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सवर्णों की तरह दूरगामी राजनीति करें दलित-बहुजन

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[दलित साहित्य अब अनेक स्तरों पर मुख्यधारा के साहित्य के साथ मुठभेड़ कर रहा है। समालोचना के क्षेत्र में भी अनेक आवाजें इसके भीतर से भी उठी हैं और विमर्श का विस्तार हुआ है। यहां तक कि दलित साहित्य के नामकरण पर भी विचार किया जा रहा है। साथ ही, देश में मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में दलित साहित्य की दिशा कैसी हो, इन बातों को लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राजेश पासवान से फारवर्ड प्रेस ने खास बातचीत की।

दलित साहित्य के नामकरण को लेकर भी एक बहस चल निकली है। आपकी राय क्या है?

देखिए, यह सही है कि दलित चेतना के सबसे बड़े पथ प्रदर्शक डॉ. आंबेडकर हैं। इसमें कोई दो राय नहीं। बाकी अन्य भी हैं। जैसे कि संत रैदास हैं, संत कबीर दास हैं, जोतीराव फुले हैं। लेकिन दलितों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण डॉ. आंबेडकर हैं क्योंकि उन्होंने दलित समाज को आधुनिक सोच दी और एक तरह से भारत के आधुनिक समाज के निर्माण की उनकी जो संकल्पना थी, वह दलित समाज के लिए आदर्श के रूप में है। इसके अलावा भी डॉ. आंबेडकर ने व्यापक रूप से अन्य समाजों के अनुशासनों पर लिखा है। हालांकि साहित्य के बारे में और साहित्य के जो अपने निकस हैं, इसके बारे में उन्होंने बहुत अधिक नहीं लिखा है। लेकिन उनका जो दर्शन था कि जो समाज में हाशिए के लोग हैं, उन्हें भी वे सारे मानवीय अधिकार मिलने चाहिए, जो अन्य को मिल रहे हैं। दलित साहित्य ने उनके समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व आदि सूत्रवाक्यों को लेकर अपने निकस और प्रतिमान बनाए हैं। तो आंबेडकरवादी साहित्य कहना गैर-वाजिब नहीं है। 

मुझे लगता है कि दलित साहित्य भी बेहतर है। यह इसलिए भी कि डॉ. आंबेडकर की सबसे बड़ी खासियत यह भी थी कि अपने समय की वास्तविकताओं को तत्कालीन विडंबनाओं के साथ उन्होंने स्वीकार किया। साथ ही, उन्हें बेहतर बनाने के तरीके भी इजाद किए। दलित साहित्य की एक खासियत यह भी है कि यह अपने समाज की कड़वी सच्चाईयों को स्वीकार करता है। मुख्यधारा के समाज में जिस अछूत समाज की चेतना के प्रति पूर्वाग्रह फैला हुआ था, डॉ. आंबेडकर ने उन्हें स्वीकार करते हुए एक नया मानदंड स्थापित किया। इस मानदंड का नाम था– दलित। 

दलित शब्द को लेकर बहुत सारे लोग अक्सर कहते हैं कि दलित मत कहिए। दलित का मतलब है कि दबाया या कुचला हुआ। जो भी हो, लेकिन यदि एक और चीज कह सकते हैं, जिसे हम हिंदू समाज की कमजोरी कह सकते हैं कि जब इस धर्म या जाति के लोग किसी और दूसरे धर्म अथवा जाति के बारे में कुछ कहते हैं तो इससे उनको कोई दिक्कत नहीं होती है। लेकिन यदि दूसरा कोई कुछ कहता है तो उसे दिक्कत होती ही है। वह जिसे कहता है। अभी तक जो भी शूद्र, अछूत, चमार आदि कहे गए सारे शब्द मुख्यधारा ने ही नाम दिया था। उसमें कभी किसी को दिक्कत नहीं हुई। लेकिन जब दलितों ने खुद ही अपने साहित्य को दलित साहित्य कहना शुरू किया या दलितों ने खुद ही कहना शुरू किया कि गर्व से कहो हम दलित हैं, तब उस विचारधारा के लोगों को दिक्कत होने लगी। हमलोगों के साथ इस तरीके की घटनाएं होती हैं कि कहीं बातचीत होती है, जब हमलोग अपनी पहचान के संबंध में मजबूती से अपनी बात कहते हैं तब लोग कहते हैं कि यह ठीक नहीं है। लेकिन हमसब लोगों को इसके अलावा भी बात करनी चाहिए। मुझे लगता है कि सच को स्वीकार करना बहुत जरूरी है और जो दलित वेदना है, दलित पीड़ा है, यह एक कड़वी सच्चाई रही है समाज की, इस बारे में व्यापक विचार विमर्श करके ही इसके बारे में जो पूर्वाग्रह हैं, उनको दूर किया जा सकता है। उसको कम किया जा सकता है। अगर हम इसको छोड़ देंगे तो फिर ये चीजें नहीं रहेंगीं। 

