श्रीगंगानगर । कॉमरेड हेतराम बेनीवाल का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया । उनका अंतिम संस्कार आज शाम 4 बजे उनके पैतृक गांव 8 एलएनपी में किया गया।
राजस्थान की वामपंथी राजनीति के स्तंभ और किसान-मजदूर आंदोलनों के प्रखर नेतृत्वकर्ता, माकपा के पूर्व विधायक कॉमरेड हेतराम बेनीवाल अब हमारे बीच नहीं रहे। 94 वर्षीय बेनीवाल ने सोमवार रात 10:58 बजे श्रीगंगानगर के टांटिया अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन से मारवाड़ से लेकर शेखावाटी और विशेषकर नहरी क्षेत्र के किसान जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, बेनीवाल को तीन दिन पहले हीमोग्लोबिन की कमी के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ब्लड ट्रांसफ्यूजन के दौरान उन्हें निमोनिया हो गया, जिससे उनकी स्थिति चिंताजनक हो गई। सोमवार देर रात उनके पार्थिव शरीर को उनके निवास 8 एलएनपी ले जाया गया। उनका अंतिम संस्कार आज, मंगलवार शाम 4 बजे उनके पैतृक गांव 8 एलएनपी में किया गया। 16 अक्टूबर 1932 को जन्मे हेतराम बेनीवाल ने अपना पूरा जीवन मार्क्सवादी विचारधारा और जनसेवा को समर्पित कर दिया।
उन्होंने 1967 में संगरिया से अपना पहला चुनाव लड़ा। वर्ष 1990-91 में वे संगरिया से विधायक निर्वाचित हुए। हालांकि, विधानसभा भंग होने के कारण उनका कार्यकाल ढाई साल ही रहा। उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति को 2004 में सादुलशहर विधानसभा क्षेत्र से विराम दिया। कांग्रेस शासन में आपातकाल के दौरान उन्होंने जेल की यातनाएं झेलीं, लेकिन सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
आंदोलनों के रणनीतिकारबेनीवाल को एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाएगा जिन्होंने अपनी संगठनात्मक शक्ति से सत्ता के गलियारों को हिला दिया। 1971-72 में इंदिरा गांधी नहर परियोजना के प्रथम चरण में जमीन आवंटन को लेकर चले आंदोलन ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया की सरकार को अपने निर्णय बदलने पर मजबूर कर दिया था। 2003-04 के दौरान वसुंधरा सरकार के समय हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन में बेनीवाल की भूमिका निर्णायक रही। उनके एक इशारे पर हजारों किसान सड़कों पर उतर आते थे।
हेतराम बेनीवाल अपनी बेबाक भाषण शैली के लिए विख्यात थे। वे राजस्थान के उन बिरले नेताओं में से थे जो बिना लाउडस्पीकर के भी हजारों की भीड़ को घंटों तक मंत्रमुग्ध कर सकते थे। विधानसभा के भीतर भी उनकी स्पष्टवादिता के कायल विपक्षी नेता भी थे। पूर्व विधायक पवन दुग्गल सहित कई नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि राजनीति में जमीनी संघर्ष की सीख बेनीवाल जी से ही मिलती है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि शोषितों और वंचितों के मसीहा थे। उनकी पत्नी चंद्रावली देवी का पिछले वर्ष ही निधन हुआ था। उनके परिवार में अब दो बेटे और एक बेटी हैं।
बिना माइक के गरजने वाली आवाज हुई शांत
राजस्थान की वामपंथी राजनीति के स्तंभ और पूर्व विधायक माकपा के कद्दावर नेता हेतराम बेनीवाल का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। 1990 में संगरिया से विधायक रहे बेनीवाल को किसान-मजदूर आंदोलनों का ‘भीष्म पितामह’ माना जाता था। उनके निधन से प्रदेश ने एक बेबाक, सादगी पसंद और जनहित के लिए लड़ने वाला महान रणनीतिकार खो दिया है।
