अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*गाय ने लिखी चिट्ठी आवारा नहीं, बेचारा कहो*

Share

मूल बघेली से हिंदी अनुवाद ऋषभ तिवारी

बेटा राम राम! बिटिया राम राम!
कैसे हो प्यारे बच्चों; तुमको देखे तो लगता है एकाध युग बीत गया है। तुमको देखने का, तुमको दुलारने का बहुत मन करता है। पर क्या करूँ, जब से तुम्हारे अम्मा बाबा ने खूंटे से छोड़कर खदेड़ा है, तब से ऐसे ही गली-गली भटकती रहती हूँ। लौटकर कई बार घर की तरफ़ आयी भी, पर मत पूछो…इतनी गंदी-गंदी गालियां; और ऐसे लाठी उमगाते थे कि पीठ अकड़ जाती थी। बाड़े के बाहर से जब अपनी सूखी नाद, अपना सूना खूँटा देखती तो मन बेचैन होने लगता था। लगता अभी तुम लोग आओगे और पीठ सहलाते हुए अंदर ले चलोगे।
अब तुम ही बताओ; मैं कहाँ जाऊँ, मेरा कौन सा घर है, मैंने कहाँ कुआँ खुदवा रखा है। जिस दरवाज़े जाती हूँ कोई आवारा कह कर, कोई बाँझ कहकर खदेड़ देता है। उस पर ये जेठ की धूप.. पूछो मत। चौमास में तो और अधिक ताड़ना होती है। गोबर और पेशाब में लिथड़ी हुई यूँ ही कहीं खड़ी रहती हूँ। भीगते-भीगते खुर सड़ जाते हैं। पूरे गाँव में सीमेंट के पक्के मकान बन गए हैं। किसी के घर के पिछवाड़े में भी कच्ची रसोई तक नहीं हैं,कि उसी के छज्जे के नीचे सिर छुपा सकें। बरसते पानी में भूखी इधर से उधर भटकती रहती हूँ। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि दी-दो तीन-तीन दिन तक पीने का पानी तक नसीब नहीं होता है। चौमास किसी तरह बीता तो जाड़ा आ गया। पूष-माघ में भी ऐसे ही खुले में पड़ी रहती हूँ; तब लगता है हे दीनानाथ काश कोई सड़ा-गला बोरा ही ओढ़ा दे।
मेरी क़िस्मत में तो चलो जो है सो है, पर मेरे साथ मेरे बछड़े की भी दुर्गति हो रही है। तुम्हारे बाबा ने उसको भी तो मेरे साथ ही खदेड़ दिया था। तुम्हारी अम्मा बल्कि मना भी कर रही थी कि अभी बहुत छोटा है, कहाँ जाएगा, पर तुम्हारे बाबा नहीं माने; कहने लगे- अब खेतों में हल बैल की क्या ज़रूरत है, कहाँ हमको खेत समतल करना है, और कौन सा हमें बैलों से फ़सल से दाने निकलवाने हैं; सिर में ये बोझ लादे क्यों फिरें। मैं तो किसी तरह सह-बहकर जी रही हूँ, पर ये बछड़ा तो अभी एक साल का भी नहीं हुआ है; मुझसे ये कैसे देखा जाए कि वो मेरे साथ ही टट्टी-पेशाब में घुसा खाना ढूँढ रहा है, कीचड़ में धँसा बरसातियाँ चबाता रहता है। जब मुझसे ये सब सहन नहीं हुआ तो इसको भी पीछे-पीछे लिए जंगल पहाड़ की तरफ़ भागी।

भाग-२
मेरी अम्मा और उसकी सखी बताया करती थीं कि पहाड़ में बहुत ऊँचे-ऊँचे घने पेड़ हैं; वहाँ ख़ूब चारा उगा रहता है। पानी के छोटे-छोटे झरने हैं, जिससे पानी रिसकर गड्ढों में भरा रहता है। जब तक इच्छा हो चरो नहीं तो मस्त पानी पीकर पेड़ की छांव में पड़े रहो। अम्मा बताया करती थी कि एक चरवाहा था, बहुत उम्र नहीं रही होगी, नाम उसका भूल रहा है, वो हरे बाँस की इतनी सुंदर बाँसुरी बनाता था कि क्या कहना और उतनी ही सुन्दर बजाता भी था। अम्मा लोग तो उसकी बाँसुरी सुनकर सो तक जाया करती थीं।
यही क़िस्सा मन में लिए मैं भी पहाड़ पहुँच गई। पर वहाँ की हालत देखकर तो होश ही उड़ गए। पूरे पहाड़ में सिर्फ़ सागौन ही सागौन; न पीपल, ना महुआ, ना बरगद, ना नीम। ये तो ठीक वहाँ पलाश और सेधा तक के पेड़ भी नदारद थे; बाँसुरी, चरवाहा ये सब की तो बात ही छोड़ दो। हाँ कुछ जंगली सुअर और बंदर ज़रूर मिल गए। पहले उन्होंने ख़ूब ताने दिए कि और कर लो इंसानों से दोस्ती, क्या मिला। जब वो थोड़ा शांत हुए तो मैंने पूछा कि तुम लोग तो इंसानों से दूर ही रहा करते थे, अब उनकी फ़सलें बाग़-बग़ीचे क्यों उजाड़ने लगे। वो बेचारे भी कहने लगे कि जंगल में न अब खाने को कुछ है, न रहने को; इस सागौन के पेड़ में क्या खायें और कहाँ रहें। ये पेड़ इतना ईर्ष्यालु है कि अपने आस-पास घास तक नहीं उगने देता। बंदर तो कहने लगे कि तुम अभी भी इंसानों को मोह में अंधी हो; चलो तुम ही बता दो कि हम लोग करें तो क्या करें। मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। जब जंगल में भी आसरा नहीं मिला तो शहर की ओर भागी।

