–सुसंस्कृति परिहार
आजकल एक वक्त के मज़बूत देश भारत को वर्तमान सरकार ने इस तरह अधोगति में पहुंचा दिया है जहां से धर्मनिरपेक्षता , समाजवाद, भाईचारा के मूलमंत्र और नैतिकताओं के तमाम मानदंड इस तरह से उड़न छू हो गए हैं कि अब उनकी तलाश करनी पड़ती है।अफसोस इस बात का है कि चंद लोग हैं जो इस सदाचरण के साथ इन मूल्यों को तरजीह दे रहे हैं वे परेशान हैं।इतना ही नहीं ऐसे लोग जेल में भेज दिए जा रहे हैं जिनकी कोई सुनवाई नहीं।इधर संगीनतम अपराध में लिप्त लोगों का भंडाफोड़ अमेरिकी देश की अदालत कर रही है सारी दुनियां जिसे जान गई है उससे बचने के प्रयास चल रहे हैं जबकि इन्हीं वजहों से नाम आए विदेशी राजनायिकों से या तो इस्तीफे लिए जा रहे हैं या वे शर्मिंदगी महसूस करते हुए खुद बा खुद इस्तीफा दे रहे हैं।
धन्य है भारत देश के नेता और उद्योगपति उनके ऊपर कोई असर नहीं बेशर्मी से अपना काम जारी रखें हुए हैं।क्या यह वही देश है जहां रेल दुर्घटना होने पर रेल मंत्री इस्तीफा दे देते थे या देश में कम अनाज होने पर एक दिन का उपवास कर करोड़ों लोगों को प्रेरित कर अनाज की पहुंच पूरी करते थे। जनता की लूट की जगह वे अपनी तमाम जायदाद देश को सौंप देते थे। महिलाओं के साथ ज्यादती करने वाले को समाज ही सबक सिखा देता था।
भाईचारे का तो कहना ही क्या था ईद और क्रिसमस सभी धर्मावलंबी मनाते थे।और होली दीपावली भी सभी देशवासी उत्साह में डूबकर मनाते थे।यह सब देखकर भारत की जो तस्वीर बनती थी वह बड़ी प्रभावी थी।आज तो हिंदू राष्ट्र के नशे में युवा पीढ़ी को डुबाकर जो नफ़रत का खेल वतन में खेला जा रहा है।उससे कोप्त होती है।आज इसी भारत में ईद और क्रिसमस का विरोध होता है। बहुसंख्यक हिन्दुओं का दबाव हर जगह देखने मिलता है।
हाल ही बांग्लादेश देश में चुनाव हुए।इससे पूर्व वहां हिंदुओं की हत्या और जलते घरों की जिस तरह खबरें आई उससे यही लगता था कि वहां भी भाईचारा ख़त्म हो जाएगा। किंतु चुनाव के परिणाम आते ही जो तस्वीर सामने आई उससे यह पता चला कि हिंदुओं को अनुपात से अधिक टिकिट दिए गए और वहां के अवाम ने उन्हें बराबर जिताया। बौद्ध आबादी का भी ख्याल रखा गया वो भी जीते।इतना ही नहीं इस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में हिंदूओं और बौद्ध को भी मंत्रीमंडल में जगह मिली है।ये दर्शाता कि एक हमारा बनाया एक छोटा सा देश हमें आज यह बता और जता रहा है कि लोकतांत्रिक रास्ते से भारत कितना भटक गया है। हमारे यहां एक भी मुस्लिम नहीं बौद्ध, ईसाई की बात तो छोड़ ही दीजिए। बताया जा रहा है कि जो हिंदू विरोधी घटनाएं यहां हुई हैं वे बांग्लादेश में घुसपैठिए संघ की बदौलत ही कराई गई हैं।
