों द्वारा आसानी से स्वीकार कर लिया गया था।
जनवरी 1959 में, क्यूबा में बतिस्ता शासन को उखाड़ फेंकने के बाद, फिदेल कास्त्रो की सरकार में ग्वेरा ने कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए और साथ ही सारे विश्व में घूमकर क्यूबा के समाजवाद के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाया। चे सोवियत संघ से नाभिकीय प्रक्षेपास्त्र ले कर आए, जिनसे 1962 के क्यूबन प्रक्षेपास्त्र संकट की शुरुआत हुई और सारा विश्व नाभिकीय युद्ध के कगार पर पहुँच गया।
1959 में उनने भारत की भी यात्रा की। रिपोर्टों से पता चलता है कि इस यात्रा में प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ उनकी बैठक हुई। यात्रा के बाद उनने भारत रिपोर्ट लिखी थी जो फ़िदेल कास्त्रो को सौंपी थी । इस रिपोर्ट में उन्होंने लिखा था, “नेहरू ने न सिर्फ क्यूबा की जनता के समर्पण और उसके संघर्ष में भी अपनी पूरी रुचि दिखाई बल्कि हमें बेशकीमती मशविरे दिए और हमारे उद्देश्य की पूर्ति में बिना शर्त अपनी चिंता का प्रदर्शन भी किया।”
चे ग्वेरा कभी सत्ता के भूखे नहीं थे, उनका लक्ष्य पूरे लैटिन अमेरिका में सामाजिक क्रांति लाना था। उन्होंने नौ बार बोलविया में तख्तापलट करने की कोशिश की और इसी दौरान अक्टूबर 1967 को बोलिविया सेना और सीआईए के हाथों चे ग्वेरा मारे गए।
चे द्वारा किये गये संघर्ष से आज भी करोड़ों लोग प्रेरणा लेते हैं। जिस तरह चे जीते थे, उनके इसी अंदाज और क्रांतिकारी विचारों ने उन्हें “सत्ता विरोधी संघर्ष” का प्रतीक बना दिया है।





