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शिक्षा व्यवस्था का बंटाधार….!

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हिम्मत सेठ
  उदयपुर

आज शिक्षा की स्थिति अत्यन्त विचलित करने वाली है, खासकर प्राइमरी और उच्च शिक्षा की । प्राइमरी शिक्षा की तो पूछिये मत , वहाँ टीचर सरकार की नौकर , नौकरानी की तरह है, चुनाव काराना, जनसंख्या के नाम पर हिंदू मुसलमान , पिछड़े ,दलितों की संख्या गिनना, जानवरो की संखया गिनना. बी.एल. ओ. बनकर वोटर बनाना, हर योजना जैसे मिड डे मील. ड्रेस , विल्डिंग मरम्मत , शौचालय इत्यादि निर्माण के पैसों से ABSA, BSA के माध्यम से कमीशन उपर तक पहुंचाना अगर नही पहुंचा पाये तो सस्पेंड होने के लिये तैयार रहना। पढ़ाई के नाम पर धोखा । उच्च शिक्षा के बारे मे पूछिये मत, हाई स्कूल फेल महिला देश की शिक्षा मंत्री बन गयी, इतिहास वाला रिजर्व बैंक गवर्नर बन गया । विश्वविद्यालयों के बारे में इससे मिलती जानकारी मुझे मिली। अब स्थिति यहां तक आ गयी है कि कुलपति कहते हुये सुनाई पड़ते हैं कि वे संघ और पार्टी कि वजह से कुलपति बने हैं, उन्हें उनकी बात माननी ही होगी। अत: उन्होंने हर स्तर के शिक्षकों के पदों पर ऐसे लोगों की नियुक्ति की है जो किसी संघ या पार्टी के किसी उच्च पदाधिकारी की शिफारिस लाये हों। उनकी शैक्षिक क्षमता गौड़ रही है। यह भी सुनने को मिला कि विशेषज्ञों को बता दिया गया था कि चयन किये जाने वाले अभ्यर्थी से क्या सवाल पूछे जाने हैं। पूर्ण भक्ति अर्पित की गयी। संघ या पार्टी की कृपा के बिना कोई नियुक्ति नहीं हुई। लोग कहते हैं कि कुलपतियों की नियुक्ति के लिये संघ का सदस्य होना अनिवार्य हो गया है। शिक्षा के भगवाकरण को यह कह कर नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता की पूर्व में कई विश्वविद्यालयों में कम्युनिस्ट विचारधारा वालों को प्राथमिकता दी जाती थी। उनकी गलती को ढाल नहीं बनाया जा सकता।
हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि देश ज्ञान और विज्ञान से विकास की राह चलेगा न की धर्म से। जहां-जहां ऐसा हो रहा है वे देश को अंधकार की ओर ले जा रहे हैं न कि ज्योति की ओर।
“विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों की चेतना को कुंद करने का एक प्रभावी औजार यह भी है कि इसके शीर्ष पदों पर ऐसे लोगों को बैठाया जाए जिनका बौद्धिकता से अधिक लेना-देना न हो और जो सत्ता की खुशामद करते हुए इस बात की पुरजोर कोशिश करें कि परिसर के स्वतंत्रचेता शिक्षकों को कैसे हाशिये पर डाल कर रखा जाए।
जो जितना जाहिल होगा उसे चेतनासम्पन्न शिक्षकों और छात्रों के दमन में उतनी ही मानसिक सहूलियत होगी। यही कारण है कि कुलपतियों और प्राचार्यों के चयन का आधार बदलता गया और बदलते समय के साथ ऐसे-ऐसे लोग कुलपति और प्राचार्य बनने लगे जिनका नाम सामने आते ही उनकी करतूतों से वाकिफ लोग चौंकने लगे,की क्या कभी ऐसा भी हो सकता है।
