ग्वालियर किले में स्थित अस्सी खंभा बावड़ी पहले एक मंदिर था। इस मंदिर का निर्माण तोमर वंश के शासकों ने करवाया था। राजा मान सिंह तोमर की आठ रानियां यहां पूजा करती थीं, जिन्हें जहांगीर ने कैदखाना में बदल दिया।
ग्वालियर : ग्वाल ऋषि के नाम पर बसे शहर ग्वालियर का अतीत सुनहरा रहा है। ग्वालियर किले पर आज भी इतिहास की अनगिनत कहानियां जीवित हैं। राजा सूरज सेन पाल ने ग्वालियर को बसाया था। कई राजाओं ने अपने अलग-अलग कार्यकाल में ग्वालियर किले को बनाया। मगर मुगल आक्रांताओं ने यहां की निशानियों को मिटाने की कोशिश की है। साथ ही किले पर मुगलों ने कब्जा कर उसे अपने तरीके से इस्तेमाल किया। तोमर वंश के शासकों के शासन काल में इस किले का खूब वैभव रहा है। मुगल शासक जहांगीर ने उनके द्वारा बनवाए गए मंदिरों को तहस-नहस कर दिया।
राजा मान सिंह के शासन काल में ग्वालियर का स्वर्ण युग
दरअसल, ग्वालियर में 15वीं शताब्दी के अंत से लेकर 16वीं शताब्दी की शुरुआत तक तोमर शासकों का शासन रहा है। ग्वालियर फोर्ट का भव्य निर्माण उनके समय में ही हुआ है। उनका शासन 1486 ईस्वी से लेकर 1516 ईस्वी तक रहा है। इसी दौरान ग्वालियर की सबसे ऊंची पहाड़ी पर भव्य महल का निर्माण करवाया था। वह आज भी मौजूद है। तोमर वंश के शासक राजा मान सिंह तोमर ने नौ शादियां की थीं। आठ रानियां उनके साथ महल में रहती थीं। वहीं, नौवीं रानी मृगनयनी किले के नीचे बने एक महल में रहती थी। इस महला में रानी के लिए राजा नदी से सीधा पाइप लाइन डलवाकर पानी लाए थे।
मंदिर में पूजा करती थीं रानियां
डूगरेन सिंह तोमर ने अपने शासन काल के दौरान महल के पास ही मंदिर का निर्माण करवाया था। वहीं, डूगरेन सिंह तोमर, राजा मान सिंह तोमर के दादा थे। इस मंदिर में राजा मान सिंह तोमर की आठ रानियां पूजा पाठ करती थीं। अस्सी खंभों पर बने इस मंदिर की खूबसूरती आज भी मौजूद है। मगर अब इसमें पूजा पाठ नहीं होता है। न ही इस मंदिर में अब भगवान की कोई प्रतिमा है। अब इसकी पहचान अस्सी खंभा की बावड़ी के रूप में है।
जहांगीर ने बना दिया जेल
मुगलों ने किले पर जब कब्जा जमाया तो मुगल शासक जहांगीर ने आगे चलकर इस मंदिर को जेल में तब्दील कर दिया। साथ ही मंदिर में स्थापित शिवलिंग को तोड़ा नहीं और किली की दीवार के पास रख दिया। इसके बाद मंदिर का मुख्य द्वार पूरब दिशा की ओर था। मुगल शासक ने इस द्वार पर दीवार खड़ा करवा दिया। साथ ही दरवाजा नॉर्थ की तरफ बनवा दिया। आज भी वह दरवाजा मौजूद है। साथ ही इस पर इंडो-इस्लामिक आर्किटेक्ट की झलक दिखती है।

मंदिर का शिवलिंग आज भी मौजूद
वहीं, सिंधिया वंश के पहले राजा को किले की दीवार के पास शिवलिंग मिला। उस शिवलिंग को किले के नीचे एक मंदिर में स्थापित किया गया, जहां पूजा अर्चना की जाने लगी। उस मंदिर का नाम कोटेश्वर महादेव मंदिर है। कोटेश्वर महादेव नाम इसलिए पड़ा कि किले की दीवार को कोट कहते हैं। जानकार बताते हैं कि कोट के पास ईश्वर मिले, इसलिए कोटेश्वर महादेव नाम पड़ा।

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सिखों से छठे गुरु हरगोविंद को रखा कैद
किले परिसर में मौजूद एक गाइड ने बताया कि जहांगीर से इस मंदिर को कैदखाने में तब्दील कर दिया था। उसने देश के 52 राजाओं समेत सिखों के छठे गुरु हरगोविंद सिंह को भी यहां कैद रखा। जहांगीर की पत्नी नूरजहां के दखल के बाद गुरु हरगोविंद सिंह की रिहाई हुई थी। बाद में उन्होंने जहांगीर के सामने शर्त रख दिया था कि हम अकेले नहीं जाएंगे। बाकी अन्य राजाओं को भी साथ में छोड़ना होगा। जहांगीर ने भी उनके सामने शर्त रखी। उस शर्त को मानने के बाद सभी की रिहाई हुई।





