कांतिलाल मांडोत
बिहार में तीन दशक से सत्ता से बाहर कांग्रेस घर वापसी के लिए बेताब है।कांग्रेस के खिसकते जनाधार को दुबारा जोड़ने के लिए राहुल गांधी ने संविधान और आरक्षण के बहाने सामाजिक न्याय को सेट करने के लिए दांव चला।चुनाव की तपिश जैसे जैसे बढ़ रही है।राहुल गांधी की सियासी चाल भी बदलती जा रही है।
भाजपा निस्वार्थ सत्याग्रही है।कांग्रेस की महत्वकांशा भाजपा को पहले से मालूम है।कांग्रेस इतना घटिया आरोप लगा सकती है।यह चुनाव आयोग को भी मालूम नही था।एसआईआर की कांग्रेस की स्क्रिप्ट पर तेजस्वी भी शामिल हो गए।तेजस्वी ने एसआईआर के आंदोलन को संबल प्रदान करने के लिए वोटनीति और वोट चोरी के कथित आरोपो में कांग्रेस के साथ जुड़ गए।बिहार मे लोगो को भी प्रेरित किया।लेकिन इसकी असली वजह यह है कि बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है।कांग्रेस का बिहार की राजनीति से जुड़ाव नीरस हो होता जा रहा है।।तीन दशक का समय कम नही होता है।
तीस साल के व्यक्ति को यह खबर भी नही होगी कि कांग्रेस भी कोई दल है।क्योंकि तीन दशक से बिहार में कांग्रेस सता से बाहर है।कांग्रेस की इस तरह के बेतुके सवाल और जवाब देखकर बाहर बसे भारतवंशी जिन्हें देश की उन पार्टियों से पीड़ा पहुंचती है,जिन्होंने ऐसे विकल्प को उठाया है,जिसका कोई वजूद नही है।देश मे किसी एक पार्टी के व्यक्ति से लोग इतने नाराज नही हुए होंगे, जितना कांग्रेस से। बहरहाल,चुनाव आयोग ने कांग्रेस के सभी आरोपो का खंडन किया है।सत्ता की राजनीति ने आकंठ डूबे राजनेताओ से गिरते राजनीति के स्तर में सुधार की उम्मीद नही की जा सकती है।
कांग्रेस बारी बारी से राज्यो और केंद्र में ग्यारह वर्षो से सत्ता से दूर रहने के कारण छटपटा रही है।जूठे आरोप से ही अगर सत्ता मिलती है तो क्या हर्ज है?अपने कार्यकाल में कर्मठता ,ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की झलक देखने को मिलती है तो मतदाता कभी भी नेता और पार्टी को सत्ता के गलियारों तक पहुंचा सकते है।लोगो को साफ सुथरी राजनीति की जरूरत है।उसी दल या नेता ओ के लिए रात्रि जागरण का कार्य करते है,जो राजनीति में दूध की तरह सफेद है।ऐसे चुनिंदा लोग राजनीति में है,जिनके लिए मतदाता भरोसा भी करता है और पार्टी के प्रचार प्रसार के लिए तैयार रहते है।लोक जागरण के कार्य के लिए जनता को भरोसा होना बहुत आवश्यक है।राहुल और तेजस्वी के पीछे कोई तीसरा हाथ है,यह कहना जल्दबाजी होगी,लेकिन मोदी मिशन के इस एजेंडे को धराशायी करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे है।
कर्नाटक में राहुल ने उन वोटरों को समक्ष खड़ा कर कहा गया कि इन लोगो के नाम मतदाता सूची में काट दिया गया है।राहुल के बेबुनियाद आरोपो से निर्वाचन आयोग ने कांग्रेस के सभी आरोपो को दिशाहीन और जूठे बताए।बिहार में पैर जमाने और सत्ता का स्वाद चखने के लिए राहुल ने एसआईआर को ही केंद्र बिंदु नही बनाया है,उसके पूर्व बिहार में पलायन,पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर सियासी बिसात बिछाने में जुटी थी।कांग्रेस जाति धर्म,बाहुबल और तुष्टिकरण की नीति पर चुनाव जीतने की जुगत में है।इसलिए वह ऐसे लोगो को खड़ा कर रही है,जिसका कोई विरोध नहीं करता है।
