संसद के गलियारों में उस वक्त सन्नाटा पसर गया जब चिराग पासवान ने विपक्ष की ‘संविधान वाली राजनीति’ की धज्जियां उड़ा दीं. चर्चा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ थी, लेकिन चिराग ने इसे ‘अंबेडकर बनाम परिवारवाद’ की जंग बना दिया. भाषण के बीच में चिराग ने 2020 का वो किस्सा छेड़ा, जब उन्हें पीएम मोदी की तस्वीर लगाने से रोका गया था.
विपक्ष पर तंज कसते हुए चिराग बोले, 2020 में इन्हीं लोगों ने मुझसे कहा था कि मोदी जी की फोटो मत लगाओ. मैंने तब भी कहा था और आज फिर डंके की चोट पर कहता हूं- प्रधानमंत्री की फोटो पोस्टर लगाने की जरूरत नहीं है. प्रधानमंत्री मेरे दिल में बसते हैं. जरूरत पड़ेगी तो दिल चीर के दिखा दूंगा.
‘तीन मूर्ति’ तो लग गई, बाबा साहेब क्यों भूले?
चिराग यहीं नहीं रुके, उन्होंने कांग्रेस की दुखती रग पर हाथ रख दिया. उन्होंने सीधे गौरव गोगोई और विपक्षी खेमे की तरफ इशारा करते हुए पूछा, एक ही परिवार के तीन-तीन लोगों की मूर्तियां संसद में लग गईं, लेकिन संविधान बनाने वाले बाबा साहेब की तस्वीर लगाने की सुध क्यों नहीं आई? आप हाथ में संविधान की किताब लेकर घूमते हैं, लेकिन ये सिर्फ दिखावा है. असली सम्मान तो एनडीए ने दिया, जब संसद में अंबेडकर जी की तस्वीर लगाई.
बोलने की जिद… या सदन का अपमान?
विपक्ष के हंगामे पर चिराग ने दो-टूक कहा कि लोकतंत्र जिद से नहीं, जिम्मेदारी से चलता है. ये कौन सी जिद है कि मैं यही बोलूंगा, इसी वक्त बोलूंगा और बिना सबूत के बोलूंगा? इस जिद में न आप खुद बोले, न किसी और को बोलने दिया. हिम्मत है तो सवाल पूछिए, हम जवाब देंगे. पर भागिए मत! चिराग पासवान ने साफ कर दिया कि जो लोग संविधान निर्माता का सम्मान नहीं कर पाए, वो आज संविधान के रक्षक यानी स्पीकर को हटाने की बात कर रहे हैं, जो पूरी तरह हास्यास्पद है.






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