डॉ. नीलम ज्योति
यह प्रयोग उनके लिए है जो न निर्जन स्थान पर जा सकते हों, न पहाड़ न चढ़ सकते हों, न आसन लगा सकते हों. यहाँ तक की तनिक भी शारीरिक श्रम नहीं कर सकते हों.
केवल पंद्रह मिनट को सुबह उठकर स्नान करने के बाद एकांत कमरे में लेट जाएं. आंख बंद कर लें. कल्पना करें कि मैं पहाड़ियां चढ़ रहा हूं. दौड़ रहा हूं।
सिर्फ कल्पना करें, कुछ न करें। वृद्ध हैं, वे नहीं जा सकते हैं। या ऐसी जगह हैं कि वहां घूमने नहीं जा सकते हैं। तो एकांत कमरे में लेट जाएं, आंख बंद कर लें और कल्पना करें कि मैं जा रहा हूं, एक पहाड़ चढ़ रहा हूं और दौड़ रहा हूं। धूप तेज है और मैं भागा चला जा रहा हूं। मेरी श्वास जोर से बढ़ रही है।
आप हैरान होंगे, आपकी श्वास बढ़ने लगेगी। आपकी इमेजिनेशन, आपकी कल्पना जितनी प्रगाढ़ होती जाएगी. आप पंद्रह मिनट में पाएंगे कि जो घूमने का फायदा था, वह मिल गया है।
आप पंद्रह मिनट बाद बिलकुल ताजे होकर के उठ आएंगे। जरूरी नहीं है कि आप योगासन करने जाएं। शरीर के अणुओं को पता चलना चाहिए कि कार्य हो रहा है, तो वे तैयार हो जाते हैं।
यानि वे उसी स्थिति में आ जाते हैं, जिस स्थिति में वस्तुतः आप चले होते तब आते। वे उसी स्थिति में आ जाते हैं। संसर्गयोग (संभोग) का शिखर अनुभव भी इस तरह के प्रयोग से आप ले सकते हैं.
क्या आपने कभी खयाल नहीं किया, स्वप्न में घबड़ा गए हों, तो उठने के बाद भी हृदय कंपता रहता है।
क्यों?
स्वप्न की घबड़ाहट तो बड़ी झूठी थी, लेकिन हृदय क्यों कंप रहा है? जागने पर भी क्यों कंप रहा है?
हृदय तो कंप गया, हृदय को बिलकुल पता नहीं है कि यह स्वप्न में घटना घटी कि सच में घटना घटी। हृदय को तो पता है कि घटना घटी, बस।
तो अगर आप इमेजिनेशन में भी योगासन करते हैं, तो फायदा उतना ही हो जाता है, जितना कि वस्तुतः व्यायाम करिए। कोई भेद नहीं पड़ता।
इसलिए जो बहुत समझदार थे इस मामले में, उन्होंने बड़ी अदभुत तरकीबें निकाल ली थीं। अगर उन्हें आप एक जेल में भी बंद कर दें, तो उनके स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं पड़ेगा। क्योंकि वे पंद्रह मिनट विश्राम करके और योग कर लेंगे।
इसको करके देखें। जो नहीं जा सकते हैं, नहीं जाने की स्थितियों में हैं। (चेतना विकास मिशन)





