अग्नि आलोक
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*भावनाजी के आहत होने की मुबारकबाद!*

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        प्रखर अरोड़ा 

      अचानक आज दद्दा का खयाल आया। वह रफी साहब का गीत है न, “हुई शाम उनका खयाल आ गया।” गीत में शाम है और जिंदगी का सवाल है। मगर यहां ऐसा कुछ भी नहीं। वह क्या है कि दद्दा का जबसे टिकट कटा,तब से घर नहीं आए।

      दद्दा को मैं जानता हूं, वह शांत बैठने वालों में से नहीं हैं। कितनों का टिकट काट कर दद्दा आज इस मुकाम पर बैठे हैं कि अगर उनको जुखाम भी हो जाए तो लोकल पेपर की सुर्खियां बन जाती हैं।

      सुबह दद्दा का खयाल आया और शाम को उनका हाल-चाल लेने उनकी आधुनिक कुटिया पहुंच गया। 

पांच हजार स्क्वेयर फिट में फैले अपने बंगले को लोगों के सामने कुटिया कहते और पचास हजार स्क्वेयर फिट अपने फार्म हाउस को अपने लोगों के बीच आश्रम कहते। मैं जब उनकी कुटिया पहुंचा तो गार्ड ने मुझे सलाम किया। किसी औपचारिकतावश नहीं, वह मुझे जानता है।

      मैंने भी मुस्कुरा कर उसे जवाब दिया और थोड़ी देर रुककर उसका हाल-चाल लिया।जब मैं दद्दा के कमरे में गया तो देखा कि वे उदास बैठे हुए थे। 

      डायरेक्ट भारत बन्द से अपना करियर शुरू करने वाले और बात-बेबात दहाड़ने वाले दद्दा आज शांत कैसे हैं !’ पहुंचते ही मैंने समां बांधने की कोशिश की।

दद्दा फीकी मुस्कान फेंकते हुए बोले,’आज सुबह से मेरी भावना आहत नहीं हुई!’

यह जानकर मुझे खुशी हुई। मैंने उनसे कहा,’ यह तो अच्छी बात है दद्दा! आप बहुत भाग्यशाली हैं…’

यह सुनकर मेरी उम्मीदों के विपरित दद्दा भड़क गए।

वह बोले,’यार क्या अच्छी बात है! अब पूरा दिन कैसे कटेगा!अब तक आठ-दस खौलता पोस्ट और बीस-पच्चीस धमकियां सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक झोंक मारता!’

       ‘मारता, मरता, मारेंगे/मरेंगे, मिटेंगे,  मनवाएंगे ‘ प्रिय शब्द हैं उनके।

‘प्रभु सुमिरन करें माननीय महोदय! दिन ही नहीं संपूर्ण जीवन ही कट जायेगा!’, मैंने कहा।

‘ पिछवाड़ा खाए किलनी, दुआरे हरी कीर्तन!’ दद्दा ने गांव में बोली जाने वाली एक जबरदस्त कहावत को दे मारा। और मैं चारों खाने चित्त। कहावतों, लोकोक्तियों की यही तो विशेषता होती है कि सही जगह इस्तेमाल हो जाए तो सामने वाले की बोलती बन्द होने के सिवाय कोई चारा नहीं होता।

     मेरी हालत देख कर दद्दा को कुछ राहत मिली। वह धीरे से बोले,’ सिमरन तो दिन-रात करते हैं। अब इसको क्या बताना!’

      मैं प्रभु की बात कर रहा हूं,पर शायद आप आला कमान की बात कर रहें!’ मेरा यह दांव खाली न गया। दद्दा ने मुझे कुछ देर तक देखा। मुझे शांति मिली।

दद्दा ने गिलास उठाकर पानी पिया। उनके घर के गिलास और जग बहुत ही कलात्मक हैं। केवल गिलास और जग ही क्यों,सारे बर्तन। 

     ‘अब तुमसे क्या छुपाना! तुम तो हमें तब से जानते हो जब मैंने सड़क पर प्रदर्शन किया था तो पुलिस ने मुझे कितना सूता था। तब चाचा जी ने यानी कि तुम्हारे पिता जी ने जमानत देकर मुझको छुड़ाया था…’  

    ‘पिता जी ने अपने जीवन में बहुत से गलत काम किए हैं!’ मैंने बीच में बोल दिया।

  मेरे द्वारा टोका जाना दद्दा को अप्रिय लगा। उनकी भंगिमा से साफ पता चल रहा था।

‘एक मुझे ही देख लीजिए!’ यह सुनते ही दद्दा मुकुराए।

तभी मेरे लिए चाय का ट्रे लेकर उनका सेवक खड़ा होता है। दद्दा कुछ बोलते-बोलते रुक जाते हैं।

सेवक के जाने के बाद और मेरे कप उठाने से पहले दद्दा अपना रिदम फिर पकड़ते हैं,’ यार जब तक किसी को जली-कटी सुनाओ न,तब तक मजा नहीं आता! सार्थकता बोध नहीं होता!’

