शशिकांत गुप्ते
प्रसिद्ध कवि स्व.बालकवि बैरागी रचित एक कविता कुछ पंक्तियों का स्मरण हुआ।
बेशक आग लगावों रे अंगारों
मावस के गलियारों में
लेकिन आग लगा मत देना पूनम के पखवाड़े में
उस माली को माफी मत दो
जिसने गंध चुराई हो
जिसके होतें हर क्यारी में नागफनी उग आई हो
बलकविजी ने यह कविता घोषित आपातकाल के दौरान सुनाई थी।
आपातकाल का निर्णय तानाशाही पूर्ण होते हुए भी साहसिक निर्णय था।कारण घोषित था।
अघोषित निर्णय ज्यादा त्रासदायी होता है।
इस संदर्भ में शायर वसीम बरेलवी यह शेर प्रासंगिक है।
वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीक़े से
मै ए’तिबार न करता तो क्या करता
यह एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है।जब सिर्फ भावनाएँ जागृत होती है,तब यथार्थ ग़ायब हो जाता है। बहुत सी बार जानतेबुझते झूठ को भी सच मानना पडता है।
यथार्थ में झांकने के लिए साहस चाहिए।साहस का शारीरिक सौष्ठव से कोई लेना देना नहीं है।
माली मतलब बागवान, को चाहिए कि बाग को सुरक्षित रखे।
पूर्व के विकसित बागों को सवारने के कार्य करें।बागों में खुशबूदार पौधों ही रोपें।
वर्तमान में तो पौधों में नई कोपलें प्रस्फ़ुटित होने के पहले ही पतझड़ का मौसम आजाता है।
बाग में रोप गए पौधों को संतुलित मात्रा में सिंचन चाहिए,प्रदूषण रहित आबोहवा चाहिए।
बाग में विभिन्न आकर प्रकार के फूलों के पौधें होने चाहिए।
दुर्भाग्य एक ही तरह के फूल को विकसित करने के लिए सर्वत्र कीचड़ फैलाया जा रहा है।अत्यधिक कीचड़ दलदल में परिवर्तित हो जाता है।दलदल में कोई भी फंसता नहीं है धंस जाता है।
कीचड़ में फलने फूलने वाले फूल पर माया अर्थात धन की देवी लक्ष्मीजी खड़ी होकर अपने हाथों से धन की वर्षा करती रहती है।
सर्वत्र कीचड़ में एक ही प्रकार का फूल खिलेगा और हर फूल पर लक्ष्मीजी खड़ी होकर धन वर्षा करेगी तो धन जमा होने के बजाए कुछ लोगों के पास एकत्रित होगा।दलदल में घुस कर धन एकत्रित करने में कुछ ही लोग निपुण होतें हैं।ये लोग कितने भी दलदल में घुस जाए,इनके लिए एक विशिष्ठ प्रकार के वाशिंग मशीन के उपलब्ध है जो हरतरह के दाग धब्बे पूर्ण रूप से साफ कर देतीं है।
इसीलिए ऐसा बागवान चाहिए जो हर तरह के हर आकर प्रकार के फूलों से प्यार करता हो। बागवान के सहयोगियों को चाहिते की वे हर रंग के फूल से स्नेह करें।किसी विशेष रंग के फूल से नफरत न करें?
यदि ऐसा सम्भव होगा तो देशभक्ति के गीत की निम्न पंक्तियां सार्थक होंगी
हीरे जवाहरतों की यह होंगी खेतियाँ
भारत को बनाएंगे हम शांति का आशिया
सपने देखने के लिए व्यय नहीं करना पड़ता है।
यह लेख पूर्ण रूप से काल्पनिक है।इस लेख किसी व्यक्ति, संस्था,दल या समूह से कोई सम्बंध नहीं है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