प्रो. राजेश पासवान, जेएनयू, नई दिल्ली

कुछ लोग दलित साहित्य को आंबेडकरवादी साहित्य भी कहते हैं। लेकिन जब दलित साहित्य प्रचलन में आ गया है तब इसे चलाए रखना चाहिए। अलग से कोई नाम देने की जरूरत मुझे नहीं लगती। दलित साहित्य अपने आप में पर्याप्त है। 

मौजूदा सियासती दौर में आप दलित राजनीति और दलित साहित्य को किधर जाता देख पा रहे हैं?

इस संबंध में एक चीज मैं और कहना चाहूंगा। राम स्वरूप चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ में लिखा कि मनुस्मृति जब लिखी गई तो उसमें डॉ. आंबेडकर के समाज के लिए कोई जगह नहीं थी। लेकिन जब डॉ. आंबेडकर ने संविधान की संकल्पना की उसमें मनु के वंशजों के लिए भी जगह दी। कहने का अर्थ यह है कि दलित संवेदना में समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की भावना निहित है। मैं कई बार कहता हूं कि जब किसी दलित चेतना संपन्न व्यक्ति को कोई निर्णय लेने का मौका मिलता है तो वह उनका भी ख्याल रखता है जो समाज के हाशिए के लोग हैं, और उनका भी ख्याल रखता है, जो समाज के दूसरे वर्गों के लोग हैं। डॉ. आंबेडकर के भी चिंतन को देखें तो उन्होंने कड़वे अनुभवों के बावजूद समाज के किसी वर्ण-जाति के प्रति दुर्भावना नीति निर्धारण में नहीं रखी। उन्होंने वर्णाश्रम व्यवस्था की आलोचना की। 

तो मुझे लगता है कि डॉ. आंबेडकर की चेतना से संपन्न जो दलित हैं, उनको किसी के प्रति भी भेदभाव नहीं करना चाहिए, क्योंकि उस भेदभाव का शिकार होकर खुद आए हुए हैं। वे उस दर्द को महसूस करते हैं। इसी वजह से समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व वाली ये तीन सूत्र वाक्य हैं, जो दलित चिंतन में हैं और दलित साहित्य में हैं। दलित साहित्य इसे अपना उत्स मानता है। मुझे लगता है कि दलित साहित्य के ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि इसका निर्वहन करे। हालांकि निर्वहन में चीजें कम दिखती हैं। समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व की भावना हमारे दलित साहित्यकारों में भी कम है।अगर ऐसा नहीं होता तो दलित समाज के नाम पर, दलित साहित्य के नाम पर इतने सारे संगठन क्यों बने हुए हैं? यह जब आप ऐसा करते हैं तो आप उस महामानव की विचारधारा के खिलाफ जाते हैं, जो समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की बात करता है। बंधुत्व यदि आप में हैं तो उसका निर्वहन कीजिए, क्योंकि सब लोग उसी तरीके बात कर रहे हैं। यदि नहीं कर रहे हैं तो आप उस महामानव के खिलाफ जा रहे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। दलित साहित्यकारों को ही नहीं, समाज के दूसरे लोग हैं, उन सबको भी इस पर सोचना चाहिए। 

