
“संजय कनौजिया की कलम![]()
बिहार के उप मुख्यमंत्री श्री तेजस्वी यादव, 30 दिसम्बर 2022 को नमामि गंगे परियोजना को लेकर होने वाले कार्येक्रम में हिस्सा लेने के लिए कोलकाता जायेंगे..जहाँ वे बिहार में गंगा नदी की साफ़ सफाई को लेकर चल रही योजनाओं के बारे में बताएँगे..इस समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, भी शामिल होंगे..हालांकि इस समारोह में गंगा नदी से जुड़े अन्य राज्य के मुख्यमंत्री भी शामिल होंगे..इस सम्बन्ध में जब लोगों ने राष्ट्रीय जनता दल, बिहार प्रदेश के अध्यक्ष श्री जगदानंद सिंह जी, से जानकारी चाही तो उन्होंने बेबाकी से कहा कि “गंगा को अपवित्र करने वाले धन्ना सेठ है..उनके कारखानों का गन्दा पानी गंगा में आ रहा है, गंगा को कैसे पवित्र बनायें इसपर हमारी सरकार, इस दिशा में बात करेगी और भविष्य में गंगा को साफ़ करने के लिए भी काम करती रहेगी”..श्री जगदा बाबू पार्टी के वरिष्ठम नेताओं की श्रेणी में आते है और उनके विवेक से निकले ज्ञान, चिंतन, सोच अनुभव..समाजवाद के प्रथम नायक, डॉ० राममनोहर लोहिया जी, के विचारों, सिद्धांतों और कार्येक्रमों की दिखाई दशा और दिशा की धूरि पर ही रहती है..यह गर्व की बात है कि श्री जगदा बाबू के सानिध्य में आज श्री तेजस्वी यादव समाजवाद की उस पवित्र धारा पर गतिमान होते हुए बिहार को उस दिशा की ओर ले जाना चाहते हैं..जहाँ हर बिहारवासी को एक “स्वर्णिम बिहार” होने का गौरव प्राप्त हो सकेगा..!
नदियों की बिगड़ी स्थितियों, उसमे बढ़ती गाद द्वारा (गंदगी) ऊँचे जल स्तर का होना, जो बाढ़ जैसी आपदा में सहायक सिद्ध होती आ रहीं है, बरसात के मौसम या नेपाल द्वारा अत्यधिक मात्रा में पानी के बहाव को छोड़ना बिहार के अधिकतर हर जिलों को बाढ़ का विकराल संकट झेलना पड़ता है जिससे बड़े पैमाने में जान-माल व आर्थिक हानि होती है आदि इत्यादि..इन सब ज्वलनशील गंभीर समस्याओं पर चिंतन-मंथन का एजेंडा..राष्ट्रीय जनता दल के अन्य एजेण्डों में प्रमुख रूप से अपना स्थान बनाये हुए है..जिसपर बिहार में पार्टी के विद्वान, चिंतक नेतागण काम भी करते आ रहे हैं..हालांकि श्री जगदा बाबू, ने इस ओर विशेष रूप से प्रकाश डाला है कि “तेजस्वी यादव अब सरकार चला रहें हैं अतः वे बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगे, पार्टी का नहीं”..यह हर्ष का विषय है कि मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार जी जो राजनीति की बारीकियों की खूब समझ रखते हैं, तेजस्वी जी को आगे रखकर चल रहे हैं..लेकिन इस हर्ष में चार चाँद और लग जाते यदि श्री तेजस्वी, बतौर मुख्यमंत्री..प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से मिलते और आँखों से आँखें मिलाकर बात करते.. लेकिन यह भी पूर्ण विशवास है कि सामाजिक न्याय के रक्षक समता मूलक सिद्धांत पर अडिग निडर नेता श्री लालू यादव जी, के पुत्र..साहसी-निर्भीक और प्रगतिशील आधुनिक सोच के युवा नेता हैं..श्री तेजस्वी यादव, उप-मुख्यमंत्री के रूप में भी प्रधानमंत्री मोदी जी की आँखों में आँख डालकर बिहार के हितों की बात करेंगे..!

