अग्नि आलोक
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*पूर्व निगमायुक्त प्रतिभा पाल को कोर्ट की ज़ोरदार फ़टकार* 

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*’आपको कलेक्टर जनता का शोषण करने को नही बनाया’*  _किसान की जमीन मसले पर इंदौर में निगमायुक्त रही प्रतिभा पाल को बतौर रीवा कलेक्टर जज से मिली डाट व कड़ी नसीहत, _बतौर निगमायुक्त इंदौर में भी मेडम पाल की अकड़ पूरे समय रही थी चर्चा में, रीवा में भी वही रवैया, पड़ी डाट,_बावड़ी कांड, 36 मौत वाली घटना पर भी सामने आया था पाल का असंवेदनशील चेहरा, पीड़ित की पीड़ा से स्वयं को नही जोड़ा* 200 करोड़ के नाला टैपिंग घोटाले के आरोप भी लगे, 300 करोड़ की ड्रेनेज योजना व अधूरे छुटे स्मार्ट सिटी के काम भी चर्चा में रहें_ प्रवासी सम्मेलन के बेतहाशा खर्च पर भी उठे थे सवाल, निगम का खज़ाना ख़ाली हो गया था_ 

 *_तब जो राज्य में निज़ाम था, वह अफसरशाही को प्रश्रय देने वाला था। लिहाज़ा ‘ ब्यूरोक्रेसी’ ही जन जन की भाग्यविधाता बनी हुई थी। यहां तक कि निज़ाम की निज़ामत में लगे जनप्रतिनिधियों को भी अफ़सरशाही के समक्ष नतमस्तक होना पड़ता था। कई जिलों में तो अफ़सर सरकार के साथ ‘संगठन का कामकाज’ भी देख, संभाल रहे थे। फैसले सरकार की जगह अफ़सर कर रहें थे। सरकार में ब्यूरोक्रेसी के इस जबरदस्त दख़ल की गूंज दिल्ली तक थी। जनप्रतिनिधियों की मुख्य शिकायतें ही ये थी कि अफ़सर हमे भी कुछ नही समझते। समझते भी कैसे? निज़ाम का प्रश्रय जो था। उसी दौर में इंदौर शहर ने भी ब्यूरोक्रेसी के ‘ ठसके’ करीब से देखे भी, झेले भी। वह भी किसी ‘ सामंती व्यवहार’ की तरह कि जो हमने तय कर दिया, वह अंतिम हैं। उस वक्त निगम व जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली जनचर्चा का विषय थी जो आज तक इंदौर में जारी हैं। इसलिए ही रीवा में हुआ एक घटनाक्रम झट से इंदौर से जुड़ गया। पक्का इन्दौरी हैं न आपका अखबार ख़ुलासा फर्स्ट? तो फ़िर वह इंदौर के हिस्से का ‘ ईश्वरीय न्याय’ कैसे बिसरा सकता हैं। भले ही वह इंदौर से करीब हज़ार किमी दूर विंध्य प्रदेश जाकर मिला।_* 

 *नितिनमोहन शर्मा*

कहते हैं न, ईश्वर के घर देर हैं-अंधेर नही। ये भी सर्वविदित हैं कि कोई न्याय करे न करें, वक्त आने पर ईश्वरीय न्याय होता ही हैं। चाहे कोई कितना भी ताक़तवर या शक्तिशाली हो। ये लोकोक्तियां आज फ़िर चर्चा में इसलिए आई कि इंदौर का ‘ ईश्वरीय न्याय’ प्रदेश के आख़री छोर पर बसे रीवा शहर में जाकर पूरा हुआ। रीवा कलेक्टर को कोर्ट की वो फ़टकार पड़ी हैं, जो सम्भवतः किसी कलेक्टर को आज तक नही पड़ी होगी। जज साहब ने कलेक्टर को दो टूक समझा दिया कि आपको कलेक्टर इसलिए नही बनाया कि आप जनता का शोषण करें। मामला कड़ी फटकार, डाट पर ही नही रुका। कलेक्टर को अपने कार्य व्यवहार व आचरण पर 10 हज़ार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। मामला एक किसान की ज़मीन अधिग्रहण से जुड़ा था। इस मामले में माननीय न्यायालय तक के आदेश की अनदेखी हो रही थी। जस्टिस विवेक अग्रवाल ने इस मसले पर न सिर्फ़ 4 घण्टे में कलेक्टर को अपने समक्ष हाज़िर करवाया बल्कि अच्छे से कानून का पाठ भी पढ़ाया।

