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*मृत्यु-पुनर्जन्म, पितृ-पक्ष, भूत-प्रेत*

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     ~पवन कुमार ‘ज्योतिषाचार्य’

   मोक्ष पाने वालों को अपवाद मान लें तो मृत्यु के बाद पुनर्जन्म की बात न केवल वैदिक दर्शन सम्मत है, वरन आज विज्ञान सम्मत भी है. तो पितृपक्ष क्या बकवास है? भूत-प्रेत का क्या लफड़ा है? ऐसे प्रश्न उठने अस्वाभाविक नहीं है.

 मृत्यु के बाद किए जाने वाले श्राद्ध,  तर्पण, पिंडदान को ब्राह्मणों का ढोंग-ढकोसला माना जाने लगा है. ब्रह्मणो ने इसे ढकोसला बना भी रखा है. मूल रूप में यह टोटली ढकोसला नहीं है.

    जो अपने जीवन काल में परहित नहीं करते, पवित्र सात्विक जीवन नहीं जीते, जिनका जीवन सांसारिक वासनाओं में लिप्त और स्वार्थपूर्ण रहता है या वे लोग जिनकी मृत्यु जहर खाने से, फाँसी से, आग से जलने से, किसी दुर्घटना से, या हत्या करने से होती है, या जिनको प्रेम और संभोग में तृप्ति नहीं मिलती प्रेत योनि में चले जाते हैं।

    प्रेतात्मा जीवित व्यक्तियों के शरीर पर कब्ज़ा जमाकर अपनी विषय वासना तृप्ति का प्रयास करतीं है।

     आत्महत्या, हत्या या दुर्घटना में मरे लोगों की प्रेतात्मा आक्रोशित हो प्रतिशोध की भावना से आक्रमण करती है। यही कारण है कि प्रेत बाधा ग्रस्त व्यक्ति का जीवन खतरे में पड़ जाता है। उसका पूरा परिवार तनावग्रस्त होकर उसके उपचार के लिए इधर उधर भटकने लगता है।

     मृत्तात्मा का सबसे अधिक लगाव अपने परिवार से ही होता है। मृत्यु के बाद प्रेतात्मा अपने घर परिवार में ही मंडराती रहती है,पहले की तरह सबसे संपर्क रखना चाहती है।

हमारा शरीर एक घर के समान है। कोई मकान बहुत दिनों से बंद पड़ा हो उसमें कोई नहीं रहता हो तो उस मकान में साँप, बिच्छू, मकड़ी के जाले, कीड़े ,मकोड़े , चमगादड़ इत्यादि रहने लगते हैं।

  इसी प्रकार जिनकी विचार, आचार, आहार, विहार की शैली और दिनचर्या सात्विक, पवित्र नहीं होती उनके ह्रदय में ईश्वरीय चेतना का प्रकाश नहीं होता.

   ऐसे अन्धकारयुक्त , कमजोर जीवात्मा वाले व्यक्ति पर भूत, प्रेत आदि का प्रभाव शीघ्र होता है।

ऐसे में इन खतरों से बचने के लिए पितृपक्ष में दिवंगत आत्माओं की प्रेत योनि से मुक्ति, पित्र योनि में विचरण करने वाले पित्रो को जल तर्पण से जल देने व अपने परिवार की रक्षा हेतु ही श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान का क्रम निर्धारित किया गया है।

*भूत प्रेत की भ्रान्ति :*

      भूत प्रेत के संबंध में समाज में इतनी भ्रांतियां व्याप्त है कि अधिकांश मनोरोगियों को विशेषकर स्त्रियों पर भूत प्रेत का साया मानकर तंत्र-मंत्र किया जाता है। विभिन्न धार्मिक स्थल मजार आदि पर मनोरोगी झूमते हुए, खेलते हुए, पटकी खाते हुए बहुत आसानी से नजर आते हैं।

      बाकायदा मुकदमे की तारीख पड़ती है, पेशी होती है , सवाल जवाब होते हैं और जजमेंट के उद्घोष किए जाते हैं। यह अति है.