डॉ० लोहिया ने यूँ ही नहीं कहा था कि “लोग मेरी बात सुनेंगे जरूर लेकिन मेरे मरने के बाद”..युगदृष्टा थे डॉ० लोहिया..लोहिया की दृष्टि में राष्ट्र प्रथम, उसके पश्चात राजनैतिक दल और फिर खुद उनकी विचार धारा..लोहिया अगर देश में व्याप्त बुराइयों को इंगित करते थे..तो साथ ही साथ उन बुराइयों से निपटने का कार्यक्रम भी प्रस्तुत करते थे..डॉ० लोहिया के विचार लेख भाषण उनके द्वारा प्रस्तुत सप्त क्रान्ति..आज ऐतिहासिक दस्तावेज के तौर पर राष्ट्रीय जनता दल की बेशकीमती पूँजी है और राजद का हर कार्यकर्त्ता उस दस्तावेजों का अध्यन कर समाजवादी सीख लेता है..ऐसे ही वर्ष 1958, 26 मई, को ब्रह्मपुर क्षेत्र में डॉ० लोहिया ने नदियों के सम्बन्ध पर एक भाषण किया था..जिसके मुख्य अंश शब्दशः प्रेषित करना चाहता हूँ..”आज में आपसे एक बात करूँगा जिसे धर्म के आचार्यों को करनी चाहिए, लेकिन वे नहीं कर रहे..वे तो गलत और जरुरी कामों में फसे हुए हैं..में अपने लिए कह देता हूँ कि में नास्तिक हूँ..कोई ये ना समझ बैठे की ईशवर से मुझे मोहब्बत हो गई..हिन्दुस्तान का मौजूदा जीवन और पुराना इतिहास सभी, बहुत कुछ नदियों के साथ साथ चला..यों सारी दुनियां में, लेकिन यहाँ ज्यादा..यदि में राजनीति ना करता और स्कूल में अध्यापक होता तो, इसके इतिहास को समझता..राम की अयोध्या सरयू के किनारे, कुरु और पांचाल और मौर्य तथा गुप्त गंगा के किनारे और मुग़ल और शौरसेनी नगर और राजधानियां यमुना के किनारे रही..बारहों मास पानी के कारण शायद विशेष जलवायु के कारण या हो सकता है, विशेष संस्कृति के कारण ऐसा हुआ हो..एक बार में महेशवर नाम के स्थान पर गया..जहाँ अहिल्या अपनी ताक़त से गद्दी पर बैठी थी..वहां पर एक संतरी था उसने पूछा तुम किस नदी से हो ?..दिल में घर कर जाने वाली बात है..उसने शहर नहीं पूछा, भाषा नहीं पूछी, नदी पूछी..जितने साम्राज्य बढ़े- चोल कावेरी के किनारे, पांड्या वैगेई के पल्लव पालार के किनारे बढ़े..आज हिन्दुस्तान में 40 करोड़ लोग बसते हैं एक दो करोड़ के बीच रोजाना किसी नदी के किनारे नहाते हैं और 50-60 लाख लोग पानी पीते हैं..उनके मन और क्रीड़ाएं इन नदियों से बंधी हैं..नदियां हैं कैसी ?..शहरों का गन्दा पानी इनमे गिराया जाता है..बनारस से पहले जो शहर हैं, इलाहबाद, मिर्ज़ापुर, कानपुर इनका मैला कितना मिलाया जाता है इन नदियों में..कारखानों का गन्दा पानी इनमे गिराया जाता है-कानपुर के चमड़े आदि का गन्दा पानी..यह दोनों गन्दगियाँ मिलकर क्या हालत बनाती हैं ?..करोड़ो लोग फिर भी नहाते हैं और पानी पीते हैं..इस समस्या पर में, साल से ऊपर हो गया कानपुर में बोला था..!
