दिव्यांशी मिश्रा
_डिस्कवरी की सीरीज़ में कहा गया की जयदेव के गीतगोविन्दम से पहले राधा का कहीं ज़िक्र नहीं मिलता, भागवत पुराण में भी नहीं। हालांकि, उन्होंने ये ठीक कहा कि भागवत में राधा का ज़िक्र नहीं है, लेकिन :_
पुराणों में उनके नाम की व्याख्या मौजूद है, गीतगोविन्दम जिनके बाद की कृति रही। कृष्ण और राधा के प्रेम के अनेक क़िस्से मौजूद हैं, किताबों में, पुराणों में, कविताओं और सबसे अधिक लोक में।
मथुरा में एक स्थान है जिसे भांडीरवन कहते हैं, वहां एक प्राचीन पेड़ है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसी के नीचे राधा – कृष्ण का गंधर्व विवाह हुआ था। वहां कृष्ण के विवाह का मुकुट भी रखा है। पेड़ के नीचे बने मंदिर से विवाहित महिलाएं अपने लिए सिंदूर लेकर आती हैं।
_बरसाना तो पूरा ही राधा के नाम पर बसा है। हर घर के बाहर राधे हैं, अभिवादन में राधे हैं, स्मरण में राधे हैं। परंतु, भांडीरवन और बरसाना दोनों ही जगह बहुत कम लोग जाते हैं। निधिवन, विश्राम घाट, बांके बिहारी, रमण-रेती जाने वाले अक्सर बरसाना छोड़ देते हैं।_
वहां श्रीराधे का महल है जिसकी छत से पूरा गांव दिखता है। संध्या में ऐसे जगमगाते दिखते हैं घर जैसे पूरा गांव अपनी आराध्या के चरणों में दीप-वंदन कर रहा हो।
सावन में जाओ तो लगेगा कि मथुरा शहर से इतनी नज़दीक यह जगह वहां के परिवेश से कितनी दूर है, बारिश की बूंदों से और खिल आते हैं वहां वृक्ष जैसे श्री राधे स्वयं उसका आनंद ले रही हों। फिर मोरकुटी और गहवर की परिक्रमा करते साधु दिखते हैं।
_वहीं एक छोटी सी कुटिया है जहां बरसों से एक बूढ़ी महिला रहती हैं। वो राधे – राधे कहती और इलायची दाने का प्रसाद देतीं। बल्लभ संप्रदाय की बैठक से थोड़ी दूर उस महिला की कुटिया एकांत में थी और उसके बाहर कई बंदर रहते। भीड़ से उस एकांत में पहुंच कर हम जैसे लोग सोचते हैं कि क्या इनका मन नहीं उचटता होगा इतनी शांति से।_
कभी तो ऊब होती होगी। पर, कितनी शबरी अपने राम की प्रतीक्षा करती होंगी आज भी, कितने भक्त केवल राधा के दर्शन को ही तो कहते होंगे राधे – राधे।
पिछली बार पहली बार था कि वो नहीं मिलीं, मैंने किसी से पूछा भी नहीं। भक्त – भगवन् की हर कथा समझी नहीं जा सकती। मैंने सोचा कि वो प्रतिदिन राधा रानी के दर्शन को जाती होंगी और किसी रोज़ उन्हें दर्शन हो गए होंगे।
_हम तो कहते ही हैं कि राधे – राधे श्याम मिला दे। कैसे होंगे वो भक्त जिन्हें राधा मिलती होंगी कि कृष्ण तो फिर पीछे – पीछे आते ही हैं।_
कृष्ण – राधा के बारे में लोक में अनेक कथाएं हैं, हरिदास की युगल छवि है, केलीमाल के पद हैं। राधा के होने से ब्रज में श्रृंगार है, वह कविता का मर्म हैं, राधा प्रेम हैं, वह सार हैं और सृष्टि का उद्गार हैं।
_वह कृष्ण की अभिव्यक्ति हैं और उनके मन की शक्ति हैं। राधा के होने से ही ब्रज में रस है, वहां का कुंड और तालाब इसी से सरस है।_
पुराणों में उनका कितना ज़िक्र है यह गहन अध्ययन का विषय ठहरा लेकिन जब कोई नाम प्रेम का पर्याय हो जाए तो उससे बड़ा फिर क्या होगा।![]()





