अंजनी कुमार
आजकल बिहार के गांवों तक मीडिया पहुंची हुई है। यहां के गांव को समझने में मशक्कत करते हुए और यदा-कदा ज्ञान बघारते मीडियाकर्मी आपको दिखाई और सुनाई देंगे। कई मीडियाकर्मियों ने दावा किया है कि उनकी खबरों का वहां सीधा असर पड़ा है और बदलाव दिखाई दिया है।
एक मीडियाकर्मी तो बहस को संतुलित करने में खुद ही उखड़ गया और डांट-डपट कर बहस के लोकतांत्रिक तरीके बताते हुए दिखता है। एक मीडियाकर्मी, जो अपने खिलदंड़े और निर्दोष अंदाज के लिए प्रसिद्ध है, बच्चे से पूछता है- ‘अपने बारे में बताओ।’ वह मुंह मोड़कर जाते हुए कहता है- ‘एक बिहारी, सौ पर भारी।’ बैकग्राउंड से एक हल्की सी हंसी की आवाज आती है।
मीडियाकर्मी एक दूसरे बच्चे की ओर बढ़ जाता है- ‘बिहारी कौन है?’ बच्चा चुपचाप मुंह मोड़कर जाता हुआ दिखता है।
यहां मैं जिन मीडिया की बात कर रहा हूं, वे यूट्यूब पर काम करने वाले कर्मी हैं और इस पर अपना चैनल चलाते हैं। इस चुनाव में वहां के समाज को समझने और समझाने का आया यह उबाल बिहार के उन्हीं हालातों का बयान है जिस बारे में अक्सर बातें होती रही हैं।
गरीबी, बीमारी, उजाड़, अराजकता, पलायन और निरीहता को खंगालते ये मीडियाकर्मी बिहार के जमींदारों, नेताओं, बाहुबलियों के घरों की ओर कभी नहीं बढ़ते, उन्हें कैमरे में कैद करते हुए नहीं दिखते जिन्होंने बिहार की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक जिंदगी पर लंबे समय से कब्जा कर रखा है।
वे बिहार की अथाह गरीबी और भयावह स्तर के पलायन को सीधे बिहार की राजनीति में होने वाले चुनाव और बनने वाले सरकारों के साथ जोड़कर देखते हैं। वे अक्सर बिहार की राजनीति में होने वाली हिंसा पर जोर देते हुए दिखते हैं। मानो हिंसा ने ही विकास का रास्ता रोककर रखा है। वे इस बात की ओर नहीं देखते कि हिंसा विकास न होने का एक परिणाम हो सकता है।
यहां मैं अपने ही एक लेख का हवाला दे रहा हूं जो ‘फिलहाल’ पत्रिका के नवम्बर, 2021 अंक में छपा था। 1809-14 में बिहार के पटना, गया, भागलपुर, पूर्णिया और शाहाबाद में मैन्युफैक्चरिंग में लगी आबादी कुल का 18.6 प्रतिशत थी जो अगले सौ साल में, 1902 में घटकर 8.5 प्रतिशत हो गई। खासकर, पूर्णिया में यह 20.2 प्रतिशत से घटकर 6.5 प्रतिशत पर आ गई।
पटना, गया और भागलपुर कपड़ा उद्योग में अग्रणी नाम रहे हैं और आज भी उनके अवशेष बचे हुए हैं। यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि पुराने शहरों की आबादी में कमी आई। वहीं खेतों का पुनगर्ठन अंग्रेजों की जमींदारी व्यवस्था में किया गया और खेती के उत्पादन पर अफीम, नील, गन्ना जैसे उत्पादों पर जोर दिया गया।
खेती की जमींदारी व्यवस्था ने एक ओर जमींदारों, सूदखोरों और बड़े आढ़तियों को जन्म दिया वहीं खेती में दासता के लुप्तप्राय व्यवस्था को जिंदा कर दिया। कई छोटे राजाओं और नवाबों को अचानक ही काफी बड़ा बना दिया गया जिनकी जमीन की हदबंदी की कोई सीमा ही नहीं थी।
यह अंग्रेजों की वह जमींदारी और संपदा की लूट की नीति थी जो भारत में प्लासी के युद्ध के बाद उन्होंने बंगाल प्रोविंस पर लागू किया जिसमें बिहार का लगभग सारा ही हिस्सा शामिल था। बाकी बचा हुआ काम 1857 के बाद बड़े पैमाने पर हुआ। पटना, कोलकाता और ढाका, ये तीन शहर उभरकर आये जहां क्रमशः अफीम, जूट और कपड़ा, कपड़ा उद्योग का केंद्र या तो बनकर उभरे या बने रहे। अफीम के व्यापार की गिरावट के साथ ही पटना शहर महज एक प्रशासनिक केंद्र बनकर रह गया। इसके बाद भारत के नक्शे पर हम मद्रास और मुंबई को उभरते हुए देखते हैं। कोलकाता गिरमीटिया मजदूरों को उपनिवेशों में ले जाने के पोर्ट में बदल गया।
बिहार और बंगाल ने न सिर्फ आदिवासी विद्रोहों को देखा, बाद में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीति को भी देखा। लेकिन, सबसे भीषण रूप में जमींदारों के खिलाफ लड़ने वाले कम्युनिस्ट आंदोलन को देखा।