    यह सब मात्र बकवास, निराधार के अलावा कुछ नहीं है। ना तो इस प्रकार की नौटंकी करने वाले मौलवी के पास कोई शक्ति होती है और ना मनोरोगी के ऊपर कोई  परकाया का प्रभाव । समाज में इस प्रकार की मान्यताएं जड़ जमाए हुए हैं कि विद्वान से विद्वान व्यक्ति भी इस दृश्य को देखकर खुद को भ्रमित होने से नहीं रोक पाता और कहीं ना कहीं इस प्रकार की बातों को मानने के लिए विवश हो जाता है कि अवश्य ही रोगी पर किसी भूत प्रेत का साया का प्रभाव है।

   रोगी और मौलवियों के साथ इस प्रकार की वार्ता क्यों होती है।  यह कौन है जो रोगी के भीतर से बोलता है, मौलवी से लड़ता है,  गाली -गलौज करता है,  क्यों एक रोगी इस बुरी तरीके से पटकी खाता है कि देखने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

       तंत्र मंत्र की भाषा में रोगी पर इसे भूत प्रेत का साया माना जाता है।  लेकिन आश्चर्यजनक यह लगता है कि रोगी खुद यह मानकर चलता है कि उस पर किसी परकाया ने अपना कब्जा जमा लिया है और इस बात को बल मिलता है, हमारे परंपराओं से और भूत के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए गली-गली में मजार -दरगाहों से जहां का मौलवी रोगी को समझाता है कि तुमको किसी शक्ति ने अपने बस में कर रखा है।

      एक बार मैंने रात्रि के समय प्रयागराज के भूलई के पूरा नामक स्थल पर गया जहां तीन-चार दिनों का मेला लगता है।  वहां पर भूत प्रेत से ग्रसित स्त्रियां रात्रि में भी खेल रहे थे जो कि अधिकांश नवयुवती ही थी। पुरुष नाम मात्र के  थे। वास्तव में देखा कि किसी स्त्री को भूत -प्रेत पकड़े  ही नहीं है।

   अधिकांश मनोरोग के शिकार हैं ।जब वास्तविक रूप से मनोरोगी पर किसी परकाया का प्रवेश होता ही नहीं तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न पैदा होता है कि मनोरोगी इतना भ्रमित कैसे हो जाता है कि वह खुद पर किसी शक्ति का ग्रहण महसूस करता है और उसी प्रकार की हरकतें क्यों करने लगता है? कदाचित किसी विशेष स्थान पर पटकिया खाना, दौड़ना, भागना , मौलवी या किसी अन्य शक्ति से लंबे-लंबे बातें करना और यह दोहराने की मैं इसे नहीं छोडूंगा, इसे मार डालूंगा इत्यादि।

     कुछ को अपवाद मान लें तो जीवन में प्रत्येक व्यक्ति प्रेम का भूखा होता है! प्रेम का अभाव है मनो रोग को जन्म देने का कारण बनता है। समाज में भूत प्रेत का भ्रम फैला कर बहू बेटियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया जाता है।

   देखा गया है कि इस प्रकार के रोगी विवशता वश मौलवी मजार की शरण में जाता है । वहां पर रोगी को समझाया जाता है कि तुम पर वशीकरण हो चुका है। किसी शैतान ने तुम्हें अपने वश में कर लिया है । कोई भूत -प्रेत ,जिन्न, चुड़ैल आदि ने कब्जा जमा लिया है।

    रोगी यह तो महसूस करता है कि मेरी मानसिकता बाधित हो चुकी है । तो कम धैर्य वाले या कहें भूत प्रेत आदि में यकीन करने वाले स्वयं यह मानने को विवश होने लगते हैं कि अवश्य ही मेरे ऊपर वशीकरण हो चुका है।वह उक्त स्थल का वातावरण देखता है ।वहां पहले से उस जैसे मरीज झूम रहे हैं, खेल रहे हैं हूंकार भर रहे हैं, शक्तियों से बातें कर रहे हैं ।इस प्रकार देखा देखी मनोरोगी भी झूमने लगता है।

