–सुसंस्कृति परिहार
शिव जी का डमरु तो आदिकाल की बात हो गई।तीसरा नेत्र भी कहीं कभी नहीं खुला। प्रलयंकर शंकर का तांडव भी आज नाट्य मंडली तक सीमित है।
लेकिन डमरु बजा है सोमनाथ में रोड शो के दौरान। आश्चर्यजनक यह है वह डमरु शिव ने नहीं बल्कि कथित महामानव ने बजाया है। कुछ लोग इसे मदारी का डमरु कह रहे हैं जो जनता ने सैंकड़ो साल से मदारी के हाथों में देखा है। तो क्या यह मदारी का डमरु ही कहना ठीक होगा। वास्तविकता तो यही है गुजरात चुनाव के मद्देनजर इस बार फिर गुजरात के मतदाताओं को मदारी नचाने आया है।जी हां इस बार डमरु से फिर वैमनस्यता के स्वर निकले हैं इस काम में NSA के अजीत डोभाल भी तल्लीन होकर लग गए हैं।
अयोध्या के बाद अब सोमनाथ को ले आए हैं। शौर्य यात्रा , स्वाभिमान यात्रा निकाल कर गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं।पूरे सौ साल पहले महमूद गजनवी ने इसे लूटा था। क्योंकि इसमें तकरीबन 6टन सोना लगा था। जिसे प्राप्त करने उसे इसे तोड़ना पड़ा। ठीक वैसे ही जैसे वर्तमान सरकार ने केदारनाथ मंदिर को लुटवाया उसके कायाकल्प के बहाने। वहां दीवालों पर मौजूद सभी सोने की प्लेटे निकालकर सोने की पालिश वाली पीतल की प्लेटें लगा दी गई। ये कौन मुसलमान थे अरे कोई तो बताए।
सोमनाथ में उसके बाद इसे कई बार लूटा गया क्योंकि यहां उस दौरान सबसे ज्यादा चढ़ावा मिलता था।जो भी शासक रहा उसने लूटा। गजनवी तो लूट के वापस अपने देश चला गया। मुगलकाल के बाद जब अंग्रेजों का शासन आया तब भी उनके अधीनस्थ कार्यरत हुक्मरानों ने भी इसे लूटा।इतना विशाल प्रसिद्ध शिवमंदिर जिसमें हज़ारों भक्तगण मौजूद रहते हैं किसी ने भी इन आततायियों से मंदिर की रक्षा नहीं की, वे सोमनाथ भगवान के सहारे बैठे रहे और शिव खुद अपने को क्षत विक्षत करवाते रहे। कोई चमत्कार नहीं दिखा पाए।
चमत्कार तो आज़ादी मिलने के बाद हुआ।जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मन्दिर निर्माण का प्रस्ताव रखा कि सरकार अपने खजाने से इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराए। उस वक्त नेहरू जी ने संविधान का ब्यौरा देते हुए इसे गलत बताया था। क्योंकि संविधान के तहत किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या अन्य किसी धार्मिक संस्थान को सरकार आर्थिक मदद नहीं कर सकती।यह ट्रस्ट की जिम्मेदारी होती है।तब राजेन्द्र जी ने सोमनाथ ट्रस्ट को जनता से मदद की अपील की। तब जो आर्थिक सहायता मिली उससे उसका कायाकल्प हुआ। उसके बाद मंदिर पूरी सलामत है अंदरुनी लूट का पता नहीं।
अब ऐसी स्थिति में शौर्य यात्रा निकालना खुद अपना मज़ाक उड़ाना है सोचिए मंदिर को लुटने हमारे पूर्वजों ने दिया और इल्ज़ाम यहां रह रहे मुस्लिमों पर लगाया जा रहा है।अगर शौर्य यात्रा निकालनी थी तो कांग्रेस सरकार की निकालनी चाहिए जिसने सत्तर सालों तक सोमनाथ मंदिर को सुरक्षित रखा और पर्यटन के नक्शे पर विशेष स्थान दिया।
कुल मिलाकर सचाई ये है कि चुनावी मुद्दा ढ़ूढने में विफल सरकार जबरिया डमरु बजाकर अपना मजमा जमाने की कोशिश में तल्लीन है गुजरात में भाजपा की हालत बिगड़ी हुई है इसलिए शिव भक्तों को सोम रस पिलाकर उत्तेजित किया जा रहा है ताकि वे साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ाएं तथा हिंदू अपनी एकजुटता मजबूत करें।मदारी को यह समझ लेना चाहिए कि गुजरात अब बदल चुका है।उसने आपके वादों और काम को खूब परख लिया है।वह इनका मकसद भली-भांति समझ चुकी है।भक्त कितनी ही ताली थाली बजा लें अब महामानव को बर्दाश्त नहीं करने वाली गुजरात की जनता। उसमें में सदियों पुराना सद्भाव फिर दिखने लगा है। महात्मा गांधी और सरदार पटेल की ये जन्मभूमि मदारी की लूट से इतनी अधिक परेशान हैं कि वह अब डमरु की धुन पर नाचने वाली नहीं रही।उनकी शौर्य यात्रा में थामे गए डमरु बजाकर वास्तव में सोमनाथ जी का अपमान करते हुए वोट की लूट का इंतजाम करने में लगे हैं । किंतु यह तय हो चुका है मदारी का डमरु वादन पूरी तरह यहां फ्लाप हो चुका है। लंबे अंतराल से झांसे में आई जनता ने अब अपने नेत्र खोल लिए और अब वे सब भोले की नगरी में तांडव के तैयार हो रहे हैं।





