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*सेवन वंडर :मलवा बनेगा या शिफ्ट किया जाएगा* 

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सुप्रीम कोर्ट ने एक माह में हटाने के लिए आदेश,पाथवे पर भी खतरा बरकरार, नए वेटलैंड के लिए मांगी विस्तृत रिपोर्ट

ओम माथुर 

     जिला प्रशासन की सेवन वंडर को बचाने की मंशा सुप्रीम कोर्ट में आज नाकाम हो गई। सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई के दौरान जज अभय ओका और उज्जवल भुयान ने सेवन वंडर को एक माह में हटाने के निर्देश देते हुए इसकी रिपोर्ट अगली सुनवाई पर 16 मई को पेश करने के आदेश दिए। अब इसे तोड़ना है या शिफ्ट करना है,यह फैसला प्रशासन को करना है। लेकिन जिस तरह सेवन वंडर में लगी स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी को हटाने में पिछले महीने एडीए के पसीने छूट गए थे,उसे देखते हुए लगता नहीं है इन वंडर्स को कहीं और शिफ्ट किया जा सकेगा। लगता है 11 करोड़ के सेवन वंडर्स का मलवा ठीक वैसे ही बनेगा,जैसा 5 करोड़ के फूड कोर्ट का बना था। उल्लेखनीय है कि पिछली अदालत ने इन्हें हटाने के लिए 6 माह का वक्त दिया था, जिसे अब एक महीने कर दिया गया है।

      पिछली सुनवाई के बाद जिला प्रशासन इस कोशिश में था कि शहर में दो स्थानों तबीजी और फायसागर में नए वेटलैंड बनाकर वह सेवन वंडर और पाथवे को बचा ले। हालांकि पाथवे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कोई फैसला नहीं दिया है। उसने पहले दोनों नए वेटलैंड की स्थिति पर समुचित प्रस्ताव मांगे है। अगर अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पाथवे को भी हटाने के निर्देश दे दिए (जिसकी आशंका कायम है ) तो,दो वेटलैंड जिला प्रशासन के लिए उड़ता तीर साबित होंगे। यानी जिन्हें बचाने की कोशिश की वो तो बचेंगे नहीं, उल्टे दो नए वेटलैंड और विकसित करने होंगे।

       फूड कोर्ट तोडऩे और सेवन वंडर को हटाने के आदेशों के बाद अब जिला प्रशासन और सरकार पाथवे को बचाने की जुगत में लग गई है। आज जब सुप्रीम कोर्ट में जजों ने पाथवे पर की गई कार्रवाई के बारे में पूछा, तो सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह कहकर इसका बचाव किया कि पाथवे झील की परिधि पर है। यदि इसे हटाया गया तो झील की तलहटी और वैटलैंड पर अवैध कब्जों की संभावना बढ़ जाएगी। जबकि हकीकत यह है कि पाथवे की बनावट ही गवाह है कि इसे बनाने में कितना घालमेल किया गया है। किस तरह कुछ जमीनों और सम्पत्तियों को बचाने के लिए कितनी जगह इसे टेढामेढा-जिगजैग किया गया। पाथवे के पीछे महज चार-पांच फीट पर बने मकान और पड़ी जमीनें इस बात की गवाह है कि बेईमानी बडे़ पैमाने पर हुई है। लेकिन फिर भी मंशा इसे बचाकर इसकी एवज में तबीजी और फायसागर में नए वेटलैंड बनाने की है।

     लेकिन सवाल ये है कि क्या सुप्रीम कोर्ट नए बनने वाले दो वेटलैंड को आनासागर के वेटलैंड का विकल्प मान लेगा? फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए कि वह एक महीने के अंदर दोनों नए वेटलैंड पर विस्तृत प्रस्ताव बना नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट नीरी और अन्य विशेषज्ञ की रिपोर्ट पेश करें। सरकार की ओर से जहां तुषार मेहता और राजस्थान के अतिरिक्त महाधिवक्ता मामले की पैरवी कर रहे हैं, वहीं याचिकाकर्ता अशोक मलिक खुद ही इन कानूनी दिग्गजों को चुनौती दे रहे थे। सेवन वंडर हटाने के आदेश के बाद अब यह तय माना जा रहा है कि जिन 35 से ज्यादा निर्माण कार्यों को पिछले साल एडीए ने आनासागर के वेटलैंड में मानकर सीज किए थे, वह भी अब तोड़े जाएंगे।

       विडंबना ये है कि एक और राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में पहले फूड कोर्ट और सेवन वंडर तमाम कुतर्कों के बाद भी बचाने में नाकाम रही है। वहीं वह अभी भी अदालत को झूठी जानकारियां देने से बाज नहीं आ रही है। आजाद पार्क और पटेल मैदान में हुए निर्माण को लेकर भी जिला कलक्टर लोकबंधु ने स्मार्ट सिटी लिमिटेड के सीईओ के रूप में जो 31 पेज का एडिशनल एफिडेविट पेश किया था। उसमें उन्होंने आजाद पार्क को पोलो ग्राउंड बताया है। कमाल है, अजमेर में उसमें पोलो ग्राउंड। शहर के लोगों ने आज से पहले शायद ही ये सुना हो। एफिडेविट में कहा है कि पोलो ग्राउंड में पार्क संबंधी कानून प्रतिबंध लागू नहीं होते हैं। यानि निर्माण सही हैं।  जबकि अजमेर के मास्टर प्लान 2033 में स्पष्ट रूप से आजाद पार्क को उद्यान के रूप में दर्शाया गया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये भी है कि आजाद पार्क और पटेल मैदान में बनाए गए व्यावसायिक भवन,ऑडिटोरियम और अन्य भवनों के नक्शे पास नहीं है और ना ही भू उपयोग परिवर्तन कराया गया है।

      स्मार्ट सिटी के नाम पर किए गए बेफिजूल के निर्माण और उनकी तोड़फोड़ से करोड़ों रुपए के नुकसान की भरपाई क्या उन अधिकारियों-अभियंताओं से नहीं की जानी चाहिए, जिनके रहते यह सब हुआ? क्या कोई भी शहरी इस मुद्दे को अदालत में लेकर जाएगा? क्या अदालत को खुद संज्ञान लेते हुए इस बारे में कोई निर्देश नहीं देने चाहिए? आखिर टैक्सपेयर के पैसों की बर्बादी के जिम्मेदार तय होने चाहिए और फिर इसकी वसूली उनके वेतन और पेंशन से होनी चाहिए। अगर ऐसी मिसाल बनेगी, तो ही भविष्य में अधिकारी और अभियंता गलत और नियमविरुद्ध काम करते हुए डरेंगे. वरना जो चलता है वही चलता रहेगा। हां किसी भी दल के नेता से कोई उम्मीद मत कीजिए, क्योंकि अधिकारी उनके संरक्षण में ही फलते फूलते हैं और मलाई में उनका भी हिस्सा तय होता है।

Ramswaroop Mantri

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