राजस्थान की राजनीति में जब भी ‘लाल झंडे’ और किसान संघर्षों का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें माकपा के कद्दावर नेता हेतराम बेनीवाल का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा। 94 वर्ष की आयु में सोमवार रात उनका निधन न केवल एक पूर्व विधायक का जाना है, बल्कि राजस्थान के आंदोलनों के एक जीवंत अध्याय का समाप्त होना है।
13 अक्टूबर 1932 से 2026: एक अजेय सफर
हेतराम बेनीवाल का जन्म 13 अक्टूबर 1932 को हुआ था। उन्होंने उस दौर में वामपंथी विचारधारा को चुना, जब राजस्थान की राजनीति में रजवाड़ों और रसूखदारों का बोलबाला था। 1967 में उन्होंने संगरिया विधानसभा क्षेत्र से माकपा के टिकट पर अपनी पहली चुनावी पारी शुरू की। हालांकि, उन्हें असली पहचान 1990-91 में मिली जब वे संगरिया से विधायक चुने गए। भले ही विधानसभा भंग होने के कारण उनका कार्यकाल ढाई वर्ष का रहा, लेकिन उन 30 महीनों में उन्होंने सदन के भीतर अपनी जो छाप छोड़ी, उसकी चर्चा आज भी पुराने नेता करते हैं।
- घड़साना किसान आंदोलन (2004-06): पानी की मांग को लेकर हुए इस भीषण आंदोलन में उन्होंने किसानों को एकजुट रखने के लिए गांव-गांव जाकर शपथ दिलाई।
- जमीन आवंटन और मजदूर संघर्ष: राजस्थान कैनाल जमीन आवंटन हो या जेसीटी मिल मजदूर आंदोलन, बेनीवाल हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहे।
- भाखड़ा और गंगनहर: सिंचाई पानी के अधिकारों के लिए उन्होंने कई बार जेल यात्राएं कीं और लाठियां खाईं।
उनकी संगठन क्षमता ऐसी थी कि जब वे किसी प्रदर्शन का आह्वान करते, तो प्रशासन पहले ही अलर्ट मोड पर आ जाता था। उन्हें पता था कि बेनीवाल की एक आवाज पर हजारों किसान सड़कों पर उतरने का दम रखते हैं।
सादगी और स्पष्टवादिता का अंत
पिछले वर्ष उनकी पत्नी चंद्रावली देवी का निधन हुआ था, जिसके बाद वे थोड़े एकाकी हो गए थे। लेकिन 94 साल की उम्र में भी उनका हौसला कम नहीं हुआ। तीन दिन पहले हीमोग्लोबिन की कमी के कारण वे अस्पताल में भर्ती हुए, लेकिन निमोनिया के संक्रमण ने इस ‘जनता के सिपाही’ को हमसे छीन लिया। मंगलवार को उनके पैतृक गांव 8 एलएनपी में जब उनकी अंतिम यात्रा निकलेगी, तो वहां केवल उनके परिजन नहीं, बल्कि राजस्थान का वो हर किसान और मजदूर खड़ा होगा जिसे उन्होंने लड़ना सिखाया।
बिना माइक के गरजने वाली ‘आवाज’
बेनीवाल की सबसे बड़ी शक्ति उनकी आवाज और उनकी सादगी थी। पुराने कार्यकर्ता बताते हैं कि कॉमरेड बेनीवाल की आवाज इतनी बुलंद थी कि उन्हें हजारों की भीड़ को संबोधित करने के लिए किसी लाउडस्पीकर या माइक की जरूरत नहीं पड़ती थी। वे घंटों तक अपनी तीखी वाणी और चुटीले अंदाज से प्रशासन की चूलें हिला देते थे। विधानसभा का एक वाकया उनकी दबंगई को बखूबी दर्शाता है। एक बार सदन में भारी शोरगुल के बीच उन्होंने तत्कालीन अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा से दो टूक कहा कि पहले इन्हें चुप कराइए, तब बोलूंगा। इस पर अध्यक्ष ने मुस्कुराते हुए कहा था कि आप अपने स्वभाव में बोलिए, ये खुद चुप हो जाएंगे।






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