हालांकि ,बिहार में राजनैतिक तौर पर कांग्रेस पहचान बना पाई है और न ही राजद उस धुरी तक पहुंच गई है,जो बिहार में कुछ उम्मीद छोड़ सके।कांग्रेस अपना एजेंडा ओबिसी,दलित और अल्पसंख्यक वोटो के इर्द गिर्द बुन रही है।कांग्रेस ने जिन बेबुनियाद मुद्दे उठाए है इसके लिए मतदाता क्या सोचते है ?यह तो आने वाला समय ही बताएगा।कांग्रेस अपने कुनबे को जोड़ने का प्रयास कर रही है,वही कांग्रेस को वजूद बचाने की जद्दोजहद करनी पड़ेगी।कांग्रेस अब बिखरा हुआ दल है।
कांग्रेस का भूतकाल खण्डित रहा है।कांग्रेस पर आजादी के बाद से अनगिनत आरोप लगे है।इससे मतदाता सोच समझकर फैसला करता है।आज के मतदाता सोच समझकर निर्णय लेते है।कांग्रेस की स्थिति बिहार में आश्वासन देने की नही रही है।प्रदेश संगठन की कमान भूमिहार नेता से लेकर दलित समाज के नेता को सौंप दी है।बिहार में नीतीश को सुशासन बाबू का तमगा मिला हुआ है।बिहार को कांग्रेस ने फटेहाल स्थिति में छोड़ दिया था।उसके बाद लालू ने 15 साल तक राज किया और बिहार को नरकगामी बना दिया।
जंगल राज की राजनीति खत्म होते ही मतदाताओ ने नीतीश बाबु का दामन थाम लिया और अब फिर से कांग्रेस बिहार की सत्ता के गलियारों तक पहुंचने के लिए कुतर्क का सहारा ले रही है।तीस साल सत्ता से बाहर रहने के बाद भी कांग्रेस ने कोई सबक नही सीखा है। कांग्रेस उसी पुराने ढर्रे पर ही चल रही है,जिसको तीन दशक पहले छोड़ आई थी।बिहार में कांग्रेस वापसी के लिए इस कदर बेचैन है कि वह हर हालत में सत्ता हासिल करना चाहती है।और इसके लिए गठबंधन भी करना पड़ेगा तो उसे मंजूर है।बिहार के चुनाव आयोग की sir की सियासी चाल बदल दी है।निर्वाचन आयोग पूरे देश मे sir लगाने की कवायद शुरू की है।देश मे मतदाता सूची का पुनर्निरीक्षण समय की मांग है।बिहार के सियासी खेल में अन्य दलों के नेताओ ने हिस्सा लिया और इस रोमांस का लुफ्त तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्तालिन ने भी उठाया।
कांग्रेस का फोकस अब वोटनीति और वोट चोरी पर केंद्रित है।वोटनीति और वोट चोरी के शोरगुल में अहम मुद्दे छूटते दिखाई दे रहे है।राहुल ने सबसे पहले समाजिक न्याय का मुद्दा उठाया था जिसमे जातिगत मतगणना और दलित पिछडोका मुद्दा उठाया।कांग्रेस की सियासी चाल से बिहार में ठंडे पानी मे उबाल देखने को मिल रहा है।मोदी के जन्म दिवस पर बिहार में एक मंच पर बिहार के मतदाताओं को नीतीश कुमार ने मोदी से हाथ जोड़कर नमस्ते करने का आग्रह किया और एक ही क्षण में हजारो हाथ खड़े हो गए।बिहार में मोदी की लोकप्रियता कम नही हुई है।तब सवाल यह उठता है कि एकाएक कांग्रेस का सियासी रथ कहा जाकर रुकेगा।
क्योकि कांग्रेस के पास कोई ऐसे मुद्दे नही है,जिससे नीतीश कुमार के सुशासन बाबू का तमगा छीना जा सके।इस बीच तेजस्वी ने राह बदल दी है।क्योंकि वोटचोरी का मुद्दा बिहार में असरदार नही दिख रहा है।क्योंकि चुनाव आते आते लोग इस मुद्दे को भूल जाएंगे।इस बीच तेजस्वी ने अधिकार यात्रा शुरू की है ।बिहार के इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कांग्रेस के आरोप खारिज करते हुए भाजपा ने कहा कि कांग्रेस ने यात्रा घुसपैठियों को बचाने के लिए निकाली गई थी।उधर,मोदी ने बिहार की सभा से कहा कि घुसपैठियों को बिहार से निकालकर रहेंगे।
(स्वतंत्र पत्रकार ,साहित्यकार -स्तम्भकार)