तैराकी का खेल दुनियां में सबसे ज्यादा खेला जाता है क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल से ज्यादा..यूरोप अमरीका में तैराकी के तालाब बनाये जाते हैं अरबो रुपए खर्च होते हैं, वैसे तालाब यहाँ नहीं हैं..अगले 50-100 वर्षों में रूस और अमरीका के जैसे, तैराकी के तालाब यहाँ नहीं बन सकते..जो राजा है और गद्दी पर बैठने का मंसूबा रखते हैं..वे थोड़े ही नहाते हैं, वे तो आधुनिक हो गए हैं किन्तु इतने आधुनिक भी नहीं कि करोड़ों का दुःख दर्द का इलाज भी ना कर सकें..क्या हिन्दुस्तान की नदियों को साफ़ करने का आंदोलन उठाया जाए ?..अगर यह काम किया जाए तो दौलत के मामले में भी फायदा पहुँचाया जा सकता है..मल-मूत्र और गंदे पानी की नालियां खेतों में गिरे..उनको गंगामुखी या कावेरीमुखी न किया जाए..दूर कोई 10-20 मील पर नालियों द्वारा मल-मूत्र को ले जाया जाए..खर्च होगा, दिमाग के…..
बिहार के उप मुख्यमंत्री श्री तेजस्वी यादव, 30 दिसम्बर 2022 को नमामि गंगे परियोजना को लेकर होने वाले कार्येक्रम में हिस्सा लेने के लिए कोलकाता जायेंगे..जहाँ वे बिहार में गंगा नदी की साफ़ सफाई को लेकर चल रही योजनाओं के बारे में बताएँगे..इस समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, भी शामिल होंगे..हालांकि इस समारोह में गंगा नदी से जुड़े अन्य राज्य के मुख्यमंत्री भी शामिल होंगे..इस सम्बन्ध में जब लोगों ने राष्ट्रीय जनता दल, बिहार प्रदेश के अध्यक्ष श्री जगदानंद सिंह जी, से जानकारी चाही तो उन्होंने बेबाकी से कहा कि “गंगा को अपवित्र करने वाले धन्ना सेठ है..उनके कारखानों का गन्दा पानी गंगा में आ रहा है, गंगा को कैसे पवित्र बनायें इसपर हमारी सरकार, इस दिशा में बात करेगी और भविष्य में गंगा को साफ़ करने के लिए भी काम करती रहेगी”..श्री जगदा बाबू पार्टी के वरिष्ठम नेताओं की श्रेणी में आते है और उनके विवेक से निकले ज्ञान, चिंतन, सोच अनुभव..समाजवाद के प्रथम नायक, डॉ० राममनोहर लोहिया जी, के विचारों, सिद्धांतों और कार्येक्रमों की दिखाई दशा और दिशा की धूरि पर ही रहती है..यह गर्व की बात है कि श्री जगदा बाबू के सानिध्य में आज श्री तेजस्वी यादव समाजवाद की उस पवित्र धारा पर गतिमान होते हुए बिहार को उस दिशा की ओर ले जाना चाहते हैं..जहाँ हर बिहारवासी को एक “स्वर्णिम बिहार” होने का गौरव प्राप्त हो सकेगा..!
नदियों की बिगड़ी स्थितियों, उसमे बढ़ती गाद द्वारा (गंदगी) ऊँचे जल स्तर का होना, जो बाढ़ जैसी आपदा में सहायक सिद्ध होती आ रहीं है, बरसात के मौसम या नेपाल द्वारा अत्यधिक मात्रा में पानी के बहाव को छोड़ना बिहार के अधिकतर हर जिलों को बाढ़ का विकराल संकट झेलना पड़ता है जिससे बड़े पैमाने में जान-माल व आर्थिक हानि होती है आदि इत्यादि..इन सब ज्वलनशील गंभीर समस्याओं पर चिंतन-मंथन का एजेंडा..राष्ट्रीय जनता दल के अन्य एजेण्डों में प्रमुख रूप से अपना स्थान बनाये हुए है..जिसपर बिहार में पार्टी के विद्वान, चिंतक नेतागण काम भी करते आ रहे हैं..हालांकि श्री जगदा बाबू, ने इस ओर विशेष रूप से प्रकाश डाला है कि “तेजस्वी यादव अब सरकार चला रहें हैं अतः वे बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगे, पार्टी का नहीं”..यह हर्ष का विषय है कि मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार जी जो राजनीति की बारीकियों की खूब समझ रखते हैं, तेजस्वी जी को आगे रखकर चल रहे हैं..लेकिन इस हर्ष में चार चाँद और लग जाते यदि श्री तेजस्वी, बतौर मुख्यमंत्री..प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से मिलते और आँखों से आँखें मिलाकर बात करते.. लेकिन यह भी पूर्ण विशवास है कि सामाजिक न्याय के रक्षक समता मूलक सिद्धांत पर अडिग निडर नेता श्री लालू यादव जी, के पुत्र..साहसी-निर्भीक और प्रगतिशील आधुनिक सोच के युवा नेता हैं..श्री तेजस्वी यादव, उप-मुख्यमंत्री के रूप में भी प्रधानमंत्री मोदी जी की आँखों में आँख डालकर बिहार के हितों की बात करेंगे..!
