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*राजनीतिक संकट के चलते अब तो बस कांग्रेस से आस*

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          भारत का लोकतंत्र आज एक जटिल मोड़ पर खड़ा है। संस्थागत भरोसा धीरे-धीरे क्षीण होता दिख रहा है, अर्थव्यवस्था अस्थिर संकेत दे रही है, और सामाजिक विभाजन और राजनीतिक ध्रुवीकरण चिंताएँ बढ़ा रहे हैं। ऐसे समय में जनता नई नीतियों और नए नेतृत्व की खोज में है—और कांग्रेस, अपनी लंबी राजनीतिक पारी और संवैधानिक मूल्यों के जुड़ाव की विरासत के कारण, वह दल बनकर उभर रही है जिस पर ‘आस’ टिकती है। लेकिन इस आस को यथार्थ में बदलने के लिए कांग्रेस के सामने अनेक आंचलिक, संगठनात्मक और रणनीतिक चुनौतियां हैं।

          भारत का राजनीतिक परिदृश्य वर्तमान समय में असाधारण उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा है। जहाँ एक ओर सत्ता पक्ष पर लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण, संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी और आर्थिक असमानताओं को बढ़ावा देने के आरोप लग रहे हैं, वहीं विपक्षी दलों की विखंडित स्थिति ने जनमानस में गहरी निराशा उत्पन्न की है। ऐसे समय में कांग्रेस पार्टी, जो स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजादी के बाद तक भारतीय राजनीति की धुरी रही है, पुनः एक बार अपेक्षाओं के केंद्र में आती दिख रही है। सवाल यह है कि क्या यह प्राचीन राजनीतिक धारा वर्तमान संकट की घड़ी में देश को संतुलन और नई दिशा दे पाएगी?

           भारत का लोकतंत्र सदैव से अपनी बहुलता, विविधता और जीवंत बहस के लिए जाना जाता रहा है। परंतु पिछले कुछ वर्षों में यह परिदृश्य एक गहरे राजनीतिक संकट से जूझता दिखाई देता है। संसद की कार्यशैली पर उठते प्रश्न, संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास, और आम जनजीवन में बढ़ते असंतोष ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को एक कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है। ऐसी परिस्थिति में जनता की नजर स्वाभाविक रूप से उस राजनीतिक शक्ति की ओर जाती है, जिसने देश की आजादी से लेकर दशकों तक राष्ट्र-निर्माण की दिशा निर्धारित की—कांग्रेस। आज यह प्रश्न और भी गहरा हो गया है कि क्या कांग्रेस इस संकट से बाहर निकलने में देश को नई ऊर्जा प्रदान कर सकती है?

लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट:

·        भारत का लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संसद की सार्थक बहस, मीडिया की निष्पक्षता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी शामिल हैं। हाल के वर्षों में संसद में विपक्ष को पर्याप्त समय न मिलना, महत्वपूर्ण विधेयकों का बिना गहन चर्चा के पारित होना और पत्रकारिता पर दबाव जैसे मुद्दों ने लोकतांत्रिक संतुलन को गहरा झटका दिया है।

·        कांग्रेस पार्टी, जिसने भारतीय संविधान की रचना और स्थापना के समय अग्रणी भूमिका निभाई थी, स्वाभाविक रूप से इस असंतुलन को संतुलित करने के दायित्व में खड़ी होती है।

आर्थिक असमानता और जनता की पीड़ा

·        महंगाई, बेरोजगारी और कृषि संकट आज की सबसे बड़ी समस्याएँ हैं। बेरोजगारी दर में निरंतर वृद्धि हो रही है; युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं। किसानों की स्थिति लगातार दयनीय बनी हुई है—कर्ज़ का बोझ, उत्पादन लागत और उचित मूल्य का संकट उन्हें आंदोलन की ओर धकेल देता है।

