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*डोम समुदाय : इतिहास, आजीविका और सामाजिक संदर्भ*

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– तेजपाल सिंह ‘तेज

डोम समुदाय भारतीय समाज की प्राचीन दलित जातियों में से एक है, जिसका उल्लेख ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक स्रोतों में विभिन्न रूपों में मिलता है। यह समुदाय मुख्यतः उत्तर भारत, पूर्वी भारत और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में पाया जाता है तथा परंपरागत रूप से यायावरी जीवन, कुटीर उद्योग और विशिष्ट सामाजिक दायित्वों से खड़ा रहा है        

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

            डोम शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ इतिहासकार इसे संस्कृत  के “डोम” या “डोम्ब” शब्द से जोड़ते हैं, जिसका प्रयोग प्राचीन ग्रंथों में निम्न श्रेणी के श्रमिक अथवा सेवाकर्मी समुदायों के लिए हुआ है।

प्राचीन साहित्य:

            मनुस्मृति, पुराणों और बौद्ध साहित्य में डोम्ब या डोम जैसे समूहों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें शवदाह, संगीत, नृत्य या शिल्प से जुड़ा माना गया।

·         मध्यकालीन संदर्भ: उत्तर भारत में काशी (वाराणसी), प्रयाग, पटना जैसे शहरों में डोम समुदाय की भूमिका अंतिम संस्कार से जुड़ी परंपराओं में निर्णायक रही।

·         औपनिवेशिक काल: ब्रिटिश शासन के दौरान जनगणनाओं में डोम समुदाय को अलग जाति के रूप में दर्ज किया गया और उन्हें “अछूत” श्रेणी में रखा गया, जिससे सामाजिक भेदभाव और सुदृढ़ हुआ।

2. पारंपरिक आजीविका:

            डोम समुदाय की आजीविका क्षेत्र और काल के अनुसार विविध रही है—

·         बांस और कुटीर उद्योग: बांस से टोकरी, सूप, चटाई, पंखा, डलिया जैसे घरेलू उपयोग के सामान बनाना। यह कार्य खासतौर से ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में प्रचलित रहा।

·         यायावरी जीवन: कई उपसमूह अर्ध-घुमंतू जीवन जीते रहे, काम की उपलब्धता के अनुसार स्थान बदलते रहे।

·         अन्य परंपरागत कार्य: शवदाह कर्म, ढोल-नगाड़ा बजाना, लोकगीत, मेलों-हाटों में श्रम आधारित सेवाएँ।

3. सामाजिक स्थिति और भेदभाव:

            ऐतिहासिक रूप से डोम समुदाय को कठोर सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा।

·         छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार के कारण शिक्षा, भूमि स्वामित्व और सम्मानजनक रोजगार के अवसर सीमित रहे।

·         धार्मिक अनुष्ठानों में उनकी भूमिका अनिवार्य होने के बावजूद उन्हें सामाजिक मान्यता नहीं मिली।

4. आधुनिक काल में परिवर्तन:

स्वतंत्रता के बाद संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत डोम समुदाय को अनुसूचित जाति (SC) में शामिल किया गया।

·         शिक्षा और आरक्षण: शिक्षा और सरकारी सेवाओं में आरक्षण से कुछ हद तक सामाजिक गतिशीलता आई।

·         आजीविका में विविधता: आज डोम समाज के लोग मजदूरी, सरकारी नौकरी, निजी क्षेत्र और स्वरोजगार में भी दिखाई देते हैं, हालांकि बांस-आधारित कुटीर उद्योग अब भी कई परिवारों की आय का आधार है।

·         सांस्कृतिक पहचान: लोक संगीत, शिल्प और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण की कोशिशें कुछ क्षेत्रों में हो रही हैं।

5. निष्कर्ष

डोम समुदाय का इतिहास केवल हाशिये की कथा नहीं, बल्कि भारतीय समाज की जटिल जातिगत संरचना और श्रम-संस्कृति का महत्वपूर्ण अध्याय है। यायावरी जीवन, बांस कुटीर उद्योग और सामाजिक दायित्वों के माध्यम से इस समुदाय ने सदियों तक समाज को सेवाएँ दीं। आज आवश्यकता है कि ऐतिहासिक भेदभाव को समझते हुए शिक्षा, अवसर और सम्मानजनक जीवन की दिशा में ठोस प्रयास किए जाएँ, ताकि डोम समुदाय अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ समानता के आधार पर आगे बढ़ सके।

 

डोम समुदाय : वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाएँ:

 

1. वर्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थिति:

            आज डोम समुदाय भारत के कई राज्यों—उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि—में अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसके बावजूद समुदाय की स्थिति एकरूप नहीं है।

(क) आजीविका की वर्तमान दशा

·         पारंपरिक पेशे संकट में:
बांस आधारित कुटीर उद्योग, शवदाह से जुड़ा कार्य और लोकवाद्य जैसे पेशे अब पर्याप्त आय नहीं दे पा रहे। मशीन-निर्मित वस्तुओं और शहरीकरण ने पारंपरिक बाजार सीमित कर दिया है।

·         असंगठित श्रम में भागीदारी:
बड़ी संख्या में लोग निर्माण श्रमिक, सफाई कर्मी, रिक्शा चालक, खेतिहर मजदूर या मौसमी कामगार के रूप में कार्यरत हैं।

·         कुछ क्षेत्रों में परिवर्तन:
शिक्षा प्राप्त युवा वर्ग अब निजी नौकरियों, स्थानीय व्यवसाय और सीमित संख्या में सरकारी सेवाओं में भी दिखने लगा है।

(ख) शिक्षा और सामाजिक चेतना:

·         साक्षरता दर में वृद्धि हुई है, पर उच्च शिक्षा तक पहुँच अभी भी सीमित है।

·         पहली पीढ़ी के शिक्षित युवाओं में सामाजिक न्याय, अधिकार और आत्मसम्मान को लेकर चेतना बढ़ी है।

·         शहरी क्षेत्रों में जातिगत पहचान अपेक्षाकृत कमजोर हुई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भेदभाव अभी भी मौजूद है।

2. राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति

·         अनुसूचित जाति होने के कारण डोम समुदाय को आरक्षणछात्रवृत्ति और कल्याणकारी योजनाओं का कानूनी अधिकार है।

·         हालांकि जमीनी स्तर पर योजनाओं की पहुँच असमान है—कई परिवार अभी भी इनके लाभ से वंचित हैं।

·         कुछ राज्यों में डोम समाज के नेता पंचायत और स्थानीय निकायों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिससे राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ा है।

3. सांस्कृतिक पहचान का वर्तमान स्वरूप:

·         पारंपरिक लोक संगीत, बांस-शिल्प और समुदाय आधारित ज्ञान लुप्त होने की कगार पर है।

·         नई पीढ़ी आधुनिक जीवन के अनुकूलन में पारंपरिक पहचान से दूरी बना रही है, जो एक ओर आवश्यक सामाजिक परिवर्तन है, पर दूसरी ओर सांस्कृतिक क्षरण का कारण भी बन रहा है।

·         कुछ गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा पारंपरिक शिल्प को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

4. भविष्य की संभावनाएँ:

(क) शिक्षा आधारित उन्नति
            डोम समुदाय का सबसे सशक्त भविष्य-पथ शिक्षा से होकर जाता है।

·         यदि प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट कम हुआ

·         तकनीकी, व्यावसायिक और डिजिटल शिक्षा तक पहुँच बढ़ी
तो समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में निर्णायक परिवर्तन संभव है।

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(ख) कुटीर उद्योग का आधुनिकीकरण:

·         बांस शिल्प को डिज़ाइन, मार्केटिंग और ई-कॉमर्स से जोड़ना

·         सहकारी समितियां और स्वयं सहायता समूह
डोम समुदाय को पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक बाजार से जोड़ सकते हैं।

(ग) सामाजिक सम्मान और पहचान:

·         जातिगत पेशों से जुड़ी “अछूत” की छवि को तोड़ने में समय लगेगा, पर

·         कानूनी संरक्षण, शहरीकरण और सामाजिक संवाद से यह प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है।

5. निष्कर्ष:

            डोम समुदाय का वर्तमान संक्रमणकालीन है—यह परंपरा और आधुनिकता के बीच खड़ा है। एक ओर ऐतिहासिक भेदभाव, आर्थिक असुरक्षा और शैक्षिक पिछड़ापन है, तो दूसरी ओर संवैधानिक अधिकार, बढ़ती चेतना और नई पीढ़ी की आकांक्षाएँ हैं। यदि शिक्षा, कौशल विकास और सांस्कृतिक संरक्षण को समन्वित रूप से आगे बढ़ाया गया, तो डोम समुदाय भविष्य में केवल “पिछड़े वर्ग” की पहचान से बाहर निकलकर आत्मसम्मानस्वावलंबन और सामाजिक समानता का उदाहरण बन सकता है।

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Ramswaroop Mantri

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