अग्नि आलोक
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*अधर्म का नाश हो* जातिगत समानता A to Z हो*(खंड-1)-(अध्याय-49)

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संजय कनौजिया की कलम”✍️

भारत में इस्लाम का आगमन करीब सातवीं शताब्दी में ही हो चुका था, यानि सन 621 इसवीं और तब से वे भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का एक अभिन्न अंग बन चुका था..उस काल में इस्लाम का आना केवल बढ़ता व्यापार ही था, और व्यापार के ईमानदार अनुशासन को देख समझ इस्लामी व्यापारी खूब आकर्षित हुए और यह रिश्ता इस्लामी लोगों को इतना भाया कि इस्लामी लोग यहाँ लम्बे लम्बे वक्त तक अपना वक्त गुजारने लगे थे..घोघा, गुजरात में बरवाड़ा मस्जिद 623 इसवीं से निर्मित है..मेथला, केरल में चेरामन जुमा मस्जिद 629 इसवीं सन और तमिलनाडु के पलैया जुम्मा पल्ली या पुरानी जुमा मस्जिद 628-630 इसवीं सन से निर्मित हो चुकी थी..गौरी-गजनवी से पूर्व ही भारत हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों का एक अध्भुत मिलान होता आया था, और भारत के आर्थिक उदय तथा सांस्कृतिक प्रभुत्व में मुसलमानो ने महती भूमिका निभाई रखी..भारत में अरब व्यापारियों का मार्ग उस काल में समुन्द्र के द्वारा ही था, और तभी से भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन चुका था..इससे सिद्ध होता है कि लोकप्रिय विश्वास के विपरीत, इस्लाम भारत में मुस्लिम आक्रमणों से पहले दक्षिण एशिया में आ चुका था..!
इस्लामी प्रभाव को सबसे पहले अरब व्यापारियों के आगमन के साथ 7वीं शताब्दी के आरम्भ में महसूस किया जाने लगा था..मध्यकाल के बाद के प्राचीनकाल को यदि समझें तो अरब और भारतियों उपमहाद्वीप के बीच व्यापार सम्बन्ध अस्तित्व में रहा था..यहाँ तक कि पूर्व इस्लामी युग में भी अरब व्यापारी मालाबार क्षेत्र में व्यापार करने आते थे, जो कि उन्हें दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ती थी..इतिहासकार इलियट और डाउसन की पुस्तक “द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया एज टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टोरियन्स” के अनुसार भारतीय तट पर 630 ईस्वीं में मुस्लिम यात्रियों वाले पहले जहाज को देखा गया था..पारा रोलिसन, अपनी किताब “ऐसियंट एंड मिडियावल हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया” में दावा करते हैं कि 7वीं ईस्वीं के अंतिम भाग में प्रथम अरब मुसलमान भारतीय तटों पर बसे थे..शेख जैनुद्दीन मखदूम की किताब “तुहफ़ल अल मुजाहिदीन” एक विश्वसनीय स्रोत है, इस तथ्य को जे-स्तुरोक्यक द्वारा “कल्चरल हेरिटेज ऑफ़ इंडिया”-वॉल्यूम-4 में भी इस तथ्य को प्रमाणित किया गया है..इस्लाम के आगमन के साथ ही अरबवासी दुनियां में एक प्रमुख सांस्कृतिक शक्ति बन गए थे..अरब व्यापारी और ट्रेडर्स नए धर्म के वाहक बन गए थे और जहाँ भी गए उन्होंने इसका प्रचार किया..यह कथित तौर पर माना जाता है कि इतिहासकार, राम वर्मा कुलशेखर के अनुसार भारत में प्रथम मस्जिद का निर्माण 629 ईस्वीं में हुआ था, जिन्हें मलिक बिन देनार के द्वारा केरल के कोंडुगालार में मुहम्मद, ईस्वीं 571-632 के जीवन समय के दौरान भारत का पहला मुसलमान भी माना जाता है..मालाबार में, मप्पिलास इस्लाम में परिवर्तित होने वाले पहले समुदाय हो सकते हैं क्योकिं वे दूसरों के मुकाबले अरब से ज्यादा जुड़े हुए थे..तट के आसपास गहन मिशनरी गतिविधियां चलती रहीं और कई संख्याओं में मूल निवासी इस्लाम को उस समय मप्पिलास के साथ जोड़ा गया..इस प्रकार मप्पिलास लोगों को हम स्थानीय महिलाओं के माध्यम से अरब लोगों की उत्त्पत्ति और स्थानीय लोगों में से धर्मान्तरित दोनों प्रकार को देख सकते हैं..8वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम की अगुवाई में अरब सेना द्वारा सिंध प्रान्त (वर्तमान में पाकिस्तान) पर विजय प्राप्त की गई..सिंध, उमय्यद ख़लीफ़ा का पूर्वी प्रांत बन गया था..10वीं शताब्दी के प्रथम अर्धभाग में गजनी के महमूद ने पंजाब को ग़जनविद साम्राज्य में जोड़ा और आधुनिक समय के भारत में कई हमले किये थे, इन हमलों में लाहौर, पेशावर, सिंध, पंजाब जैसे पश्चिमी भारत पर हमले किये गए..”जाति के आधार पर पूरी तरह बंटे छोटी-छोटी रियासतों के राजा, कासिम और गजनी जैसे विदेशी मुस्लिम हमलावरों का सामना नहीं कर सके और भाग खड़े हुए..गजनी ने बेरहमी इन इलाकों के मंदिरों को लूटा और तोडा, हिन्दू पुरुषों को लाइन में खड़ा कर उनकी गर्दन काट डाली गईं..इसी दौरान जिन लोगों ने दोनों हमलावरों के सामने इस्लाम ग्रहण कर दिया उन्हें छोड़ दिया गया तथा ऐसे नए धर्मांतरणों को इस्लाम फैलाने का फरमान देकर दोनों हमलावर अपने अपने समय अनुसार वापस लौट गए..यह भारत में दवाब द्वारा इस्लाम की पहली शुरुआत थी..12वीं शताब्दी के अंत में एक और अधिक सफल आक्रमण, मौहम्मद गौरी द्वारा किया गया था..इस प्रकार अंतत: दिल्ली सल्तनत के गठन के लिए यह अग्रसर हुआ..!
भारत में इस्लाम के प्रचार व प्रसार में सूफ़ियों (इस्लामी मनीषियों) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई..इस्लाम के प्रसार में उन्हें काफी सफलता प्राप्त हुई, क्योकिं कई मायनो में विशवास प्रणाली और अभ्यास भारतीय दार्शनिक साहित्य सामान थीं, विशेष रूप से अहिंसा और अद्वैतवाद..इस्लाम के प्रति सूफ़ी रूढ़िवादी दृश्टिकोण ने हिन्दुओं को इसका अभ्यास करने के लिए आसान बनाया है..”हजरत ख्वाज़ा मुईन-उद-चिश्ती” “क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार ख़ुरमा”, “निजाम उद-द्विन-औलिया”, “शाह जलाल”, “आमिर खुसरो”, “सरकार साबिर पाक”, “शेख अल्ला-उल-हक़ पंद्वि”, “अशरफ जहांगीर सेम्नानी”, “सरकार बारीक़ पाक”, अता हुसैन फ़नी चिश्ती” ने भारत के विभिन्न भागों में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए सूफ़ियों को प्रशिक्षित किया..इस्लामी साम्राज्य के भारत में स्थापित हो जाने के बाद सूफ़ियों ने स्पष्ट रूप से प्रेम और सुंदरता का एक स्पर्श प्रदान करते हुए इसे उदासीन और कठोर होने से बचाया..सूफ़ी आंदोलन ने कारीगर और अछूत समुदायों के अनुयायियों को आकर्षित किया, साथ ही इस्लाम और स्वदेशी परम्पराओं के बीच की दूरी को पाटने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई..नक्शबंदी सूफ़ी के एक प्रमुख सदस्य, अहमद सरहिंदी ने इस्लाम के लिए हिन्दुओं के शांतिपूर्ण रूपांतरण की वकालत की थी..इमाम अहमद खान रिदा ने अपनी प्रसिद्ध फ़तवा रज्नियाँ के माध्यम से भारत में पारम्परिक और रूढ़िवादी इस्लाम का बचाव करते हुए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था….

धारावाहिक लेख जारी है
(लेखक-राजनीतिक व सामाजिक चिंतक है)

Ramswaroop Mantri

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