·        कांग्रेस ने अपने शासनकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य, ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) और आर्थिक समावेशन जैसी नीतियों से देश के कमजोर तबकों को सहारा देने का प्रयास किया था। आज भी जनता में यह अपेक्षा बनी हुई है कि वही पार्टी पुनः इन समस्याओं का स्थायी समाधान प्रस्तुत कर सकती है।

सामाजिक समरसता बनाम ध्रुवीकरण

·        भारत की ताकत उसकी बहुलता और विविधता है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, जातिगत राजनीति और विभाजनकारी विमर्श ने समाज की एकजुटता को खतरे में डाल दिया है। राष्ट्रीय एकता और सद्भावना की जगह संकीर्ण पहचान की राजनीति हावी होती दिखाई देती है।

·        कांग्रेस, जिसने सदैव “सेक्युलरिज़्म” और “सर्वधर्म समभाव” को अपनी राजनीति का मूल माना है, ऐसे दौर में एक वैकल्पिक आवाज़ बन सकती है। इसका ऐतिहासिक नारा—“भारत एक है”—आज और अधिक प्रासंगिक हो उठा है।

विपक्षी राजनीति की दुविधा:

·        भले ही कांग्रेस के साथ विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने गठबंधन की दिशा में कदम बढ़ाए हों, लेकिन विपक्ष की बिखरी हुई स्थिति और नेतृत्व का अभाव जनता में संदेह उत्पन्न करता है। क्षेत्रीय दल प्रायः स्थानीय मुद्दों तक सीमित रहते हैं और राष्ट्रीय दृष्टि का अभाव रखते हैं।

·        ऐसे में कांग्रेस ही वह एकमात्र शक्ति है जो पूरे देश में फैले अपने संगठन और ऐतिहासिक जनाधार के कारण विपक्ष को एकजुट कर सकती है। उसकी यह क्षमता, जनता के लिए लोकतंत्र में संतुलन कायम करने का सबसे बड़ा आधार बन सकती है।

 कांग्रेस की चुनौतियां:

हालांकि कांग्रेस पर भी कई गंभीर चुनौतियां हैं—

·        कांग्रेस के सामने चुनौतियां और अवसर

·        चुनौतियाँ

1.    संगठन पुनर्स्थापन:

कांग्रेस को पुराने ज़िलों, बूथ स्तर कार्यकर्ता और स्थानीय नेतृत्व को फिर से सक्रिय करना होगा। कांग्रेस की नेतृत्व संरचना में अक्सर झटके और विभाजन आ चुके हैं। संगठनात्मक ढांचे को पुनर्जीवित करना होगा।

2. युवा मतदाताओं से संवाद:

युवा वर्ग को रोजगार, तकनीकी भविष्य और प्रदेशीय नीति में भागीदारी की भाषा समझनी होगी। ताजा उदाहरण — परीक्षा पेपर लीक-घोटाले (उत्तराखंडUKSSSC) को लेकर राहुल गांधी ने ‘पेपर चोर’ आरोप लगाया। (The Times of India) युवाओं और नए मतदाता वर्ग से सीधा संवाद स्थापित करना

3. गठजोड़ रणनीति और सीट बंटवारा:

INDIA जैसे विपक्षी गठबंधन में भागीदारी के दौरान सीट वितरण, नेतृत्व रेखांकन तथा मतभाव के संतुलन को सही तरह से स्थापित करना होगा।

4. क्षेत्रीय नेतृत्व और स्थानीय कार्यकर्ताओं को मजबूत बनाना

5.     अपनी नीतियों और दृष्टिकोण को समयानुकूल और व्यावहारिक बनाना

यदि कांग्रेस इन बिंदुओं पर ठोस कार्ययोजना लागू करती है तो वह जनता का भरोसा फिर से जीत सकती है।

तथ्यात्मक परिप्रेक्ष्य:

1. लोकतांत्रिक संस्थाओं की चुनौती:

          हाल के वर्षों में संसद की कार्यवाही पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।विपक्ष को पर्याप्त मंच न मिलना, त्वरित विधायी प्रक्रियाएँ और न्यायपालिका व मीडिया की स्वतंत्रता पर संदेहजनक हस्तक्षेप ने लोकतांत्रिक संतुलन को हिलाकर रख दिया है। यह वह बिंदु है जहाँ कांग्रेस का अनुभव और संवैधानिक मूल्यों के प्रति उसकी ऐतिहासिक प्रतिबद्धता जनता को एक विकल्प का आभास कराती है।

2. आर्थिक और सामाजिक असंतुलन:

          बेरोजगारी दर में वृद्धि, महंगाई पर नियंत्रण की कमी, तथा कृषि क्षेत्र में बढ़ते संकट ने जनता के असंतोष को और गहरा किया है। सामाजिक स्तर पर ध्रुवीकरण और विभाजनकारी राजनीति से राष्ट्रीय एकता की भावना पर भी असर पड़ा है। कांग्रेस परंपरागत रूप से ‘सामाजिक न्याय’ और ‘समावेशी विकास’ की बात करती रही है, जिससे लोग उसमें उम्मीद खोजने लगते हैं।

3. विपक्षी खेमे का बिखराव:

          यद्यपि कांग्रेस के साथ कई क्षेत्रीय दलों का गठबंधन बनने की संभावनाएं बनी रहती हैं, लेकिन उनकी अस्थिरता और परस्पर मतभेदों के कारण जनता में भरोसा कमज़ोर रहा है। फिर भी, राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व देने में कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके पास देशव्यापी नेटवर्क और ऐतिहासिक जनाधार मौजूद है।

4. राजनीतिक पुनर्निर्माण की आवश्यकता:

          कांग्रेस के सामने भी कई चुनौतियां हैं—संगठनात्मक ढाँचे को सुदृढ़ करना, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और युवाओं को जोड़ना। किन्तु यदि वह इन पहलुओं पर ठोस कदम उठाती है तो जनता का विश्वास पुनः अर्जित किया जा सकता है।

5. देश की वर्तमान राजनीतिक-आर्थिक सच्चाइयाँ:

लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता पर चिंताएं

·        Freedom in the World 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत की Political Rights स्कोर 31 में से 40 और Civil Liberties स्कोर 32 में से 60 आंका गया है, और इसे “Partly Free” श्रेणी में रखा गया है। Freedom House

·        एक लेख Why India’s Democracy Is Dying में यह कहा गया है कि भारत लोकतांत्रिक पतन की ओर बढ़ रहा है—सामन्य तौर पर विधायी विलंब, विपक्ष पर दबाव, मीडिया पर नियंत्रण और कार्यकारी शक्तियों का केंद्रीकरण इसका स्वरूप हैं। Journal of Democracy

·        हाल की एक विवादित विधेयक पेशकश — जिसमें किसी मंत्री (मुख्यमंत्री सहित) को यदि 30 लगातार दिन जेल में रहने की स्थिति हो जाए, पद से हटाया जा सके — इसे विपक्षी दलों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रतिकूल कदम कहा है। The Diplomat

·        The Waqf (Amendment) Act, 2025 को लेकर पूरे देश में मुस्लिम समुदायों और विपक्षी दलों ने विरोध जताया है, इसे धार्मिक संपत्तियों में राज्य हस्तक्षेप और धार्मिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में हस्तक्षेप माना गया। Wikipedia

          ये तथ्य इस रेखा को मजबूती देते हैं कि लोकतंत्र की संस्थाएं आज दबाव में हैं—और जनता को ऐसा राजनीतिक विकल्प चाहिए जो इन मूल्यों की रक्षा का वादा कर सके।

6. आर्थिक संकटबेरोज़गारी और असमानता:

·        सरकार द्वारा प्रकाशित बेरोज़गारी दर 5.6% (जून 2025 तक) बताई जाती है। (Reuters+1)

