अरूण डीके
फ्रांस के दार्शनिक नाटककार लेखक और विचारक ऑस्कर वाइल्ड कहते हैं- कंसील द आर्टिस्ट एंड रिवील हिस आर्ट(कर्म उघाडो और कर्ता को छिपाओ).इंदौर की दो हस्तियों में मैंने यह नज़दीक से देखा एक विष्णु चिंचाळकर (कलागुरु) और दूसरे पत्रकार राहुल बारपुते।
वैसे राहुलजी ने नैनी इन्स्टिट्यूट प्रयागराज (इलाहाबाद)से रणवीर सक्सेना के साथ कृषि यांत्रिकी में डिग्री ली थी लेकिन मन था पत्रकारिता में।(इलाहाबाद उन दिनों नेहरु परिवार के कारण स्वतंत्रता आंदोलन का गढ़ था और राहुलजी की रामनोहर लोहिया और मधु लिमये से गहरी दोस्ती थी)
खैर,इंदौर आकर राहुलजी सीधे मज़दूर संघ के प्रमुख नेता वी वी द्रविड़जी से मिले और मज़दूर संदेश पत्रिका के लिए उनसे नौकरी माँगी।द्रविड साहब बोले १३ ₹ माहवार पगार मिलेगी।राहुलजी बोले मुझे १२₹ ही दीजिए(उन्हे पत्रकारिता की बाराखडी जो सीखनी थी)।बहुत जल्द राहुलजी ने अपनी प्रतिभा दिखाई और कॉंग्रेस नेता वी सी(तात्या)सर्वटे और नईदुनिया के श्री लाभचंदजी छजलानी मार्फ़त राहुलजी ने नईदुनिया में कदम रखा और आखरी साँस तक वे नईदुनिया से जुडे रहे।
पत्रकारिता के अलावा राहुलजी को संगीत नाटक चित्रकला और सामाजिक कार्यों में भी रुचि थी।इसी कारण वे कुमार गंधर्व बाबा डिके विष्णु चिंचाळकर और बाबा आमटे से जुडे।सशक्त पत्रकारिता के लिए वे इन सब विधाओं को महत्वपूर्ण मानते थे।
उनकी प्रतिबद्धता देख रज्जुबाबु(राजेन्द्र माथुर)प्रभाष जोशी शाहिद मिर्जा और व्यंग्यकार शरद जोशी ने भी उनका बखूबी साथ दिया।
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि
मध्यप्रदेश राजस्थान और उत्तर प्रदेश में ये प्रमुख संपादक डाकु समस्या ग्रामीण समस्या और शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए नाट्य भारती के प्रचारात्मक नाटकों के माध्यम से गॉंव गॉंव घूमता था?
राहुलजी की ही सूझबूझ का एक और कार्य मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ
इसाक न्यूटन(१६४३-१७२७)उनके गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के कारण प्रसिद्ध थे।उसके अलावा गति के उनके ३ सिद्धांत थे।तीसरा सिद्धांत कहता है कि हर क्रिया की बराबरी में और विरोध में प्रतिक्रिया होती है।सारा संसार इसी सिद्धांत पर चल रहा है।जहॉं अच्छाई होती है वैसी ही वहॉं बुराई भी पनपती है।और जहॉं बुराई होती है वहीं पर अच्छाई भी किसी न किसी रुप में कार्यरत रहती है।
१९८४ का भोपाल गैस कांड लोग भूल नहीं सकते लेकिन उससे प्रभावित मरीज़ों के लिए वहॉं राहत कार्य करनेवाले भी पहुँच गए और आजतक संभावना नामका संगठन वहॉं कार्यरत है।
नर्मदा बांध को लें।उस बांध से जहॉं उद्योगों को राहत मिली वहीं बांध के कारण हज़ारों एकड़ ज़मीन और गॉंव डूब में गए और बड़ी संख्या में किसान और गॉंववाले अपनी ज़मीन से उखड़ गए।उनके पुनर्वास की समस्याओं का अभीतक समाधान नहीं हुआ है।
ऐसी कईं घटनाएँ हुई हैं हो रही हैं और होती रहेंगी।शासन के अलावा कईं व्यक्ति निराश्रितों की मदत के लिए अपनी सब सुखी सुविधाओं को तिलांजलि देकर कूद पड़ते है।
समाज में ऐसे भी परोपकारी है जो स्वयं साथ नहीं दे पाते है मगर कुछ आर्थिक लाभ हर माह पहुँचाते हैं।इसी को कृतज्ञता निधि कहते हैं जिसकी शुरुआत गोवा से जान हथेली पर रख रिपोर्टिंग करनेवाले(और कभी कभी जान गवानेवाले)पत्रकारों के लिए की गई थी।
मुंबई के सृजनशील और संवेदनशील सिने एवं नाट्यकर्मी श्रीराम लागु नीळु फुले सदाशिव अमरापुरकर अंध श्रद्धा निर्मुलन के लिए जान गवानेवाले डॉ नरेन्द्र दाभोलकर और कईं अन्य कलाकारों ने कृतज्ञता निधि के लिए जगह जगह नाटक प्रस्तुत कर बड़ा फंड इकट्ठा कर जरुरतमंदों तर पहुंचाया था।
इसीसे प्रेरणा लेकर नई दुनिया इंदौर के प्रमुख संपादक राहुल बारुपुते ने अपने मित्रों के सामने प्रस्ताव रखा था कि हम भी हर माह कम से कम १००₹ प्रतिमाह देकर कृतज्ञता निधि की शुरुआत करें और भोपाल गैस पीड़ितों के लिए नर्मदा और बरगी डैम के विस्थापितों के हित में काम करनेवाले व्यक्तियों को(समूह को नहीं)आर्थिक लाभ पहुँचाए।
सन १९८५-९० के बीच इनलोगों ने इंदौर में कृतज्ञता निधि की शुरुआत की थी-
राहुल बारपुते पद्मकुमार मंत्री विभाष सुरेका और अरुण डिके।बाद में मुकुंद कुळकर्णी और सरोजकुमार भी आकर मिले।और उसके बाद डॉ वसुंधरा कालेवार और विष्णु गुप्ता भी सदस्य बने।
हमने नर्मदा बांध के विस्थापकों के हित में काम करनेवाले श्रीपाद धर्माधिकारी आलोक अग्रवाल रमेश बिल्लोरे सुश्री माधुरी बरगी बांध के विस्थापितो के हित में काम करनेवाले राजकुमार सिन्हा भोपाल गैस पीड़ितों के लिए काम करनेवाली साधना कर्णिक बाबा आमटे के झाबुआ आदिवासियों के हित में काम करनेवाली नफ़ीसा विद्यवृत नायर और आधारशीला सेंधवा के पास काम कर रहे अमित को भी कृतज्ञतापूर्वक आर्थिक मदत पहुँचाई थी।
सोमवार दिनांक ३ जून १९९६ के दिन हुई राहुलजी की मृत्यु के बाद भी श्रीमती विमला बारपुते हर माह मदत पहुँचाती रही।
किन्हीं अज्ञात कारणों के कारण कृतज्ञता निधि कार्य सन २००८ में बंद हो गया।
आज ३ जून २०२५ है।इसी तारीख में आज से २९ वर्ष पूर्व(सोमवार दि ३ जून १९९६)राहुलजी हम सबसे हमेशा के लिए बिदा हो गए थे।उनकी पावन स्मृति को सादर नमन।





