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समयचिंतन : घंटों- डंकों के दौर में कूटनीति

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 पुष्पा गुप्ता

     _बीते हफ्ते दुनिया के सारे बड़े मीडिया हाउस में कतर में चल रहे फीफा विश्व कप से भी बड़ी खबर थी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की खाड़ी देशों की यात्रा!_

         यात्रा भी इतनी बड़ी थी कि कतर के अमीर तमीम बिन हमाद अल थानी अपने ही देश में चल रहा विश्व कप छोड़ चीनी राष्ट्रपति से मिलने लगभग दुश्मन सऊदी अरब पहुँचे थे। 

         राष्ट्रपति शी जिनपिंग की कुल चार दिन की यात्रा में गल्फ़ देशों के सारे शासक उनसे मिलने रियाध पहुँचे। (आप चाहें तो एक महामानव की एक एक देश में घर दुअरिया देकर उसके शासक के साथ गले पड़ना याद कर सकते हैं। 

इन देशों ने गल्फ़ कोऑपरेशन कौंसिल और अरब समिट भी उसी वक़्त वहीं रखी। 

      मिलने वाले राष्ट्राध्यक्षों में थे क़तर के अमीर, संयुक्त अरब अमीरात के शासक शैख़ हमाद बिन मोहम्मद, कुवैत के राजकुमार शैख़ मेशाल अल सबा और ओमान के उप प्रधानमंत्री सैयद फ़हाद अल सईद। 

       इसके अलावा चीन अरब समिट में शामिल होने वाले नेता थे इजिप्ट के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल सीसी,,सूडान की सॉवरेन कौंसिल के मुखिया जनरल अब्दुल फ़तह अल बुरहान, फ़िलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास, और इराक़ के प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल सूडानी। 

सच है कि दुनिया का कोई देश अब अपना कोई फैसला एक महामानव से पूछे बिना नहीं करता. यहां तक कि महामानव का मजाक भी उनसे पूछे बिना नहीं उड़ाते.

       यात्रा और इन मुलाक़ातों का संदेश साफ़ था- दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक और सुन्नी इस्लामिक दुनिया के नेता सऊदी अरब और दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक और उभरती शक्ति चीन दुनिया का शक्ति संतुलन बदलने को तैयार और तत्पर हैं- और उससे बड़ा भी- संयुक्त राज्य अमेरिका अब खाड़ी देशों में अकेला खिलाड़ी नहीं है! 

        जो समझौते हुए हैं वे भी आँख खोलने वाले हैं- दोनों ख़ेमों में तेल का व्यापार चीन की मुद्रा युआन में करने पर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैसा भेजने वाले स्विफ्ट (SWIFT) के चीनी विकल्प पर (याद रहे नाटो देशों द्वारा रुस के लिए स्विफ्ट के प्रयोग पर प्रतिबंध ने उसे बहुत नुक़सान पहुँचाया है)। 

ऐसा हुआ क्यों? सऊदी पत्रकार खाशोगी की हत्या से लेकर अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका और नाटो की शर्मनाक हार से दुनिया में अमेरिका का प्रभाव घटा है, और चीन उसे भरने की कोशिश में है।

     असली कूटनीति से, व्यापारिक संबंधों से, समझौतों से। नेताओं के गले  पड़ कर नहीं। 

       इसमें उस क़तर का भी शामिल होना जिससे सऊदी अरब, यूएई, और बहरीन ने 2017 में रिश्ते तोड़ लिए थे (2021 में फिर बहाल हुए) चीन के बढ़ते प्रभुत्व पर एक और बड़ी टिप्पणी है। 

बाक़ी इस यात्रा के भारत के लिये निहितार्थ बहुत बड़े हैं- आप मीडिया के बजाए घंटे कि दुनिया का कोई फ़ैसला फलाने के बिना नहीं होता पर नाचते रहें, नेपाल, मालदीव श्रीलंका से लेकर ईरान और अन्य खाड़ी देशों तक चीन तेज़ी से प्रभुत्व बना रहा है जबकि हम क्वैड में अमेरिकी लठैत बने भी घूम रहे हैं और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन में चीन और पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास भी कर रहे हैं। बोले तो नीति विहीन कैमरा जीवी हैं।

        याद रहे- जिस क्वैड के लिये फलाने ने दक्षिण चीन महासागर में भारतीय नौसेना भेजी थी उसने आज तक गलवान पर चीन की नाम लेकर निंदा तक नहीं की है। 

      ख़ैर वही क्यों करे- निंदा क्या, हमारे 56 माइक्रो मिली मीटर तो गलवान के बाद चीन का नाम तक नहीं ले पाये हैं।

Ramswaroop Mantri

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