फिर…लोगों ने चौंकना भी बंद कर दिया और मान कर चलने लगे कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में ऊंचे पदों तक पहुंचने के लिये जाहिल और चाटुकार होना पहली शर्त्त है। अगर किसी की रीढ़ की हड्डी सीधी है और सोच स्वतंत्र है तो वह इस रेस में सर्वथा अनफिट है।
तो…स्थितियां ऐसी बनती गईं कि जिन ख्यातनाम शिक्षकों के बारे में अन्य शिक्षक और छात्र यह सोचते थे कि इन्हें तो कहीं का कुलपति बनना चाहिये था, वे स्वयं को इस रेस से ही अलग मान कर चलने लगे। बदलती कसौटियों के साथ तालमेल बिठाने में अपनी असमर्थता को वे बेहतर समझते थे।
समय और बदला। कसौटियों में भी बदलाव हुए। अब जाहिल और चाटुकार होने से ही काम नहीं चलने वाला था। कई फैक्टर और जुड़ गए। परिसरों के गलियारों में दबी ढकी चर्चाएं होने लगीं कि नियुक्तियों में पैसों का जोर चला। किसने किसको कितने दिए, किस माध्यम से दिए…जितने मुहं, उतनी चर्चाएं।अब जब ऊपर की नियुक्तियों में पैसों के जोर की चर्चा चलने लगी तो नीचे की नियुक्तियों में क्यों नहीं। बिहार और उत्तर प्रदेश में ऐसी चर्चाओं का जोर कुछ अधिक ही रहा। कुछ वर्ष पहले तो ऐसा दौर भी आया…कई कुलपति एक साथ नियुक्त हुए, विवाद बढ़ा, हाईकोर्ट ने उन्हें हटाया। फिर नियुक्त हुए, फिर विवाद, फिर हाईकोर्ट ने हटाया। न किसी को कोई लाज, न कोई शर्म।
बिहार सरकार ने कुलपतियों को अधिकार दिया कि चयन समिति बना कर कॉलेज प्राचार्यों की नियुक्ति करें। उन्होंने ऐसा किया। साक्षात्कार के दौरान ही प्राचार्य के पदों की बोली लगने की अफवाहें। पता नहीं…क्या सच, पता नहीं क्या झूठ। रिजल्ट के रूप में पैनल सामने आया तो हाहाकार मचा। हाई कोर्ट में केस दर केस। अखबारों में चटकदार खबरें। गलियारों में चर्चा…इतने लाख में पद बिके, उतने लाख में बिके। कोर्ट में सुनवाई, विजिलेंस को जांच का जिम्मा। ये फरार, वो भूमिगत। ये गिरफ्तार, उसे जमानत। अंततः पैनल रद्द। फिर सुप्रीम कोर्ट। वहां भी राहत नहीं।
कोर्ट का आदेश…फिर से साक्षात्कार हो। गलियारों में फिर चर्चाओं का बाजार गर्म…”अबकी तो बोली बहुत अधिक है”…। जो सर्वथा योग्य थे, सहम कर पीछे हटे…”कहाँ से लाएंगे इतने पैसे”…और फिर पलायन की भाषा…”कौन इन झमेलों में पड़े”…। 
फिर पैनल जारी। फिर हाहाकार। फिर केस…तारीखों और सुनवाइयों का लंबा सिलसिला। फिर पैनल रद्द। फिर से कोर्ट का आदेश…फिर से साक्षात्कार हो। अबकी बोली और ज्यादा, दलालों की गतिविधि और तेज।
तो…जो सक्षम थे, योग्य थे, सहकर्मियों के लिये प्रेरणादायी थे, वे इस तरह के किसी भी रेस से खुद को अलग करने लगे। न कुलपति बनना, न रजिस्ट्रार बनना, न प्रतिकुलपति बनना, न प्राचार्य बनना। कुछ नहीं बनना। बस पढ़ाना और एक दिन…खामोशी के साथ रिटायर हो जाना।