डॉ० लोहिया ने यूँ ही नहीं कहा था कि “लोग मेरी बात सुनेंगे जरूर लेकिन मेरे मरने के बाद”..युगदृष्टा थे डॉ० लोहिया..लोहिया की दृष्टि में राष्ट्र प्रथम, उसके पश्चात राजनैतिक दल और फिर खुद उनकी विचार धारा..लोहिया अगर देश में व्याप्त बुराइयों को इंगित करते थे..तो साथ ही साथ उन बुराइयों से निपटने का कार्यक्रम भी प्रस्तुत करते थे..डॉ० लोहिया के विचार लेख भाषण उनके द्वारा प्रस्तुत सप्त क्रान्ति..आज ऐतिहासिक दस्तावेज के तौर पर राष्ट्रीय जनता दल की बेशकीमती पूँजी है और राजद का हर कार्यकर्त्ता उस दस्तावेजों का अध्यन कर समाजवादी सीख लेता है..ऐसे ही वर्ष 1958, 26 मई, को ब्रह्मपुर क्षेत्र में डॉ० लोहिया ने नदियों के सम्बन्ध पर एक भाषण किया था..जिसके मुख्य अंश शब्दशः प्रेषित करना चाहता हूँ..”आज में आपसे एक बात करूँगा जिसे धर्म के आचार्यों को करनी चाहिए, लेकिन वे नहीं कर रहे..वे तो गलत और जरुरी कामों में फसे हुए हैं..में अपने लिए कह देता हूँ कि में नास्तिक हूँ..कोई ये ना समझ बैठे की ईशवर से मुझे मोहब्बत हो गई..हिन्दुस्तान का मौजूदा जीवन और पुराना इतिहास सभी, बहुत कुछ नदियों के साथ साथ चला..यों सारी दुनियां में, लेकिन यहाँ ज्यादा..यदि में राजनीति ना करता और स्कूल में अध्यापक होता तो, इसके इतिहास को समझता..राम की अयोध्या सरयू के किनारे, कुरु और पांचाल और मौर्य तथा गुप्त गंगा के किनारे और मुग़ल और शौरसेनी नगर और राजधानियां यमुना के किनारे रही..बारहों मास पानी के कारण शायद विशेष जलवायु के कारण या हो सकता है, विशेष संस्कृति के कारण ऐसा हुआ हो..एक बार में महेशवर नाम के स्थान पर गया..जहाँ अहिल्या अपनी ताक़त से गद्दी पर बैठी थी..वहां पर एक संतरी था उसने पूछा तुम किस नदी से हो ?..दिल में घर कर जाने वाली बात है..उसने शहर नहीं पूछा, भाषा नहीं पूछी, नदी पूछी..जितने साम्राज्य बढ़े- चोल कावेरी के किनारे, पांड्या वैगेई के पल्लव पालार के किनारे बढ़े..आज हिन्दुस्तान में 40 करोड़ लोग बसते हैं एक दो करोड़ के बीच रोजाना किसी नदी के किनारे नहाते हैं और 50-60 लाख लोग पानी पीते हैं..उनके मन और क्रीड़ाएं इन नदियों से बंधी हैं..नदियां हैं कैसी ?..शहरों का गन्दा पानी इनमे गिराया जाता है..बनारस से पहले जो शहर हैं, इलाहबाद, मिर्ज़ापुर, कानपुर इनका मैला कितना मिलाया जाता है इन नदियों में..कारखानों का गन्दा पानी इनमे गिराया जाता है-कानपुर के चमड़े आदि का गन्दा पानी..यह दोनों गन्दगियाँ मिलकर क्या हालत बनाती हैं ?..करोड़ो लोग फिर भी नहाते हैं और पानी पीते हैं..इस समस्या पर में, साल से ऊपर हो गया कानपुर में बोला था..!
