शशिकांत गुप्ते
भूली बिसरी यादों को ताज़ा करते हुए सन 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म
अनाड़ी का गीत याद गया।गीतकार शैलेंद्रजी ने यह गीत लिखा है।
सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सच है दुनिया वालों कि हम है अनाड़ी
अनाड़ी का शब्दार्थ भी नादान, अज्ञानी,अकुशल,नासमझ आदि।
मराठी भाषा में अनाड़ी शब्द को अडानी कहतें हैं।अडानी शब्द का अर्थ भी अज्ञानी,अकुशल ही होता है।
मराठी भाषा में ना की जगह डा लिखा जाता है। पिछले सात आठ वर्षों से अडानी शब्द की देश में बहुत गूंज हो रही है। यह शब्द इस कहावत को यथार्थ में बदल रहा है। जब अल्लाह मेहरबान तो ….. भी पहलवान
वैसे तो कहावत वाले मौसेरे भाइयों पर तो अल्लाह की मेहरबानी अनवरत ही रहती है।
होशियार बनने के लिए मानसिक रूप से परिपक्व होना जरूरी है।
मानव में परिपक्वता (Maturity) आने के लिए कोई उम्र निश्चित नहीं है। यदि बढ़ती उम्र से मानव में परिपक्वता आने लग जाती तो, यह मुहवार प्रचलन में नहीं आता, साठ वर्ष की आयु पूर्ण करने पर मानव सठिया जाता है।
बहरहाल उक्त बहस को दरकिनार कर पुराने गाने का लुफ्त उठाते हैं।
गीत की पंक्तिया है।
दुनिया ने कितना समझया
कौन है अपना कौन पराया
,फिर भी हमने भावनाओँ बहकर
झूठे वादों से दिल बहलाया
यह तो खुद ही मर मिटने की
जिद थी हमारी
बाजार में बहुत से कपड़े ऐसे होतें हैं,जो दिखने में बहुत ही आकर्षक लगतें हैं।इन कपड़ों का रंग बहुत ही मनभावन होता है।
लेकिन इसतरह के बहुत से कपड़ों का रंग एक या दो ही धुलाई के बाद उतर जाता है।बहुत से कपड़े तो बदरंगी हो जातें हैं।
ठीक गीत की इन पंक्तियों की तरह,
दिल का चमन उजडते देखा
प्यार का रंग उतरते देखा
हमने हर जीने वाले को
धन दौलत पर मरते देखा
भावनाओं पर मरने वाले
बन रहें हैं सब भिखारी
होशियार बनने के लिए चेहरों को पहचानना जरूरी है।
प्रख्यात शायर स्व.राहत इंदौरीजी का यह शेर मौजु है।
कहकर तो गए थे कि कपड़े बदल कर आतें हैं
लेकिन सब साले चेहरें बदल कर आ गए
इसी आशय को वास्तविकता में बदलती गीत यह पंक्तियां हैं।
असली नकली चेहरें देखें
दिल पर सौ सौ पहरे देखे
जनता के दुखते दिल से पूछो
क्या क्या ख्वाब सुनहरे दिखाए
गीत सुनना भी एक नशा है।लेकिन यह दिल को शुकुन दिलाने वाला नशा है।
इस तारतम्य में सन 1964 में प्रदर्शित फ़िल्म लीडर के गीत की पंक्तियां प्रासंगिक होंगी।यह गीत लिखा है,गीतकार शक़ील बदायुनीजी ने।
मुझे दुनिया वालों शराबी न समझों
नशे कितने प्रकार के होतें यह बात इन पंक्तियों में स्पष्ट होती है।
नशे में हूँ लेकिन,मुझे ये खबर है
के इस जिंदगी में सभी पी रहें हैं
किसी को नशा है जहाँ में खुशी का
किसी को नशा है,गम-ए-जिंदगी का
कोई पी रहा है, लहू आदमी का
हर एक दिल में मस्ती रचाई गई है
जमाने के यारों चलन है निराले
यहाँ तन है हैं उजले,मगर दिल है काले
उक्त बातों को समझने के लिए मनुष्य को होशियार होना जरूरी है।
मानसिक रूप से परिपक्व होना मतलब मानस में सामान्यज्ञान को बढ़ाना और व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त करना होता है।
इसीलिए गीतकार ने लिखा है
सब कुछ सीखा हमनें ना सीखी होशियारी
शशिकांत गुप्ते इंदौर