जहां तक राजनीति का सवाल है तो मैं कहूंगा कि आज राजनीति में एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ रही है। यदि आप के पास बहुमत अधिक है तो आप किसी दूसरे की नहीं सुनेंगे। उसका मजाक उड़ाएंगे और उसको अपना दुश्मन साबित करेंगे। डॉ. आंबेडकर के ही हवाले से हम कहें तो जब संविधान की नवीं अनुसूची में जिन 22 भाषाओं को जगह देने की बात हुई तो डॉ. आंबेडकर ने कहा कि ऐसा नहीं कि जो अधिक बोलने वाले भाषाओं के लोग हैं वो कम बोली जानेवाली भाषाओं के लोगों पर अपना आधिपत्य जमा लें। इस वजह से नवीं अनुसूची में ऐसी भाषाओं को भी जगह मिली, जिनके बोलनेवालों की संख्या कम है। यह डॉ. आंबेडकर का नजरिया था। अभी विपक्ष के प्रति सत्ताधारी दल में वितृष्णा का जो भाव है, लोकतंत्र के लिए घातक है। इस खतरे को मैं देख रहा हूं। दूसरी एक और बात मैं कहना चाहूंगा कि वर्तमान में जो शासक वर्ग है अपने अंतर्विरोधों को दबा कर दूरगामी लाभ की राजनीति करता है। लेकिन हाशिए की राजनीति करने वाले जो लोग हैं या सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले, बहुजन राजनीति करने वाले जो लोग हैं, वे अपने व्यक्तिगत और तात्कालिक अंतर्विरोध को ही स्थाई अंतर्विरोध बना लेते हैं तथा छोटी-छोटी बातों पर भी अपनी इगो के साथ समझौता नहीं करते हैं। इसका खामियाजा उन्हें सत्ता से बाहर रह कर चुकाना पड़ता है। मैं अक्सर मजाक में कहता हूं कि अधिकांश दलित नेता चुनाव से पहले अपने को मुख्यमंत्री ही समझते हैं और चुनाव बाद वे विधायक बनने लायक भी नहीं रह जाते। यह जो अदूरदर्शिता है, उनके लिए घातक है। शासन में तो वही लोग रहेंगे जो एकजुट रहेंगे। और मुझे लगता है कि यह देश के लिए बड़ा खतरा है। कुछेक ऐसे समाजों के लिए जो 1950 के बाद जिनमें विकास की लक्षण दिखने शुरू हुए, पढ़ने-लिखने वाले लोग आए, जिनकी स्थितियां अच्छी हुईं, अब उनके लिए और खतरा है। वे अगर एकजुट न रहे तो फिर से उसी गर्त में चले जाएंगे। आज हम फिर से उसी दौर में जा रहे हैं जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और संपत्ति पर कुछ खास लोगों का ही वर्चस्व बनता जा रहा है। खास लोग ही पावरफुल हैं, खास लोग ही शिक्षा ले सकते हैं। अभी जिस तरह से विश्वविद्यालयों की शिक्षा महंगी हो रही है, जिस तरह से सरकारी शिक्षण संस्थानों को प्राइवेट संस्थानों की अपेक्षा कमजोर किया जा रहा है, तो आने वाला भविष्य अंधकारमय है और मुझे लगता है कि जो भी हाशिए के लोग हैं, उनको सोचना-समझना चाहिए। यदि वे ऐसा कर पाए तो सही अर्थों में दलित-बहुजन की राजनीति करनेवाले, सामाजिक न्याय की राजनीति करनेवाले राज कर पाएंगे तथा लक्ष्यों को हासिल कर पाएंगे। इसके लिए उन्हें एकजुट होना पड़ेगा, अपने व्यक्तिगत अहम और व्यक्तिगत मनोकामनाओं पर अंकुश लगाना होगा, क्योंकि यदि आप जिनसे लड़ रहे हैं, उनकी खासियत से नहीं सीखते हैं तो आप फिर उससे जीत नहीं पाएंगे। अपने अंतर्विरोधों के साथ उनका मुकाबला मुश्किल है। 

Ramswaroop Mantri

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