तैराकी का खेल दुनियां में सबसे ज्यादा खेला जाता है क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल से ज्यादा..यूरोप अमरीका में तैराकी के तालाब बनाये जाते हैं अरबो रुपए खर्च होते हैं, वैसे तालाब यहाँ नहीं हैं..अगले 50-100 वर्षों में रूस और अमरीका के जैसे, तैराकी के तालाब यहाँ नहीं बन सकते..जो राजा है और गद्दी पर बैठने का मंसूबा रखते हैं..वे थोड़े ही नहाते हैं, वे तो आधुनिक हो गए हैं किन्तु इतने आधुनिक भी नहीं कि करोड़ों का दुःख दर्द का इलाज भी ना कर सकें..क्या हिन्दुस्तान की नदियों को साफ़ करने का आंदोलन उठाया जाए ?..अगर यह काम किया जाए तो दौलत के मामले में भी फायदा पहुँचाया जा सकता है..मल-मूत्र और गंदे पानी की नालियां खेतों में गिरे..उनको गंगामुखी या कावेरीमुखी न किया जाए..दूर कोई 10-20 मील पर नालियों द्वारा मल-मूत्र को ले जाया जाए..खर्च होगा, दिमाग के…..
“डॉ० लोहिया ने, आगे कहा..खर्च आएगा, दिमाग के ढर्रे को बदलना होगा..मुमकिन है इस योजना में अरबो रुपए का खर्च हो..2,200 करोड़ रुपए सरकार हर साल खर्चती है..पंचवर्षीय योजना के कुछ काम बंद करने होंगे, हालांकि इसमें रुकावट जबरदस्त हैं..राजनैतिक व्यक्ति चाहे गद्दी पर हो चाहे बाहर, अपने दिमाग से नकली यूरोपी हो गएँ हैं..कौन हैं हिन्दुस्तान के राजा ? करीब एक लाख होंगे या उससे भी कम, जो थोड़ी बहुत अंग्रेजी जानते हैं, कांटे छुरियों से खाते हैं और कोट-टाई पहनना जानते हैं, ताक़तवर दुनियां के प्रतीक हैं, पंडित नेहरू मूर्ति हैं ऐसी दुनियां की..किसी कदर श्री संपूर्णानंद भी मूर्ति हैं, हालांकि शक्ल में भिन्न हैं और यूरोपी जैसे नहीं लगते..श्री नेहरू भी अमरीका में तो रंगीन ही समझे जाएंगे..!
