अनिल जैन
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के महानायकों में से एक और भारतीय समाजवादी आंदोलन के प्रतीक पुरुष डॉक्टर राममनोहर लोहिया के विचार और दर्शन पर अग्रज बुद्धिजीवी मित्र प्रवीण मल्होत्रा जी Praveen Malhotra का शोध प्रबंध लंबे इंतजार के बाद पुस्तक के रूप में छप कर आया है।
इस शोध पर मल्होत्रा जी को विक्रम विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि तो 1982 में ही प्राप्त हो गई थी लेकिन बाद में यह पुस्तक की शक्ल लेने के लिए इंदौर से भोपाल, ग्वालियर, दिल्ली आदि की सैर करते हुए पता नहीं कहा खो गया था।
इधर मल्होत्रा जी भी मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग से चयनित होकर सरकारी सेवा में व्यस्त हो गए थे। 2015 में वाणिज्यिक कर विभाग के उपायुक्त पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने काफी मशक्कत के बाद विश्वविद्यालय से अपने शोध प्रबंध की प्रति हासिल की और उसमें आंशिक संशोधन/संपादन कर उसे पुस्तक की शक्ल में छपने के लिए भेजा।
इसे विचित्र संयोग ही कहा जाएगा कि लोहिया के समाजवादी दर्शन पर यह पुस्तक ऐसे समय छप कर आई है, जब देश में सत्ताधारी जमात की ओर से एक बार फिर अचानक धर्मनिरपेक्षता के साथ-साथ समाजवाद शब्द को लेकर भी अपनी जाहिलियत से पैदा हुई नफरत उगली जा रही है।
बहरहाल, मल्होत्रा जी के बारे में यह बताना जरूरी है कि उनकी पूरी शिक्षा-दीक्षा समाजवादी परिवेश में रहते हुए हुई है। चूंकि उनके पिताजी श्री रामप्रकाश मल्होत्रा का नाम मध्य प्रदेश में सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में शुमार होता है और वे बड़नगर (उज्जैन) विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी रहे थे, इसलिए बड़नगर में उनके घर पर डॉ. लोहिया, मधु लिमये, मामा बालेश्वर दयाल, जॉर्ज फर्नांडीज, लाडली मोहन निगम जैसे दिग्गज समाजवादी नेताओं का आना होता रहता था। इसी नाते प्रवीण मल्होत्रा भी बचपन से इन नेताओं के संपर्क में रहे और संभवत: इसी वजह से उन्हें लोहिया के समाजवादी चिंतन पर शोध करने की प्रेरणा मिली।
चूंकि मैंने अभी इस पुस्तक को सरसरी तौर पर ही देखा है, जिसके आधार पर इतना ही कह सकता हूं कि यह पुस्तक लोहिया के वैचारिक व्यक्तित्व के साथ ही लोहिया से संबंधित स्वाधीनता आंदोलन और समाजवादी आंदोलन की उल्लेखनीय घटनाओं से भी रूबरू कराती है। पुस्तक पूरी पढ़ने के बाद इस पर विस्तार से लिखूंगा। पुस्तक को बीएफसी पब्लिकेशंस, लखनऊ ने छापा है। पुस्तक फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है ।





