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आत्म’तत्व और पंच’तत्व के संयोग से बनता है चेतन’तत्व

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डॉ. विकास मानव

   _मानव इतिहास के शोध एवम् अन्वेषण का विषय रहा है--जीवन का वह तत्व जो पंचतत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा ) के साथ मिलकर इनको चेतनता प्रदान करता है। क्या है वह जीवन का तत्व ? वह तत्व है--'आत्मतत्व' अर्थात् 'आत्मा' और उसके मूलस्रोत को कहते हैं--'परमात्मतत्व' अर्थात् 'परमात्मा'। आत्मतत्व और पंचतत्व मिलकर ही चेतनतत्व निर्मित होता है जो जड़-चेतन सभी में आवश्यक मात्रा में व्याप्त है। आत्मतत्व और पंचतत्व के मिलन का जो आधार है, वह है--'प्राणतत्व'।_
  प्राणतत्व अति महत्वपूर्ण है। इसकी सत्ता स्वतन्त्र है। मनुष्य का स्थूल शरीर पंचतत्वों से निर्मित है। प्राणतत्व के माध्यम से आत्मतत्व से उनका सम्बंध बनता है और फिर शरीर हो जाता है चैतन्य जिसे ही हम 'जीवन' कहते हैं।

पंचतत्वों का क्रमशः क्षय होता है यदि वे एक में मिश्रित हैं। यदि पांचों अलग-अलग हैं तो उनके रूपों में बराबर परिवर्तन होता रहता है। पंचतत्व मिश्रित शरीर का क्षय होता है, परिवर्तन नहीं। लेकिन प्राणतत्व के बीच में से हटते ही आत्मतत्व अलग हो जाता है स्थूल शरीर से। इसी का नाम ‘मृत्यु’ है।
जैसे-जैसे पंचतत्वों का क्षरण होता जाता है, वैसे-ही-वैसे आयु क्षीण होती जाती है और अपनी सीमा पर जाकर समाप्त हो जाती है वह। अध्यात्म के इस मत से कि जीवन व जड़ प्रकृति में भी सामंजस्य है, आधुनिक विज्ञान सहमत है।
चेतनाविहीन वस्तुएँ भी तो उसी जड़ प्रकृति में विलीन हो जाती हैं एक-न-एक दिन। अब अध्यात्म-वेत्ताओं की तरह विज्ञान-वेत्ता भी यह स्वीकार करने लगे हैं कि इस विश्वब्रह्माण्ड की कोई सुनिश्चित और सुनियोजित नियामक सत्ता है।
सभी धर्म उस सत्ता को किसी-न-किसी रूप में स्वीकार करते हैं। सभी धर्म उसे ही ‘सर्वशक्तिमान’ मानते हैं–इसमें सन्देह नहीं।
[चेतना विकास मिशन]

Ramswaroop Mantri

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