बनारस में विश्वनाथ को लेकर झगड़ा चला, दूसरा मंदिर बनाया जा रहा है..किस विश्वनाथ का झगड़ा चला – ब्राह्मणनाथ अथवा चमारनाथ का ?..इन बातों में हिन्दू दिमाग बेमतलब फस जाता है..करपात्री जी, जैसा मैंने कहा वैसे करते तो अच्छा होता..किस दुनियां के सहारे चलते हैं ये ?..ये लोग करोड़पति और राजस्थान के राजाओं के नुमाइंदे हैं..एक विश्वनाथ की जगह पर दो खड़ा करने से काम नहीं चलेगा..सारे राष्ट्र के निर्माण की बात है, बेहद गरीबी है वह कैसे मिटे ?..आखिर पलटन में आज सिपाही कौन है ? गरीबों के लड़के..वे ही गरीबो पर गोली चलाते हैं..वही खडगवासला, देहरादून और सेंडहर्स्ट के नकली यूरोपी रंग में रंगे अफसर का हुक्म मानते हैं..उनके पास पैसा है, साधन हैं, और आधुनिक दुनियां के प्रतीक वे हैं ही..करोड़ो से उनका क्या वास्ता ?..आज राजगद्दी चलाने वाले हैं कौन ?..नकली आधुनिक विदेशी लोग, दिमाग जरा भी हिन्दुस्तानी नहीं, नहीं तो हिन्दुस्तान की नदियों की योजना बन जाती..में चाहता हूँ कि इस काम में न केवल सोशलिस्ट पार्टी के बल्कि और लोग भी आएं, सभाएं करें, जुलुस निकाले, सम्मलेन करें और सरकार से कहें कि नदियों के पानी को भ्रष्ट करना बंद करो..फिर सरकार को नोटिस दें कि 3 से 6 महीने के भीतर वह नदियों का गन्दा पानी खेतों में बहाएं, इसके लिए खास खेत बनायें और वह अगर यह न करें तो मौजूदा नालियों को तोडना पड़ेगा..इससे हिंसा नहीं होती, सब अपने ढंग से अर्थ लगाते हैं..तीर्थ है क्या – पानी, पानी को साफ़ करने के लिए आंदोलन चाहिए, लोगों को सरकार से कहना चाहिए – बेशर्म, बंद करो यह अपवित्रता..यह सही है की दुनियां से सीखना है, लेकिन करोड़ो का ध्यान रखना है..में फिर कहता हूँ कि में नास्तिक हूँ, मेरे साथ तीर्थवाजी का मामला नहीं है..मुख्य बात यह है कि 30 लाख का देश बने या 40 करोड़ का..इसके लिए अगर कुछ लोग आंदोलन करना चाहें तो में मदद करूँगा”..!
वर्तमान की केंद्र सरकार के पिछले 8 वर्षों के कार्यकाल का आंकलन करें तो हम सब पाएंगे कि जिसे भाजपा नेता श्री नरेंद्र मोदी जी, बतौर प्रधानमंत्री जनहित क्रियाओं को गति दे रहें हैं, वह केवल यह दर्शाती है कि पिछली मनमोहन सिंह (UPA) सरकार, के शुरू किये कार्यकाल के पूर्ण होने पर नरेंद्र मोदी जी, स्वयं अपनी पीठ थपथपाकर तथा रीबन काट कर या नारियल फोड़कर उन परियोजनाओं का श्रेय लेते आ रहें हैं..जैसे सड़क-पुल- सुरंग या अन्य कोई निर्माण आदि..या फिर डॉ० राममनोहर लोहिया जी द्वारा कार्यक्रमों की मूल दिशा को चुराकर इस तरह उसे अंजाम देते हैं..जैसे यह उनके अपने विवेक का परिचय हो..जबकि शौचालय का कॉंसेप्ट, डॉ० राममनोहर लोहिया का कॉंसेप्ट था..जिसे मोदी जी, फ्री ग्रामीण शौचालय योजना के तहत चला रहें हैं..लेकिन ये योजना कितनी सफल या असफल रही है सर्वविदित है..स्वछता अभियान यह भी डॉ० लोहिया की ही दिखाई दिशा रही..डॉ० लोहिया चाहते थे ऐसी व्यवस्था बने जहाँ हर गाँव के हर घरों में, धुआं मुक्त चुल्हा हो..जिसे प्रधानमंत्री मोदी जी, उज्जवला योजना का नाम देकर फ्री गैस के सिलेंडर बाँटते रहे..लेकिन इनकी ये योजना कितनी कारगर सिद्ध हो रही है किसी से कुछ छिपा नहीं..