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*सुप्त हो गई संवेदनाएं?*

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी प्रख्यात कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान रचित कविता पढ़ रहें हैं।
कविता के महत्व को समझाते हुए सीतारामजी ने कहा,
इस कवियत्री ने कविता में वीरांगना झांसी की रानी की गौरव गाथा वर्णित की है।
यह गौरव गाथा इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
आज का वर्तमान बीते कल का इतिहास है।
दुर्भाग्य से आज देश की वीरांगनाएं अपनी अस्मिता के साथ हुए अभ्रद्रता का विरोध करने के लिए धरने पर बैठी हैं।
देश के तमाम जागरूक लोग इन वीरांगनाओं का समर्थन कर रहें हैं।
आश्चर्य होता है,वे स्त्रियां कैसे नदारत हैं,जो स्त्रियां,स्त्री के शृंगार के प्रतीक गहना मतलब चूड़ियों को मानवीय कमजोरी की संज्ञा देते हुए तात्कालिक सत्ता में विराजित प्रमुख को भेजने की गुस्ताखी(बे अदबी, अशिष्टता)
करती थी।
क्या ये महिलाएं स्त्री ही स्त्री की शत्रु होती है,इस उक्ति को चरितार्थ कर रही हैं?
सीतारामजी ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा,संभवतः रिक्त गैस सिलेंडर उठाकर नाचने की क्षमता इन स्त्रियों में थी।
आज देश की गौरव बढ़ाने वाली युवतियां के साथ हुई अभद्रता के समय इन स्त्रियों की संवेदनाएं सुप्त हो गई हैं?
पहले स्त्रियों के यौन शौषण की घटनाओं पर यहीं स्त्रियां केंडल मार्च निकालती थी,आज इनके केंडल की लौ के साथ ये स्वयं भी गुमशुदा की तलाश हो गई हैं।
कारण भी कोई काम महत्व पूर्ण नहीं है,युवतियों के जिस व्यक्ति पर आरोप है वह इन्ही की बिरादरी का है और धन और बाहुबली भी है। साथ ही वरिष्ठों के साथ इसके नजदीक के रिश्ते भी तो हैं?
इस लोगों के लिए शायर सुखबीर सिंह “शाद” का ये शेर मौजू है।
समंदर तेरी खामोशियां कुछ और कहती है
मगर साहिल पर टूटी कश्तियां कुछ और कहती है
अंत में उपर्युक्त संदर्भ में शायर सुखबीर सिंह “शाद” का ही यह शेर एकदम सटीक है।
ये सच है चंद लहमो के लिए बिस्मिल(बलि का पशु) तड़पता है
फिर उसके बाद सारी जिंदगी कातिल तड़पता है

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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