डॉ. विकास मानव
पेड़-पौधे और मनुष्य के समान संस्कृति भी जैव नियमों के अधीन हैं जैसे जैविक चीजें बढ़कर बड़ी होती हैं और फिर उनका विनाश हो जाता है, उसी प्रकार, संस्कृति भी पेड़-पौधे और मनुष्य के समान बढ़ती है और बढ़कर उन्हीं के समान एक दिन नाश को प्राप्त हो जाती है।
बचपन, जवानी, प्रौढ़ता और बुढ़ापा की चार अवस्थाओं से होकर संस्कृति को भी गुजरना पड़ता है। प्रत्येक संस्कृति का इतिहास इन्हीं चार अंकों का नाटक होता है।
संस्कृति का आविर्भाव बसन्त ऋतु में होता है, जब समाज में प्रधानता कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की होती है। यह काल बर्बर शक्तियों का काल होता है, उच्छल प्रवृत्तियों का समय होता है। इस समय संस्कृति के भीतर नफासत कम, ताकत (पॉवर, फोर्स, शक्ति) ज्यादा होती है।
संस्कृति का ग्रीष्म-काल तब आरम्भ होता है, जब नगर बसने लगते हैं, मगर, तब तक महानगर उद्भूत नहीं हुए होते हैं और नगरों पर भी प्रभाव ग्रामीण जीवन का ही रहता है।
संस्कृति की शरद ऋतु तब आती है, जब राज्य की केन्द्रीय सत्ता मजबूत होने लगती है, नगरों के बीच से महानगर उत्पन्न होने लगते हैं, वाणिज्य का महत्व बढ़ता है, कलाएं उर्वर और बुद्धि आलोचनात्मक होने लगती है तथा बुद्धिवाद नास्तिकता और क्रान्ति के बीज बोने लगता है।
शरद के बाद जब शीत ऋतु आती है, प्राचीन परम्परा, धर्म और श्रद्धा का विघटन आरंभ हो जाता है तथा नैतिकता के ढांचे टूट जाते हैं एवं पुराने रस्म-रिवाज और मूल्य हवा में उड़ जाते हैं।
प्रत्येक संस्कृति इन चार अवस्थाओं से गुजरकर, अन्त में, मृत्यु को प्राप्त हो जाती है।
उदाहरणार्थ :
भारत में वैदिक काल वसन्त ऋतु,
मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों के आविर्भाव-काल को ग्रीष्म,
बुद्ध के जन्म-काल एवं सूत्र, वेदान्त और योग के समय शरद, बौद्धमत के प्राधान्य वाले काल शीत ऋतु।
बौद्धमत समाजवादी विचारधारा का भारतीय संस्करण था। जब अशोक ने बौद्ध मत को स्वीकार किया, हिन्दू-संस्कृति की उद्दामता समाप्त हो गई और संस्कृति के एक युग का अन्त हो गया।
संस्कृति का विकास उसकी आध्यात्मिक शक्ति (स्पिरिचुअल फोर्स) के कारण होता है। जब संस्कृति अपने पूर्ण विकास पर पहुंचती है, उसकी आध्यात्मिक प्रगति का सिलसिला खत्म हो जाता है। उसके बाद वह जमने लगती है और जमते-जमते बर्फ हो जाती है। फिर वह पिघलती नहीं, उसके भीतर से विस्फोट होता है और आन्तरिक विकास को छोड़कर वह बाहर की ओर फैलने लगती है।
प्रत्येक संस्कृति का पर्यवसान सभ्यता में होता है। संस्कृति जीवन की धारा है, सभ्यता मृत्यु का घाट है। संस्कृति कृषि-संस्कार से जन्म लेती है और उसी से वृद्धि भी पाती है। सभ्यता महानगरों के संस्कार को कहते हैं। जब महानगर बनते हैं, आदमी चालाक ज्यादा, ईमानदार कम हो जाता है।
प्रत्येक संस्कृति पुष्ट होने पर अपने अनुरूप सभ्यता को जन्म देती है, क्योंकि प्रत्येक संस्कृति पूर्ण विकास पर पहुंचकर मरने लगती है। जब उसकी आंतरिक शक्ति चुक जाती है, संस्कृति भीतरी दुनिया को छोड़कर बाहर की ओर फैलने लगती है। संस्कृति का यही बाहरी फैलाव सभ्यता कहलाता है।
जब संस्कृति मरने लगती है, पवित्रता अपना गठबंधन नास्तिकता के साथ कर लेती है। ऊपरी तबकों के लोग नास्तिक हो जाते हैं और निचले तबके के लोगों में आस्तिकता पहले से भी अधिक हास्यास्पद रूप लेने लगती है।
संस्कृति के ऋतुराज(बसन्त ऋतु) में दर्शन धर्म के साथ रहता है। ग्रीष्म के आने पर वह धर्म से छिन्न हो जाता है।
वसन्त ऋतु में दर्शन धर्म की व्याख्या करता है। जाड़े के मौसम में वह धर्म को नष्ट कर डालता है।