आज महंगाई के इस दौर में ये योजना बुरी तरह मुहं के बल गिर चुकी है..नदियां साफ़ करो ये कॉन्सेप्ट भी डॉ० लोहिया की ही देन है..जिसे नमामि गंगे के नाम से चलाया जा रहा है..प्रधानमंत्री जी को तो केवल नाम रखने या नाम बिगाड़ने की कला की महारत हासिल है..इतिहास को कैसे तोड़-मरोड़ के प्रस्तुत करते हैं, कि जानकारों के लिए लतीफा बन जाता है..वैसे भी प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी भाजपा के लिए जनकल्याण हेतू कुछ भी नहीं, लेकिन जनविरोधी नीतियों से लबरेज व सुसज्जित जरूर है..जैसे सांप्रदायिक माहौल कैसे बनाया जाये, कैसे नफरत-उन्मांद का ज़हर पैदा किया जाए, वैमनष्य, हिन्दू-मुस्लिम, जात पात, ऊंच नीच, भगवा आतंक, संविधान विरोधी तोड़-फोड़ और जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को कैसे गिराया जाए, कैसे छात्र और युवाओं के मस्तिक्ष में धर्म के नाम की अफ़ीम पिरोई जाए, कैसे ई.डी.और सीबीआई जैसे सरकारी संस्थानों के दुरूपयोग से, सवाल पूछ्ने वाले या हक़ अधिकार की लड़ाई लड़ने वाले लोगों के चरित्र पर दाग लगाया जाए, आदि इत्यादि सोच तक ही सीमित है..!
जब देश की आर्थिक स्थिति खस्ता हो रखी हो तो क्या नमामि गंगे परियोजना सफल होगी ?..क्या नमामि गंगे कुछ किलोमीटर की सफाई तक ही सीमित रख केवल पर्यटन की दृष्टि तक ही है ?..सिर्फ राजस्व बटोरने तक रखने का उद्देश्य है ?..उत्तर प्रदेश में नमामि गंगे परियोजना कितनी कारगर सिद्ध हुई है वहां से जुडी गंगा की गंदगी आज भी देखी जा सकती है..केवल कुछ किलोमीटर गंगा कुछ खास जिलों में पर्यटन द्वारा राजस्व का केंद्र जरूर बना है..लेकिन गंगा के दोनों और कुछ सीढ़ियां बना देने से कुछ हराभरा कर देने भर से कुछ बढ़िया दुकाने खोल देने से और उन दुकानों पर जिसपर स्थानीय नेताओं और माफियाओं का कब्ज़ा हो जाता है..इन्ही दुकानों की गंदगी उसी गंगा में समाहित होकर पुनः गंदगी को पैदा करना..क्या इसे ही गंगा की सफाई समझा जाए ?..नमामि गंगे परियोजना के नाम से जो केंद्र सरकार राशि खर्च करती है क्या वह राशि केवल परियोजना से सम्बंधित लोगों की जेब तक ही सीमित रखने का प्राबधान है ?..क्या सपूर्ण गंगा की सफाई के लिए केंद्र द्वारा दी जाने वाली राशि पर्याप्त है ?..पिछले 8 वर्षों से नमामि गंगे परियोजना चालू है, परन्तु आज भी गंगा का पानी अमृत रुपी ना बन सका, आज भी राम की गंगा मैली है..लेकिन पिछले 5 वर्ष पहले सैंट्रल-विस्टा परियोजना जिसपर 20 हज़ार करोड़ रुपए से भी कहीं ज्यादा की राशि केंद्र ने प्रस्तावित की थी, वो योजना आज पूरी होने को है..कोरोना काल में लगे लॉक-डाउन में भी लगातार दिन रात काम होता रहा और आज भी काम हो रहा है..जो नेक-नियत का प्रदर्शन प्रधानमंत्री मोदी जी ने इस परियोजना को दिया है..क्यों नहीं इसी नियत का परिचय वे गंगा की सफाई हेतू करते तो, करोड़ो लोगों का भला हो न हो जाता..?
2014 के चुनाव में गंगा की सफाई का मुद्दा बनाया गया था और सत्ता में आने पर नमामि गंगे प्रोजेक्ट शुरू किया गया..20 हज़ार करोड़ रुपए बजट वाले इस कार्यक्रम का मकसद गंगा को निर्मल बनाना है..इसके लिए सबसे अधिक ध्यान…..