आज के बिहार की राजनीति के फलक पर अधिकांश पार्टियां वही हैं जो जमींदारों, सूदखोरों, आढ़तियों और उनके लठैतों को पालती रही हैं। वोट की राजनीति ने सामान्य जन को जरूर ध्रुवीकरण की ओर ले गया, लेकिन ऊपर अभिजनों का दबदबा बना रहा। ये अभिजन वोट के ध्रुवीकरण को इस या उस तरीकों से पुनर्संयोजित करने में लगे रहे हैं या उन्हें वोट से ही वंचित कर देने की तिकड़म भिड़ाते रहे हैं।
1990 के दशक में इसे साम्प्रदायिक रंग में रंगने की कोशिशें हुईं और इस बार चुनाव आयोग के सहारे नागरिक पहचान के आधार पर करने की ओर जाया गया है। जाति के आधार पर ध्रुवीकरण एक पुरानी तकनीक तो रही ही है।
बिहार में रोजगार, गरीबी और पलायन के संदर्भ में कभी भी भारत के योजना आयोग या नीति आयोग, यहां के उद्योगीकरण के पैटर्न, भूमि सुधार की नीति आदि को लेकर शायद ही कोई बात होती हो। बिहार 1980 के दशक से पहले कोलकाता और मुंबई, और उसके बाद पंजाब के लिए सस्ते मजदूरों का मुख्य स्रोत बन गया। बाद के दिनों में यह गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल तक यह मजदूरों का आपूर्तीकर्ता बन गया। इसमें थोड़े कम की भागीदारी, लेकिन संख्या के हिसाब से करोड़ों की संख्या में भागीदारी उत्तर प्रदेश और बंगाल के मजदूर कर रहे हैं।
मोदी के काल में दो ऐसे आर्थिक निर्णय थे जिसने बंगाल, बिहार और उत्तर-प्रदेश को सर्वाधिक प्रभावित किया है। पहला, नोटबंदी और दूसरा, कोरोना के समय में लाॅकडाउन। इन दोनों निर्णयों ने मजदूरों को वापस गांव की ओर भेजा। साथ ही, इसने स्थानीय स्तर पर उभरकर आ रही आर्थिक संरचनाओं को तोड़कर रख दिया।
इसने आम परिवारों को तबाही के हालत में पहुंचा दिया है। एक तरफ बैंकों और शेयर बाजारों से लूट मचाकर अडानी जैसे समूहों ने संपदा के मामले में अभी तक के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं, वहीं गरीबी के मामलों में बिहार एक माॅडल बनकर उभरा है।
आर्थिर्की के विद्वानों के सूत्रीकरण को देखें, तो साफ है कि वित्तीय घरानों के प्रभाव बढ़ते जाने के साथ वास्तविक आर्थिक संरचनाएं दम तोड़ने लगती हैं। मुनाफा के लिए मजदूरों पर दबाव बनाया जाने लगता है। जनता के बीच एकता तोड़ने के लिए सांस्कृतिक मूल्यों पर जोर दिया जाने लगता और पतनशील मूल्यों पर जोर बढ़ जाता है।
धार्मिक, जातीय विभेद बढ़ाया जाता है और मजदूरों को सस्ता श्रमिक बनाने के लिए उन्हें तबाह हालात की ठेला जाता है। राजनीति इसे बड़े पैमाने पर करती है और मीडिया संस्थान इसका माध्यम बन जाते हैं।
मोदी चुनावी भाषण में युवाओं को रील बनाने और उन्हें डेटा सस्ता उपलब्ध कराने का वादा कर रहे हैं। प्रशांत किशोर रोजगार की बात कर रहे हैं। महागठबंधन पक्की नौकरी की बात कर रहे हैं। लेकिन, अब भी बिहार में, बिहार सरकार की ओर से ही गठित हाल तक के आयोगो के भूमि सुधार के वादों को पूरा करने का वादा कोई नहीं कर रहा है।
किसी सामाजिक-राजनीतिक संरचना में बदलाव के लिए वहां की उत्पादन की संरचना में बदलाव लाना अनिवार्य है। आज हम भारत के जिन भी राज्यों में आर्थिक संपन्नता के छोटे-छोटे केंद्र देखते हैं, उनके पीछे वहां की खेती में लाया गया बदलाव था।
गुजरात और महाराष्ट्र में कोआपरेटिव आधारित खेती और व्यवसाय, पंजाब और पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में हरित क्रांति के लिए आवश्यक संसाधन की उपलब्धता के आईने में हम वहां के विकास के कारणों को परख सकते हैं। बिहार में फिलहाल ऐसी कोई भी योजना न तो किसी पार्टी की ओर से दिखाई दे रही है और न ऐसा कोई वादा किया जा रहा है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब युवाओं को रील बनाने का रोजगार में बने रहने और उसके सस्ता डेटा उपलब्ध कराने का वादा करते हुए कुछ और नहीं वित्तीय कारोबारियों का बिहार के लिए बनाया गया सपना बेच रहे हैं। वित्तीय कारोबार की राजनीति इतने भोंडे तरीके से शायद ही किसी और के भाषण में अभिव्यक्त हुई हो। बिहार के लोग जरूर ही ऐसे भाषणों का निहतार्थ समझते होंगे।