‘ओके… बात तो सही है आपकी…’ उनकी बातों का रस और चाय की मिठास दोनों एक साथ लेते हुए मैंने कहा।

‘चलो मेरी किसी बात पर तो सहमत हुए!’ दद्दा मुस्कुराए।

    मैंने चाय में बिस्किट नहीं बिस्कुट डुबोया और दद्दा अपनी बातों में डूबे,’अब तुमसे क्या छुपाना! जिस दिन भावनाएं आहत नहीं होती उस दिन मुझे खट्टी डकारें आने लगती हैं, दिल बैठने लगता है, हाथ-पांव फूलने लगते हैं…मन खिन्न खिन्न रहता है..’ तभी एक मक्खी भिन भिन करते हुए दद्दा के मुंह पर बैठी। जबकि खाद्य प्रदार्थ मेरे पास रखा हुआ था। दद्दा ने उसे झटके से उड़ाया।

‘तब तो गंभीर बात है दद्दा!’ दद्दा ने मेरी बातों को गंभीरता से लिया।

वही तो!’ दद्दा और गंभीर हो गए।

     मक्खी को इधर-उधर ढूंढते हुए दद्दा ‘ईहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता… ई मक्खी कहां से आ गई!!!’ खुद से बोले।

     ‘दद्दा परिंदा बड़ा होता है और मक्खी बहुत छोटी!’ मन हुआ कि दद्दा से यह बात कहूं मगर नहीं कहा।

‘यार कुछ भी करो! आज मेरी भावना आहत करो!!!’ दद्दा अचानक तड़के।

‘ मगर दद्दा कैसे!’

     ‘ऐसे तो मैं मर जाऊंगा! यार प्लीज!!!’ देखते ही देखते दद्दा ने याचक की मुद्रा अख्तियार कर ली थी।

आहत भावना का मारा वाकई बहुत ही मजबूर होता है!

मैंने अपने तईं कोशिश की।

‘दद्दा आप बहुत बुरे हैं,आप का सिक्योरिटी वाला बता रहा था कि दारू पी कर आपने उसे पीटा….’ यह कहकर मैंने असर देखने के लिए दद्दा को देखा। उनको देखते ही मैं समझ गया कि मेरी बात का कुछ असर नहीं हुआ।

     मैंने एक कोशिश और की।

‘दद्दा मुझे मालूम है कि पी डब्लू डी में काम करने के एवज में मुझे बीस हजार बड़े बाबू ने नहीं उनके नाम पर आप ने लिए थे!

    दद्दा आप राक्षस हैं। आप पिछले तीन सालों से एक विधवा को शादी का झांसा दिए जा रहे हैं।

    दद्दा आपने अपनी भतीजी का विवाह जबरदस्ती एक अधेड़ से करा दिया क्योंकि उसको जो लड़का पसंद था,वह दूसरी जात का था… 

दद्दा पिछले साल आपके खानदान में जो बहू जल कर मरी थी, दरअस्ल दहेज के लोभ में वह जलाई गई थी। और आप ने ही सारा मामला रफा-दफा करवाया था…

इस साल आपने जो मंदिर बनवाया है,उसके चंदे में आपने खूब पैसा खाया है…

    आपने कितने बेरोजगारों से नौकरी के नाम पर उनकी जमीन बिकवाई है…

   और पिता जी को आपकी जमानत नहीं करवानी चाहिए थी,अब निहायत ही घटिया आदमी हो….’

     अब मैं थक चुका था। मैंने पानी का गिलास तीन घूंट में खाली कर दिया।

बोलने के बाद मैंने दद्दा को देखा। दद्दा अविचल बने रहे। 

मैंने अंतिम एक कोशिश और की।

‘ महंगाई रिकार्ड तोड़ स्तर पर है…

बेरोजगारी दर अपने ऐतिहासिक स्तर पर है

अभूतपूर्व रूप से रुपया के गिरने की दर शायद नेताओं से ज्यादा हो गई है ..

पड़ोसी देश हमारे देश की जमीन हड़पता जा रहा है…

     मेरे कहे का दद्दा पर कोई असर नहीं हुआ।अब मेरी जान सूखी। क्या जरूरत थी ‘क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता ‘ गोविंदा बनने की।  फिल्म में गोविंदा के न चाहते हुए भी सबके मुंह पर उसके मन का सच धाराप्रवाह निकलने लगता है। कहीं दद्दा की कोई चाल तो नहीं! दद्दा ऐसे थोड़े ही न दद्दा हैं! दद्दा की अगर चाल हुई तो निश्चित ही मैं उसमें अब फंस चुका था।

दद्दा का फोन बजा।

     ‘जी जी…बिल्कुल…अवश्य…आज ही…आग लगा देंगे… छोड़ेंगे नहीं…अपने देश में रहना है तो कायदे से रहना होगा…उनको तो मैं देख लूंगा…जी हो जाएगा… नमस्कार!’