·        लेकिन 50 अर्थशास्त्रियों के एक Reuters सर्वेक्षण में 37 ने कहा कि यह दर वास्तविकता को छुपाती है और उन्होंने अनुमान लगाया कि बेरोजगारी दर कहीं 7% या उससे अधिक हो सकती है। (Reuters+1)

·        Policy Circle का विश्लेषण कहता है कि भारत का आधिकारिक बेरोजगारी आंकड़ा “underemployment” (कम-उपयोग) और स्वरोजगार को पकड़ने में असमर्थ है, और वास्तविक समस्या को छुपाता है। Policy Circle

·        कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि केंद्र की नीतियाँ “आर्थिक तबाही” की ओर ले जा रही हैं, और यह कि केन्द्र राज्यों को GST मुआवजा देने में पक्षपात कर रहा है। The Economic Times

·        Congress cites CAG report के अनुसार, राज्यों का ऋण बढ़ा है—2013 में लगभग ₹17.57 लाख करोड़ से बढ़कर 2022 में ₹59.60 लाख करोड़ तक। कांग्रेस ने इसे “coercive federalism” (बलात् केंद्रवाद) कहा है। (The Times of India)

·        अर्थशास्त्रियों ने यह भी तर्क दिया है कि सार्वजनिक आंकड़ों की सीमित विवरणात्मकता (उदाहरण के लिए, “यदि किसी ने सप्ताह में एक घंटे भी काम किया हो, उसे ‘नौकरी’ माना जाता है”) मुख्य समस्या है। (The Wire+1)

          ये संकेत यह दिखाते हैं कि आर्थिक विकास की कहानियाँ और वास्तविक जीवन की पीड़ा के बीच बड़ी खाई बन चुकी है।

7. राजनीतिक घटनाएँ और अस्थिरता:

·        2025 दिल्ली विधानसभा चुनाव: दिल्ली में 5 फरवरी 2025 को हुए चुनाव में बीजेपी ने 70 में से 48 सीटें जीतीं, और आम आदमी पार्टी (AAP) 22 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस इस चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई। Wikipedia

·        2025 छत्तीसगढ़ स्थानीय चुनाव: 11 फरवरी 2025 को हुए स्थानीय निकाय चुनावों में BJP ने 173 निकायों में से 126 पर विजय पाई, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 30 निकायों में सफलता मिली। Wikipedia

·        2024 बिहार राजनीतिक संकट: जनवरी 2024 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक INDIA (विपक्षी गठबंधन) छोड़कर NDA से हाथ मिला लिया। उन्होंने महागठबंधन की “कार्यप्रणाली दोष” और कांग्रेस नेतृत्व को स्थिरता न दे पाने का दोषी ठहराया। Wikipedia

·        भारत–पाकिस्तान तनाव भी चरम पर रहा। मई 2025 में भारत ने पाकिस्तान पर मिसाइल हमला किया, जिसे भारत ने आतंकी ठिकानों पर हमला करार दिया, और पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की। संघर्ष चार दिनों तक चला, और 10 मई को संघर्ष विराम हुआ। Congress.gov+1

·        विपक्षी दलों को लेकर भी कई प्रश्नल उपस्थित हैं—नेतृत्व चयन में विलंब, संगठनात्मक कमजोरियाँ, वोट शेयर व सीट-आधारित रणनीतिक विवाद। उदाहरण के लिए :- हरियाणा में कांग्रेस को CLP (Congress Legislature Party) नेतृत्व चुनने में एक वर्ष लग गया, और भाजपा ने इसे कांग्रेस की “आंतरिक भ्रम” कहा। The Times of India

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि राजनीतिक जमीन पर अस्थिरता और नेतृत्व छवि संकट दिनों दिन बढ़ रहा है।

4.     नीतिगत स्पष्टता और नवोन्मेष:

सरकार की आलोचना पर्याप्त नहीं—वैकल्पिक नीति पेश करना ज़रूरी है। आर्थिक मॉडल, सामाजिक नीतियाँ और संवैधानिक सिद्धांतों पर स्पष्ट होनी चाहिए।