 *ये कलेक्टर है मोहतरम प्रतिभा पाल। आप इंदौर में भी बतौर निगमायुक्त पदस्थ रहीं हैं। आपके कार्यकाल में ही बेहद दुःखद व विभत्स बावड़ी कांड हुआ था। स्नेह नगर में हुए इस हादसे में एक साथ 36 जिंदगियां काल के गाल में समा गई थी। तब इंदौर कलेक्टर डी राजा थे और निगमायुक्त प्रतिभा पाल। बावड़ी कांड नगर निगम के हिस्से का ही था और निगम की घोर लापरवाही के कारण हुआ था। तब भी मोहतरम पाल मेडम का रवैया इंदौर शहर को हज़म नही हुआ था। हादसे के दिन जब तत्कालीन कलेक्टर राजा स्वयम आपदा प्रबंध दल के साथ जूझ रहे थे तब मेडम पाल भावशून्य हो फ़ोन पर मशरूफ़ थी। एक तरफ लाशें निकल रही थी और कलेक्टर सहित हर चेहरे पर दर्द, पश्चाताप व संवेदना मंडरा रही थी, तब मेडम पाल का असंवेदनशील चेहरा सब तरफ़ चर्चा का विषय बना हुआ था।* 

बतौर निगमायुक्त उनका इंदौर का कार्यकाल भी अकड़ से भरा रहा। फ़िर वह मामला प्रवासी भारतीय सम्मेलन के बेतहाशा खर्च का हो या स्मार्ट सिटी के अधूरे रह गए कामकाज का। या फिर 200 करोड़ के नाला टेपिंग घोटाले के आरोपों का हो या फिर 300 करोड़ की ड्रेनेज योजना का मामला। पाल ने वो ही किया, जो उन्हें पसंद था। उनका कार्यकाल शहर नए महापौर के लिये भी एक कड़वी याद के रूप में रहा। तब ये चर्चा आम थी कि मेडम का मुख्यालय नगर निगम जरूर था लेक़िन उनके फ़ैसले कही और से होते थे। वही अकड़ रीवा में चल नही पाई। वह भी बतौर कलेक्टर। जिस मामले में उन्हें कोर्ट में पेश होना था, उसमे उन्होंने अपने अधीनस्थ को भेज दिया। परिणाम 4 घण्टे के अल्प अंतराल में कोर्ट रूम में हाज़िर होने व कड़ी फटकार के रूप में सामने आया।

 *अकड़ है कि जाती नही, अपनी जगह जूनियर आईएएस को कोर्ट भेज दिया* 

 *रीवा में एक किसान की जमीन अधिग्रहण का मुआवजा 1993 के बाद से 2024 तक नही मिला था। किसान से 2015 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। कलेक्टर पाल द्वारा इस मसले पर लगातार कोर्ट की अनदेखी की जा रही थी। इससे नाराज़ होकर जस्टिस विवेक अग्रवाल ने कलेक्टर प्रतिभा पाल को कोर्ट में हाज़िर होने के आदेश दिए थे। बावजूद इसके मेडम पाल ने अपनी जगह एक जूनियर आईएएस को कोर्ट भेज दिया। कोर्ट ने इसे स्वीकार नही किया और मेडम पाल को 4 घण्टे में हाज़िर होने को कहां। जस्टिस अग्रवाल ने साफ़ शब्दों में पाल को कहा कि आपको कलेक्टर इसलिए नही बनाया गया आप लोगो का हक छीने या उनका शोषण करें। जज साहब ने ये हिदायत भी दी कि आज की फटकार को अपने दिमाग़ में हमेशा के लिए ध्यान से रख लीजिए। कलेक्टर पाल ने सर झुकाकर जी सर कहा और बुझे मन से एक तरफ़ हो गई। समूचा कोर्ट रूम इस टिप्पणी पर कलेक्टर पाल जैसा ही हतप्रभ रह गया।

Ramswaroop Mantri

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