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*राजनीति में कुनबावाद,देश के लिए अभिशाप*

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विरासत में राजनीति: वरदान या अभिशाप….?

ओमप्रकाश मेहता

tonहमारे आजाद भारत में राजनीति एक ऐसा व्यवसाय बन गया है, जिसमें न तो किसी शैक्षणिक योग्यता की बाध्यता और न किसी अन्य दक्षता की जरूरत और शायद इसी व्यवसाय के कारण ‘रंग लगे न फिटकरी, रूप चैखा हाये’ कहावत का जन्म हुआ है और जबसे राजनीति विरासत की वस्तु बनी है, तबसे तो इस व्यवसाय में दिन दूनी रात चैगुनी वृद्धि हुई है। आज सैकड़ों ऐसे राजनेता है जिन्हें विरासत में राजनीति मिली है, हम दूर कहां जाऐं? हमारे प्रदेश की ही इस संदर्भ में चर्चा करें तो मध्यप्रदेश में आज 270 जनप्रतिनिधि है, जिनमें से 57 जनप्रतिनिधियों को विरासत में राजनीति हासिल हुई है, अर्थात् हमारे प्रदेश के हर चैथे सांसद-विधायक की जड़े परिवारवाद से जुड़ी हुई है, वे इस विरासत पर ऐश कर रहे हैं।वैसे यदि इस मामले में हम अपने आपको राष्ट्रीय स्तर पर परखें तो हम अपने आपको छठवें क्रम पर पाते है, पहले क्रम पर उत्तरप्रदेश है, जहां 604 सांसद-विधायकों में से 141 अर्थात् 23 प्रतिशत वंशवाद से जुड़े, इसके बाद दूसरे क्रम पर महाराष्ट्र है, जहां के 403 जनप्रतिनिधियों में 129 अर्थात् 32 फीसदी वंशवाद से सम्बंध रखते है, तीसरें क्रम पर बिहार जहां 360 जनप्रतिनिधियों में से 96 अर्थात् 27 फीसदी, पांचवें क्रम पर कर्नाटक जहां 326 जनप्रतिनिधियों मंे से 94 अर्थात् 29 प्रतिशत और इसके बाद आंध्रप्रदेश जहां 255 जनप्रतिनिधियों में से 86 अर्थात् 34 फीसदी और छठवें क्रम पर हमारा मध्यप्रदेश है जहां 270 जनप्रतिनिधियों में से 57 वंशवादी है जो कुल का 21 फीसदी है, यह हमारे देश की वंशवादी राजनीति की तस्वीर है और यदि प्रमुख चेहरों की बात करें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, उमंग सिंधार तथा प्रदेश भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवार इनमें शामिल है। ये तो कुछ जाने-माने प्रमुख चेहरे है, वैसे कुल मिलाकर इनके अलावा दो दर्जन से अधिक ऐसे राजनेता या जनप्रतिनिधि है, जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है और व अब अपनी अगली पीढ़ी को भी इस वंश परम्परा के लिए तैयार कर रहे है। ये दो दर्जन नेता सांसद या विधानसभा के सदस्य है।यह कथन कपोलकल्पित नही बल्कि एडीआर की ताजा रिपोर्ट का हिस्सा है, यह रिपोर्ट प्रदेश के 29 लोकसभा तथा 11 राज्यसभा के सांसदों व 230 विधानसभा सदस्यों पर आधारित है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मध्यप्रदेश के 21 फीसदी नेता परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने में जुटे है। एडीआर (एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफार्म) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि देश में लोकसभा-राज्यसभा और विधानसभाओं में कुल 5204 सांसद-विधायक है, इनमें से 1107 यानी लगभग 21 प्रतिशत ऐसे है जिनका राजनीतिक जुड़ाव वंशवाद से है, रिपोर्ट में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया है कि मौजूदा सांसदों में नौ सांसद ऐसे है, जो परिवार या वंशवाद को हर तरीके से बढ़ावा देने में संलग्न है।इस प्रकार कुल मिलाकर आज की राजनीति भी वंशवाद को आगे बढ़ाने में अग्रणी बनी हुई है और आज ‘जनप्रतिनिधि’ या ‘जनसेवक’ की स्वनिर्मित उपलब्धियां सिर्फ दर्शनीय रह गई है, इनका वास्तव में इनके नाम के अर्थ से कोई सम्बंध नही रह गया है। अब यह वरदान है या अभिशाप? इसका फैसलो पाठकों पर छोड़ता हूँ।