भाग-३

वही चौड़ा वाला रास्ता पकड़ लिया, जिसको तुम लोग क्या तो कहते हो, कुछ अच्छा ही नाम है- हवे..नहीं होवे..अरे हाँ हाइवे। यहाँ ये बड़े-बड़े दानव जैसे मोटर-वाहन साँय-साँय भाग रहे थे। इनको देखकर तो मेरी अक़ल चकरा गई। जिस तरफ़ भी नज़र पड़ती लगता कोई दानव मेरी ही ओर दौड़ा आ रहा है। मैं अकेले होती तो फिर भी, पर साथ में ये बछड़ा भी आया था। उसको अकेले कहाँ छोड़ आती। वो मुझसे भी अधिक घबराया हुआ था;  कही इस तरफ़ कूद कर भागता, तो कहीं उस तरफ़। यही करते-कराते वो अचानक ही हाईवे के बीचों-बीच आ गया। अंधियारी रात थी, एक दानव बौखलाकर उसकी ओर झपटा और मेरे बच्चे को निगल गया। थोड़ी देर तक तो मैं समझ ही नहीं पाई कि हुआ क्या; जब तक समझा आया तब तक तो..यह बात तुमसे कहना तो नहीं चाहिए.. उसकी आंतों से बरसाती ही बरसाती निकल आयी थी.. सिर्फ़ बरसाती।

भाग-४
प्यारे बच्चों, अब मेरी जीने की इच्छा नहीं है।अपने बछड़े के बग़ल में बैठ कर ही ये चिट्ठी तुमको लिख रही हूँ। मरने के पहले मेरा बहुत मन था कि तुम दोनों को जी भर के देख लेती, तुम्हें दुलार लेती। तुमको याद है जब मैं तुम लोगों की हथेली में जीभ फिराती थी तो कैसी गुदगुदी होती थी; तुम लोग मेरी पीठ पर बैठ कर तालाब जाया करते थे; कभी-कभी सींग पकड़कर झूल जाते थे; लुका-छुपी खेलते समय चुपचाप मेरे पीछे घंटो छुपे रहते थे ,याद है ना। तुम्हारे अम्मा बाबा ने तो चलो मुझे घर से कूड़े की तरह बाहर कर दिया, पर तुम लोग ऐसा मत करना। मेरी बछिया तुम्हारे घर में ही बँधी होगी। एक-दो साल में वो दूध भी देने लगेगी। वो बहुत सीधी है; उसको अपनी छोटी बहन की तरह रखना। जब वो दूध देना बंद कर दे  तो उसे खदेड़ मत देना, वो तुम्हारे बहुत काम आएगी। गाय सिर्फ़ दूध नहीं देती; घर में इतना महँगा गैस सिलेंडर ख़रीदते हो, उसकी जगह बिना धुआँ वाला चूल्हा बन सकता है, गोबर गैस बन सकती है। इतना भर नहीं गोबर की खाद खेत के लिए अमृत है। ये यूरिया डीएपी खा-खाकर तुम्हारे अम्मा-बाबा बीपी, डायबिटीज़ के मरीज़ हो गए हैं , पर ये तुमको ऐसी बीमारियां नहीं होने देगी। गोबर से दिया,गमले, खिलौने और ऐसा ही बहुत कुछ बनाया जा सकता है। तुमको भी शायद पता हो गोबर से तो वाल पेंट भी बनाया जाता है।गोमूत्र से फ़सल में छिड़काव के लिए कीटनाशक बनाए जाते हैं। इंसानों के कई मरज़ों की दवा गोमूत्र से बनायी जाती है।
जब तुम लोग बड़े हो जाओगे और घर-गाँव छोड़कर गुजरात,बम्बई में दस-बीस हज़ार की नौकरी ढूँढते फिरोगे तब यही बछिया, तुम्हारी बहन, तुम्हारे लिए घर बैठे दस- बीस हज़ार की व्यवस्था बना देगी। इसके अलावा मान लो कभी घर में सत्यनारायण की कथा भी सुनोगे तो ग़ौर बनाने के लिए गाय का गोबर किसके दरवाज़े में माँगते फिरोगे।
इसीलिए मेरे बच्चों तुम से हाथ जोड़कर विनती है कि मेरी बछिया को मेरी ही तरह नाले-नाली का पानी पीने के लिए मत छोड़ देना; वो तुम्हारी माँ की तरह ही तुम्हारा ख़याल रखेगी।
अधिक कुछ कहने की हिम्मत नहीं है। अब मेरे जाने का समय आ गया है। तुम लोग फलो-फूलो, ख़ूब ख़ुश रहो। मैं अपने लाल के पास जा रही हूँ। मेरी बछिया का ख़याल रखना।

तुम्हारी गइया

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें