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भक्ति आराधना इबादत

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शशिकांत गुप्ते

भगवान के भक्तों की संख्या में दिन-ब-दिन इज़ाफ़ा हो रहा है। यह देख,सुन कर प्रसन्नता होती है। संत कहतें हैं कि,भक्ति करने से मन शुद्ध होता है। आचरण सुधरता है, मतलब आचरण में मानवीयता आती है। नियत में कभी भी खोट नहीं रहता है। भक्ति करने वाले सभी, सदा नीति पर चलतें हैं।
भक्ति करने से मन निर्मल हो जाता है। भक्ति करने वालों से विभक्ति कोसों दूर रहती है। विभक्ति शब्द का अर्थ अलगाव होता है।
भक्ति करने वाला कैसा होना चाहिए इस पर संत कबीर साहब का यह दोहा है।
कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय
भक्ति करे कोई सुरमा, जाति बरन कुल खोए

भावार्थ: संत कबीर साहबजी कहते हैं कि कामी, क्रोधी और लालची, ऐसे व्यक्तियों से भक्ति नहीं हो पाती है। भक्ति तो कोई सूरमा ही कर सकता है, जो अपनी जाति, कुल, अहंकार सबका त्याग कर देता है।
भक्ति करना मतलब ईश्वर की आराधना करना। आराधना को ही इबादत कहतें हैं।
इबादत के बारे में शायर अल्ताफ़ हुसैन हालीजी का यह शेर पढ़ने में आया,
यही है इबादत यही दीन ओ ईमाँ
कि काम आए दुनिया में इंसान के इंसान

बहुत से लोग इबादत करतें हैं। बहुत स्व लोगों को वर्षो आराधना करते देखा जाता है, वास्तविकता निम्न शेर में बयां होती है।
वो जो इक उम्र मसरूफ़ इबादत में थे
आँख खोली तो अभी अर्सा-ए-जुलमात में थे
अर्सा-ए-जुलमात का शाब्दिक अर्थ वर्षो से गहरे अंधकार में थे।
भक्ति में गहराई होनी चाहिए।
भक्ति ईश्वर की करनी चाहिए। कलयुग में भ्रमवश कुछ व्यक्ति को ही पूजने लगते हैं। किसी व्यक्ति को सबकुछ समझने लगतें हैं।
बहुत सी बार ऐसे लोगों का हश्र इसतरह होता है। किसी शायर ने क्या खूब कहा है।
जिसे पूजा था हमने वह खुदा ना हो सका
हम ही इबादत करते करते फ़क़ीर हो गए

भक्ति करने से कभी भी ज़ेहन में नफरत आ ही नहीं सकती है।
इस मुद्दे पर प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी की यह नज़्म प्रासंगिक होगी।
नफरत के साथ भीड़ है,नारा है जोश है
मै बात कर रहा हूँ
मोहब्बत की अमन की तन्हा हूँ
और जिंदा हूँ यह हैरत की बात है

भक्ति कैसी भी करो लेकिन यही पैगाम मतलब संदेश याद रखना चाहिए।
सन 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म पैगाम के गीत यह पंक्तियों याद करना चाहिए। गीत लिखा है गीतकार प्रदीपजी ने
इंसान का हो इंसान से भाई चारा
यही पैगाम हमारा

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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