हमारे देश में बंगाल के एक हिस्से से पहले पश्चिम बंगाल कहा जाता था में राज्य चुनाव करीब हैं जहां संघ की हलचल तेज हुई है। लेकिन बांग्लादेश से आए परिणाम और हिंदुओं को मंत्री पद मिलने से बंगाल में संघ का कोई जादू नहीं चलने वाला।वैसे भी बंगाल लंबे अर्से से वाम विचारधारा से जुड़ा रहा है ममता बनर्जी भी इससे इत्तेफाक रखती हैं इसलिए यहां संघ की सफलता के बारे में सोचना बेमानी है। बशर्ते आयोग चुनाव निष्पक्ष चुनाव करा पाए।
फिलहाल बंगाल में भाईचारा कायम है। इसलिए इसे वर्तमान केंद्र सरकार नेस्तनाबूद करने में लगी हुई है। बंगाल से लगा हुआ बिहार राज्य में आज भी भाईचारे और सौहार्द की स्थिति बनी हुई है लेकिन नीतीश कुमार और भाजपाई गठबंधन की सरकार ने इसे काफी क्षति पहुंचाई है।
आईए पड़ोसी देश नेपाल में मुस्लिम और पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों की बात कर लें तो वहां की सरकार भी अल्पसंख्यकों के साथ निष्ठुर व्यवहार नहीं करती। वहां की अदालतें भी सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करती हैं।
ये तमाम पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और बांग्लादेश देश तो भारत भूटान ही पूर्ववर्ती हिस्सा हैं। नेपाल तो भारत को ही अपना ही समझता है नेपाली भारत के रक्षक भी रहे हैं। सोचिए जब हमसे निकले और जुड़े सीमावर्ती देशों में भारतीय भाईचारे की मूल भावना की कद्र है तो हमारे देश में इसे कौन ख़त्म कर रहा है सबको मालूम है।
अब आइए एक नज़र डालते हैं अब तक के सबसे बड़े बांध अमेरिका देश की ओर । जहां से हाल ही एपस्टीन फाइल ने जिसे अमरीका की अदालत ने खोला है जिसने तहलका मचा दिया है उसमें वहां के राष्ट्रपतियों,बिल ग्रेट्स जैसे लोगों के फोटो सहित आपराधिक दृश्य सामने आए हैं।अदालत ने उन्हें छुपाया नहीं ,किसी दबाव में नहीं रहे।क्या ऐसी उम्मीद आज भारतीय अदालतों से की जा सकती है। दुखद तो यह है तानाशाह ट्रम्प के रास्ते पर भारत के पीएम भी चल रहे हैं। अमरीकी लोग डोनाल्ड ट्रंप की ख़िलाफ़त का बीड़ा उठाए हुए हैं हमारे देश में ऐसा विरोध कहीं नहीं।क्या झूठ बोलने वाले अमेरिकी निष्पक्ष अदालत को भी झूठ के दायरे में देख रहे हैं।और एक बड़े गुनहगार के साथ अपने गुनाह छुपाने की कोई मुहिम चला रहे हैं क्योंकि वे अतिशीघ्र उसी इज़राइल में जा रहे हैं जहां एपस्टीन ने उन्हें ट्रम्प को खुश रखने नाचने गाने कहा था और काम हो गया था। क्या इस यात्रा में और कुछ बड़ा होने जा रहा है।
बहरहाल,इन तमाम स्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि देश की हालत दुनिया में इस तरह खराब हुई है कि भारत एक बिकाऊ और अमेरिका का गुलाम बनके रह गया है।जबकि भारत देश से बाहर फंसे कई लोग राजनीतिक और और बड़े पदों पर काबिज़ है।
यहां,वर्तमान हालात डरावने हैं किंतु आशा की किरण उन चंद नेताओं, छात्र-छात्राओं ,समाजसेवियों वा पत्रकारों ने जला रखी है कि भारत इन घटनाओं से सबक सीखेगा तथा एक बार फिर अल्लामा इकबाल का सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां बन कर रहेगा।






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