जब व्यवस्था पर गलत लोग काबिज हो जाते हैं तो परिसरों की प्रशासनिक और अकादमिक संस्कृति का पतन होना स्वाभाविक है। आज का एक बहुत बड़ा सच यह भी है।बिहार में तो कुलपतियों से ऐसी नियुक्तियों का अधिकार छीन लिया गया। लेकिन, जहां अभी भी उन्हें ये अधिकार मिले हुए हैं, वहां के हालात जान कर मन अचंभित रह जाता है। कभी राजस्थान से खबरें आती हैं कि असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति में इतने लाखों की बोली लगी तो कभी यूपी के विश्वविद्यालयों से खबरें आती हैं कि नियुक्तियों में जाति और पैसे का नंगा नाच हुआ। पंडित मदन मोहन मालवीय का का.हिंदू. वि.वि. तो इसका रोल माडल बन चुका है। यहां पर पहले ऐसे विद्वान प्रोफेसर थे कि कुलपति की कुलपतियों की औकात नही होती थी कि वे उनको निगलेक्ट कर सकें। आज पूरा वि.वि. संघ की लेबोरेटरी बन गया है, बौने लोग बड़े बड़े पदों पर काबिज हैं, चार महिने से कुलपति का पद खाली है, एडहाकिज्म पर पूरा वि.वि. चल रहा है । नागपुर वाट्सअप यूनिवर्सिटी के तर्ज पर का.हि.वि.वि. चल रहा है। यहां के सबसे चरित्रहीन , प्रतिभाहीन , संघ के शाखा लगाने वाले लगनशील बहुत से लोग आजकल कुलपति बन गये हैं , उसमे अंगुली पर गिने हुये एक दो लोग अच्छे भी हैं लेकिन ९९% नकारा चाटुकार लोग कुलपति के पदों को सुशोभित कर रहे हैं और सुबह शाम , ” नमस्ते सदा वत्सले मात्रभूमे ” का कैसेट जा रहे हैं। 
पतन की ढलान पर फिसलता ही जा रहा है उच्च शिक्षा का तंत्र। निर्धनता तो सदैव से अभिशाप रही है, लेकिन एक अवधारणा रही कि प्रतिभा हो तो आगे बढ़ने में निर्धनता एक सीमा से अधिक रोड़ा नहीं बन सकती। लेकिन, अब यह अवधारणा बीते दिनों की बात बनती जा रही है। नया युग नए युग सत्य के साथ सामने खड़ा है। एक तरफ शिक्षा के कारपोरेटीकरण की सत्ता की साजिशें, दूसरी तरफ नियुक्तियों में बोलियों का बढ़ता जाना। कोर्ट क्या और कितना करे…? कितनी लड़ाइयां लड़ें प्रभावित लोग…? कहाँ से लाएं महंगे वकीलों की फीस के लिये इतना पैसा…?
सत्ता अपने चरित्र के अनुरूप उच्च शिक्षा के परिसरों को संचालित करने में कामयाब हो चुकी है। स्वायत्तता महज परिभाषाओं में रह गई है। अब तो इस स्वायत्तता पर भी चौतरफा आक्रमण होने लगे हैं। बौद्धिक वर्ग की हताशा निराश करने वाली है।जो समाज अपने बौद्धिकों को हताश कर, उन्हें हाशिये पर डाल कर मजाक का पात्र बना देगा, वह युग के अंधेरों का सामना कैसे कर सकेगा?
सभ्यता, संस्कृति और बौद्धिक चेतना के विकास में विश्वविद्यालयों की क्या भूमिकाएं रही हैं यह प्राचीन भारत और आधुनिक यूरोप और अमेरिका के इतिहास को पढ़ कर समझा जा सकता है। भारत अंधेरों के दौर से गुजर रहा है।दीनानाथ बत्रा जैसे लोग नया इतिहास लिख रहे हैं , अपने पूर्वजों की बौद्धिक श्रेष्ठता पर गर्व करने वाला समाज अपने विश्वविद्यालयों में बौद्धिक दरिद्रता का राज कैसे होने दे सकता है? आखिर कैसे? लेकिन…यही तो आज के हमारे समाज और हमारे अधिकांश शैक्षणिक परिसरों का सच क्या है। क्या नहीं…?” बाकी वर्तमान समय मे करोना ने तो सरकार की व्यवस्था को नंगा करके रख दिया, बिना इम्तहान सब पास ……
Mind is a beautiful servant as well as a dangerous master .Drbn Singh

Ramswaroop Mantri

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