‘आला कमान का फोन था…’ फोन कटते ही दद्दा बोले।

      उन्होंने अपने ड्राइवर को गाड़ी निकालने को कहा। पलक झपकते ही आठ दस लोगों को दद्दा ने फोन मिला डाला। वे सबसे एक ही बात कहते,’ मिलो मौलवीगंज पे! कला के नाम पर खिलवाड़ नहीं चलेगा…हमारी भावनाएं आहत हुई हैं…’

‘ दद्दा एक पोस्टर छपवा दें!’

‘किस बात का!’ दद्दा सदरी डालते हुए बोले।

‘ यही कि फाइनली दद्दा की भावनाएं हुईं आहत! भावना आहत होने पर हमारे युवा हृदय सम्राट दद्दा को लख लख बधाई!’

‘ भक्क साला नौटंकी! दद्दा गमछा फेंकते हुए बोले।

     थोड़ी ही देर बाद दद्दा अपने दल बल के साथ तैयार थे। दद्दा चहक रहे थे। फुदक रहे थे। थोड़ी देर पहले जिस शरीर में जान न थी,अब वह किसी की जान लेने पर उतारू था। थोड़ी देर पहले जो चेहरा कांतिविहीन था, भावना आहत होने के बाद वह अब दमदमा रहा था।

     तुम्हारा घर उधर ही तो पड़ता है, चलो छोड़ देंगे!’ दद्दा के साथ उनकी गाड़ी में मैं बैठ गया। क्या शानदार कार। किसी नामचीन विदेशी कंपनी का लेटेस्ट मॉडल।

    गाड़ी में बैठ मैं सोचता रहा है कि भारतीय राजनीति क्या कल्पवृक्ष होती है! और भारतीय नेता क्या चीज होता है।

जो कल तक चक्का जाम करते थे,आज उनके पास आधा दर्जन चार पहिया खड़ी हैं। कल जो भारत बंद करा रहे थे,आज शहर के पॉश इलाके में लिए गए अपने नए  बंग्लो का ओपेन एरिया बता रहे हैं।

     कल जो हल्ला बोल रैली कर रहे थे,आज उनके कानों पर जूं नहीं रेंगती है।

    कल जिसने धरना दिया था,आज उसके घर में इतने इंपोटेड आइटम हैं कि उन्हें धरने की जगह कम पड़ती जा रही है।

  जेल भरो से चले थे,पेट भरने से इतने भारी हो गए हैं कि  चला नहीं जा रहा।

   ‘क्या सोच रहे हो!’ दद्दा ने पूछा।

‘नहीं कुछ नहीं!’ मैंने कार की खिड़की से बाहर देखते हुए कहा।

‘वैसे एक बात है दद्दा…भावनाओं का आहत होना आपको फलता है!’ मैंने दद्दा से धीरे से कहा।

‘ये राइटर हैं, मगर ससुर ढंग की एक लाइन भी नहीं लिख पाते!’ दद्दा ने अगली सीट पर बैठे अपने दाहिने हाथ से कहा। उनके दाहिने हाथ ने गर्दन ढेढ़ी करके मुझे देखा और मुस्कुरा दिया।

‘ क्या बात करते हैं दद्दा! आपके इस ताजा तरीन इवेंट के लिए कहिए अभी बैठे-बैठे एक जोरदार नारा लिख दें!’ मैंने दद्दा को चुनौती दी। मैं दद्दा को चुनौती कतई नहीं देता अगर उनका दाहिना हाथ मुझे देखकर मुस्कुराया न होता!

     दद्दा ने आंखों से इशारा किया।

मैंने झटपट एक नारा तैयार किया। और दद्दा को सुनाया,’देश का दम कम करता  है/ देश का दम जो भरता है ‘

एक और दद्दा,’ भावना आहत उनकी होती है/ जिनकी रोजी रोटी है ‘ लगे हाथों दूसरा भी सुना दिया। 

‘राम खिलावन गाड़ी रोको!’ दद्दा भारी आवाज में बोले।

     गाड़ी रुकते ही बोले,’यहां से ऑटो पकड़ लेना! अब हम दूसरे रूट से जाएंगे!’

   गाड़ी से उतरते हुए मैंने उनके दाएं हाथ को देखा। अब वह मुस्कुरा नहीं रहा था।

Ramswaroop Mantri

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