
*रामबाबू अग्रवाल*
कुशल शासकों की कीर्ति किसी एक युग तक सीमित नहीं रहती। उनका लोकहितकारी चिंतन कालजयी होता है और युगों-युगों तक समाज का मार्गदर्शन करता है। ऐसे शासकों से न केवल जनता, बल्कि सभ्यता और संस्कृति भी समृद्ध और शक्तिशाली बनती है। ऐसे शासकों की दृष्टि में सर्वोपरि हित सत्ता का न होकर समाज एवं मानवता होता है।इतिहास पुरूष सामाजिक बदलाव के नायक होते है । समाज के अनेक व्यक्ति उनके विचारों को अपनाते है। इन प्रतिबद्ध अनुयाईयों से एक ऐसे समुदाय का गठन होता है जो अपनी विचारधारा के अनुरूप स्वयं के आचार विचार व जीवन का निर्धारण करता है साथ ही उसके अनुरुप ममाज निर्माण का यत्न भी । यह प्रक्रिया कालक्रम में स्थिर होकर धर्म या जाति का रूप प्राप्त कर लेती है ।
महावीर, गौतम बुद्ध व महाराजा अग्रसेन ऐसी ही विचारधारा के प्रवर्तक रहे है जो कालक्रम में जैन, बौद्ध तथा अग्रवाल समाज के रूप में स्थिर हो गई है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमने अपने सामाजिक स्वरूप को तो सम्भाल कर रखा मगर उसके वैचारिक पक्ष को भूल गयें।
महान शासक महाराजा अग्रसेन कर्मयोगी लोकनायक तो थे ही, संतुलित एवं आदर्श समाजवादी व्यवस्था के निर्माता भी थे। वे समाजवाद के प्रणेता, गणतंत्र के संस्थापक, अहिंसा के पुजारी व शाति के दूत थे। आदि पुरुष महाराजा अप्रमेन जी ने भी हिंसा का त्याग करने के बाद पूरी प्रजा को केवल शुद्ध सात्विक और शाकाहारी बनने के लिए प्रेरित किया था ।
उन्होंने सात्विक प्रवृत्ति, अहिंसा और सत्य को सबसे बड़ा धर्म बताया था। हम उनके वंशज हैं, धर्म सेवा कायों और मानव सेवा के लिए कुए, बावडी और धर्मशालाएं भी बनवाते रहे हैं। लेकिन वर्तमान पीढ़ी में हमारे समाज में कई कुरुतियां भी व्याप्त होने लगी है ।
समाज के लोग अब नशाखोरी के आदी बनते जा रहे हैं। यह कड़वी सच्चाई है। नशा उसे दीमक की तरह अंदर से खोखला बना रहा है।
समाज में पनप रहे विभिन्न प्रकार के अपराधों का एक कारण नशा भी है। नशे की प्रवृत्ति में वृद्धि के साथ अपराधियों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है। कोकीन, चरस, अफीम ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ हैं, जिनके प्रभाव में व्यक्ति अपराध कर बैठता है। बच्चे पढ़ाई के नाम पर अभिभावकों से पैसा लेकर मादक पदार्थ खरीद रहे हैं। बच्चे दिन भर क्या कर रहे हैं? रात को घर देरी से क्यों पहुंच रहे हैं? इन सब बातों पर अभिभावकों को नजर रखनी होगी।
शहरी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ साथ महिलाएं भी शौक से धुर्मपान करती है। शहर में नशा से परहेज करने वालों को गंवार एवं अप्रगतिशील तक कहा जाने लगा है। भारत में शराब बिहार सहित कई राज्यों में प्रतिबंधित है। बावजूद इसके भारत में शराब की खपत अप्रत्याशित तरीके से बढ़ी है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हैरान कर देने वाली एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है. विच स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में शराब की खपत 2005 से 2016 तक दोगुनी हो गयी है। भारत में 2005 में प्रति व्यक्ति रोजाना शराब की खपत 2.4 लीटर थी जो अब । बदकर 5.7 लीटर प्रति व्यक्ति। रोजाना हो गयी है। हर रोज भारत में 4.2 लीटर शराब का उपभोग पुरुषों द्वारा और 1.5 लीटर शराब का उपभोग महिलाओं द्वारा किया जाता है।
अब जरूरी है कि हम समाज में नशाखोरी के खिलाफ भी प्रेरक बने समाज को अच्छे मार्ग पर ले जाने के लिए और आने वाली पीढ़ी को नशे जैसी बुरी प्रवृत्ति से बचाने के लिए हमको आगे आना ही चाहिए । नशाखोरी के खिलाफ सर्वदलीय प्रयास सार्थक रहेंगें, इसी में देश का भला है। अतः राजनिती से अलग सब मिलकर प्रयास करें। डा. राममनोहर लोहिया स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लाला लाजपतराय, जमनादास बजाज, हनुमानप्रसादजी पोद्दार आदि लोगों ने भी समय समय पर नशाखोरी के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया था ।
संयुक्त परिवार में संस्कार मिलते थे। बच्चों की सही परवरिश होती थी। परिवार के सभी सदस्यों की नजर रहती थी। एकल परिवार से समस्या बढ़ी है। मौजूदा दौर में बच्चे टेलीविजन, कंप्यूटर व मोबाइल में खोकर रह गए हैं। मानसिक दबाव के चलते बच्चों का झुकाव नशे की ओर बढ़ता जा रहा है। अकसर ये देखा जा रहा है कि युवा वर्ग नशीले पदार्थों की गर्त में दिनोंदिन फंसता जा रहा है। इसके कारण उनका केरियर चौपट हो रहा है।लेकिन नशे की बुराई के कारण समाज गर्त में जा रहा है। नशा से पीड़ित व्यक्ति मानसिक, आर्थिक एवं शारीरिक रूप से बांझ हो जाता है।
सरकारों के द्वारा इस सामाजिक बुराई को जड़ से खत्म करने के लिए हर वर्ग को पहल करनी होगी।
अग्रसेन जयंती पर सभी अग्रवंशियों को संकल्प लेना चाहिए कि वे नशे सहित सभी कुरूतियों के खिलाफ जन-जागरूकता के लिए काम करेंगे।
*लेखक इंदौर के वरिष्ठ समाजसेवी तथा अग्रवाल वैश्य कपल संघ एवं बालाजी सेवा संस्थान के अध्यक्ष हैं। संपर्क -9827031550*