हमारे आजाद भारत में राजनीति एक ऐसा व्यवसाय बन गया है, जिसमें न तो किसी शैक्षणिक योग्यता की बाध्यता और न किसी अन्य दक्षता की जरूरत और शायद इसी व्यवसाय के कारण ‘रंग लगे न फिटकरी, रूप चैखा हाये’ कहावत का जन्म हुआ है और जबसे राजनीति विरासत की वस्तु बनी है, तबसे तो इस व्यवसाय में दिन दूनी रात चैगुनी वृद्धि हुई है। आज सैकड़ों ऐसे राजनेता है जिन्हें विरासत में राजनीति मिली है, हम दूर कहां जाऐं? हमारे प्रदेश की ही इस संदर्भ में चर्चा करें तो मध्यप्रदेश में आज 270 जनप्रतिनिधि है, जिनमें से 57 जनप्रतिनिधियों को विरासत में राजनीति हासिल हुई है, अर्थात् हमारे प्रदेश के हर चैथे सांसद-विधायक की जड़े परिवारवाद से जुड़ी हुई है, वे इस विरासत पर ऐश कर रहे हैं। वैसे यदि इस मामले में हम अपने आपको राष्ट्रीय स्तर पर परखें तो हम अपने आपको छठवें क्रम पर पाते है, पहले क्रम पर उत्तरप्रदेश है, जहां 604 सांसद-विधायकों में से 141 अर्थात् 23 प्रतिशत वंशवाद से जुड़े, इसके बाद दूसरे क्रम पर महाराष्ट्र है, जहां के 403 जनप्रतिनिधियों में 129 अर्थात् 32 फीसदी वंशवाद से सम्बंध रखते है, तीसरें क्रम पर बिहार जहां 360 जनप्रतिनिधियों में से 96 अर्थात् 27 फीसदी, पांचवें क्रम पर कर्नाटक जहां 326 जनप्रतिनिधियों मंे से 94 अर्थात् 29 प्रतिशत और इसके बाद आंध्रप्रदेश जहां 255 जनप्रतिनिधियों में से 86 अर्थात् 34 फीसदी और छठवें क्रम पर हमारा मध्यप्रदेश है जहां 270 जनप्रतिनिधियों में से 57 वंशवादी है जो कुल का 21 फीसदी है, यह हमारे देश की वंशवादी राजनीति की तस्वीर है और यदि प्रमुख चेहरों की बात करें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, उमंग सिंधार तथा प्रदेश भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवार इनमें शामिल है। ये तो कुछ जाने-माने प्रमुख चेहरे है, वैसे कुल मिलाकर इनके अलावा दो दर्जन से अधिक ऐसे राजनेता या जनप्रतिनिधि है, जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है और व अब अपनी अगली पीढ़ी को भी इस वंश परम्परा के लिए तैयार कर रहे है। ये दो दर्जन नेता सांसद या विधानसभा के सदस्य है। यह कथन कपोलकल्पित नही बल्कि एडीआर की ताजा रिपोर्ट का हिस्सा है, यह रिपोर्ट प्रदेश के 29 लोकसभा तथा 11 राज्यसभा के सांसदों व 230 विधानसभा सदस्यों पर आधारित है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मध्यप्रदेश के 21 फीसदी नेता परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने में जुटे है। एडीआर (एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफार्म) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि देश में लोकसभा-राज्यसभा और विधानसभाओं में कुल 5204 सांसद-विधायक है, इनमें से 1107 यानी लगभग 21 प्रतिशत ऐसे है जिनका राजनीतिक जुड़ाव वंशवाद से है, रिपोर्ट में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया है कि मौजूदा सांसदों में नौ सांसद ऐसे है, जो परिवार या वंशवाद को हर तरीके से बढ़ावा देने में संलग्न है। इस प्रकार कुल मिलाकर आज की राजनीति भी वंशवाद को आगे बढ़ाने में अग्रणी बनी हुई है और आज ‘जनप्रतिनिधि’ या ‘जनसेवक’ की स्वनिर्मित उपलब्धियां सिर्फ दर्शनीय रह गई है, इनका वास्तव में इनके नाम के अर्थ से कोई सम्बंध नही रह गया है। अब यह वरदान है या अभिशाप? इसका फैसलो पाठकों पर छोड़ता हूँ।

Ramswaroop Mantri

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