अवसर

·        कांग्रेस को यह इतिहास है कि वह संवैधानिक लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्ष राजनीति की धुरी रही है। इससे उसे एक विशिष्ट विपरीत नजरिया पेश करने का अवसर मिलता है।

·        विपक्षी खेमे का वर्तमान बिखराव कांग्रेस को मध्य की धुरी बनकर सबको जोड़ने का अवसर देता है—यदि वह सही रणनीति और समावेशी नेतृत्व दिखा पाए।

·        जनता में ‘बहुत निकट विकल्प’ की तलाश है—जो केवल आलोचना नहीं, बल्कि समाधान प्रस्तुत करे। कांग्रेस यदि ठोस रोडमैप और भरोसेमंद नेतृत्व दिखा सके, तो वह उस आस की हकदार बन सकती है।

          भारत जिस राजनीतिक-आर्थिक विसंगति और लोकतांत्रिक चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है,   वह एक सीधी चेतावनी है कि अब केवल संस्थागत मजबूती, नीतिगत स्पष्टता और  समावेशी  राजनीति से ही संकट टलेगा। वर्तमान की राजनीति में जनता न केवल आलोचना सुनना चाहती है, बल्कि नये अभियान, विश्वसनीय नेतृत्व, और व्यावहारिक नीतियाँ चाहती है। कांग्रेस के पास इस अपेक्षा को पूरा करने का अद्वितीय अवसर है—यदि वह अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर, संगठन को सशक्त कर और जनतांत्रिक संवाद को केंद्र में रखे।     यदि कांग्रेस इस समय संज्ञानात्मक निबद्धता, नवोन्मेषी योजनाएं और समावेशी दृष्टिकोण लेकर आगे बढ़े, तो वह सिर्फ विपक्ष की केंद्रीय धुरी नहीं बनेगी, बल्कि उस बदलाव की मजबूत उम्मीद बन सकती है, जिससे भारतीय लोकतंत्र पुनः ऊर्जा और मान्यता प्राप्त कर सके।

          देश जिस भीषण राजनीतिक संकट से गुजर रहा है, उसमें लोकतांत्रिक मूल्य, आर्थिक न्याय और सामाजिक सौहार्द तीनों ही बिंदु संकटग्रस्त हो चुके हैं। जनता ऐसे में स्थिर, अनुभवी और राष्ट्रीय स्तर पर सक्षम विकल्प की खोज कर रही है। कांग्रेस पार्टी, अपनी ऐतिहासिक भूमिका और राष्ट्रीय उपस्थिति के चलते, इन अपेक्षाओं का केंद्र बनती है। यह सही समय है जब कांग्रेस को न केवल विपक्षी राजनीति में मजबूती दिखानी होगी बल्कि स्वयं को एक सशक्त विकल्प के रूप में स्थापित कर देश को लोकतांत्रिक पुनर्जागरण की दिशा में ले जाना होगा।          उसमें जनता का विश्वास डगमगाने लगा है। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, आर्थिक असमानताओं का समाधान और सामाजिक एकता की पुनर्स्थापना अब राष्ट्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है।इस कठिन दौर में स्वाभाविक रूप से लोगों की नज़र कांग्रेस पर जाती है—उस ऐतिहासिक पार्टी पर जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलाई, संविधान को जन्म दिया और दशकों तक विकास की दिशा तय की।

          आज यदि कांग्रेस आत्मचिंतन कर, संगठन को पुनर्जीवित कर, और जनता की वास्तविक समस्याओं पर ठोस कार्यक्रम प्रस्तुत करती है तो वह न केवल विपक्ष की धुरी बनेगी बल्कि देश के लोकतांत्रिक भविष्य को सुरक्षित करने की केंद्रीय शक्ति भी साबित हो सकती है।

Ramswaroop Mantri

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