  मनो रोग की खास बात यह है कि रोगी जिस ऐंगल से सोचता है कि मुझे ऐसा हो गया है ,लगता है तो उसे वैसे ही अनुभूतियां होने लगती है।  जैसे कि रोगी माने की मुझ पर किसी शक्ति का वास हो गया तो उसे ऐसी फीलिंग और अनुभव होगा कि सचमुच मुझ पर किसी शक्ति का नियंत्रण है और वह शक्ति ऐसा चाहती है और वैसा चाहती है।

     मनोरोग की दूसरी खास बात यह है कि रोगी जो भी समाधान करेगा जैसे की मजारों पर जाना, झूमना ,खेलना ,ताबीज एवं हाजिरी आदि लगाना तो शुरुआत में ऐसी फीलिंग होगी कि अब मैं ठीक होने लगा हूं और पहले से बेहतर स्थिति में हूं।

     दिल की घबराहट कुछ कम महसूस होगी सर दर्द या चक्कर आने में कुछ कमी दर्ज होगी । दिनचर्या में सुधार महसूस होगा और इस सुधार का एकमात्र कारण यह होता है कि रोगी खुद मान लेता है कि मैं ठीक हो रहा हूं सिर्फ इसलिए वह थोड़े टाइम को खुद को रिलीफ में महसूस करता है।

   वास्तविक रूप से वह समस्या ज्यों कि त्यों  बनी रहती है बल्कि यह कहना चाहिए की समस्या एक कदम और बढ़ चुकी होती है। मानसिकता में एक बल और पड़ चुका है।   

    मानसिकता पहले से ज्यादा उलझ चुकी है। इसका रहस्य तब खुलता है जब निश्चित समय के गुजर जाने के बाद भी रोगी सामान्य नहीं हो पाता तो उसकी जो हौसला मिला होता है,  जो आशा जगी रहती है उसी के वशीभूत वह अच्छा महसूस कर रहा था । उस आशा के धूमिल होने पर रोगी खुद को पहले से ज्यादा समस्याओं से ग्रस्त पाता है और अपने को ठगा महसूस करता है। 

 भूत प्रेत की भ्रमित स्त्रियों में देखा गया है कि परिवार और आसपास के लोगों का मुंह बंद करने के लिए धार्मिक स्थलों  मजार दरगाह आदि पर जाती हैं और वहां झूमती खेलती हैं और भूत प्रेत की बड़ी भूमिका अदा करने की कोशिश करती हैं ताकि किसी तरह कोई समझे कि मैं वास्तविक रूप से बहुत परेशान हूं।

         देखा गया है कि उपरोक्त कारणों से वशीभूत रोगी विभिन्न स्थलों पर झूमते खेलते नजर आते हैं।

 वास्तविकता यह है कि इस प्रकार के रोगी को कोई भूत प्रेत  पकड़ा नहीं होता। न मौलवी मजारों में कोई शक्ति,  ना कोई पेशी पड़ती, ना कोई मुकदमा चलता है। ऐसा मानकर रोगी चलता है कि मुझपर भूत प्रेत की छाया है इसलिए उसे ऐसी फीलिंग होने लगती है।

   इसलिए हमें चाहिए कि समाज में फैले  इस प्रकार के भ्रम से स्वयं एवं परिवार तथा समाज को बचाने का प्रयास करें।  नियमित रूप से योग- ध्यान- प्राणायाम करें ! अपनी आत्म शक्ति बढ़ाएं।भूत प्रेत के भ्रम से मुक्ति हेतु अपने मन में बैठे हुए वहम को निकाले। (चेतना विकास मिशन).

Ramswaroop Mantri

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