मुनेश त्यागी
वैसे तो मोदी सरकार देश के विकास को लेकर नित नए आंकड़े पेश करती रहती है। अभी पिछले दिनों खबर आई की भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। मगर इन आंकड़ों के खिलाफ, हम आए दिन सुनते रहते हैं कि हमारे देश में पिछले 5 सालों में 28 करोड़ गरीब और पैदा हो गए हैं। अब देश में गरीबो की संख्या एक अरब 8 करोड़ हो गई है। 4 करोड़ से ज्यादा लोगों की नौकरियां चली गई है, किसान और मजदूरों की आय लगातार घट रही है।
अभी नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में, आत्महत्या करने वालों में एक चौथाई दैनिक वेतन भोगी हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट कहती है की 2021 में कुल 1 लाख 60 हजार लोगों ने आत्महत्या की है, जिनमें से 42,004 दैनिक वेतन भोगी है और इस प्रकार यह आंकड़ा जो 2014 में 12 परसेंट था, वह 2021 में बढ़कर 25% हो गया है। और यह आंकड़ा ग्रहणियों में 14 परसेंट, स्वरोजगार करने वालों में 12 परसेंट और अल्प आय वालों वाले कर्मचारियों में लगभग 10 दस परसेंट आत्महत्या करते हैं। यहीं पर सवाल उठता है कि एक तरफ सरकार तेज विकास दर की बात कर रही है वहीं दूसरी ओर किसानों, मजदूरों और दैनिक भोगी कर्मियों की जिंदगी में महामंदी के तूफान आए हुए हैं। आखिर क्या कारण हैं?
आज हालत यह है कि जहां इस महामारी से पहले एक दैनिक वेतन मजदूर प्रतिदिन 400 से लेकर ₹500 तक कमा लेता था और उसे महीने में 20 दिन काम मिल जाता था, मगर वर्तमान समय में उसे महीने में केवल बस 12 दिन काम मिलता है और उसका दैनिक वेतन भी घट गया है। जो लगभग ढाई सौ से ₹300 तक आ गया है। दैनिक वेतन मजदूरों का कहना है कि उन्हें दाल और सब्जी खाए हुए महीनों महीनों बीत गए हैं, उनका परिवार केवल रुखे चावल व रोटी और मिर्च खाकर ही काम चला रहा है।
कई बार तो बच्चों को भूखे पेट ही सोना पड़ता है और कई बार भूखे पेट ही रात गुजारनी पड़ती है। कई दैनिक वेतन कर्मियों का यह भी कहना है कि उन्हें कई बार सड़क के किनारे से पड़ी हुई रोटी और सब्जी उठा कर अपना काम चलाना पड़ता है। इनमें कई सारे लोग देश के विभिन्न भागों से शहरों में आए हैं मगर शहरों में निर्माण कार्य और दूसरी सेवाएं लगभग बंद हो गई है जिस कारण बहुत सारे लोगों को काम नहीं मिल रहा है अगर काम मिल भी रहा है तो उनकी तनख्वाह घट गई है।
हालत यहां तक खराब हैं कि मजदूर मंडी में जाओ तो वहां एक मजदूर की जरूरत होने पर 20-30 मजदूरों की का झुंड इकट्ठा हो जाता है जिस कारण काम करवाने वाला, मजदूरों को कम तनख्वाह देता है, क्योंकि उनके पास अपनी जिंदगी गुजारा करने के लिए, अपने मां बाप का पेट भरने के लिए कोई जरिया नहीं है, वे अपने परिवार को बीमारियों से बचाने की स्थिति में नहीं हैं कई मजदूरों को इन गरीब हालात के चलते अपने बच्चों का स्कूल भी छुड़वाने को मजबूर होना पड़ा है। इन हालात के चलते वे 200-300 रुपए में काम करने को मजबूर हो जाते हैं।
महामारी के चलते काम की कमी हो गई है, तनख्वाह गिर रही है, ऋण ग्रस्तता बढ़ रही है और सबके ऊपर बढ़ती महंगाई ने कमर तोड़ दी है। इन्हीं सब कारणों की वजह से दैनिक वेतन कर्मचारियों की हालत खराब होती जा रही है और उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि लगभग ज्यादातर शहरों का यही हाल है।
अतः यहां पर बहुत जरूरी हो गया है कि सरकारें आसमान बिना छुए, हवाई बातें ना करें, जमीन पर जो कुछ हो रहा है, उसको देखें और उस पर विचार विमर्श करें और दुगनी गति से बढ़ रही आत्महत्याओं की संख्या को घटाने के लिए जिम्मेदार होकर और संजीदा होकर कार्य करें।
अब यह सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है कि सरकार को शहरों में दैनिक भोगी कर्मचारियों को, इस आत्महत्या की महामारी से बचाने के लिए, शहरी रोजगार गारंटी योजना शुरू करनी पड़ेगी ताकि दैनिक भोगी कर्मचारियों को आत्महत्या की सुनामी से बचाया जा सके।





