-निर्मल कुमार शर्मा,
अभी पिछले दिनों हिन्दी दिवस के मौके पर बहुत से लेखकों,पत्रकारों,साहित्यकारों, संपादकों की तरफ से,दृश्य और प्रिंट मिडिया में बहुत बड़े-बड़े व्याख्यान दिए गए,लेख लिखे गए तथा सम्पादकीय लिखे गए,जिसमें एक तरफ भारत में हिन्दी की दुर्दशा,उसकी दीन-हीन अवस्था,असहाय,कमजोर और गंवारों की भाषा होने का रूदन रोया गया और दूसरी तरफ अंग्रेजी भाषा के लिए तमाम तरह के कसीदे पढ़े गये यथा यह एक अभिजात्य वर्ग की भाषा है,यह रोजगारपरक भाषा है,यह भारतीय यूनिवर्सिटीज, इस देश के उच्च शिक्षा संस्थानों,इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई जानेवाली भाषा है,यह बड़े-बड़े ब्यूरोक्रेट्स द्वारा बोली जाने वाली भाषा है,यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बोली जाने वाली एक अतिप्रतिष्ठित भाषा है,अंग्रेजी के बगैर हमारा काम ही नहीं चल सकता ! यह उच्चतम् न्यायालय और देश के तमाम उच्च न्यायालयों के जजों तथा वकीलों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है,क्योंकि ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों की गुलामी से मुक्त होने के 74 साल बाद आज भी भारत के न्यायालयों में चल रहे मुकदमों में बहस हिन्दी और भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में न होकर प्रायः इस देश में डेढ़ से दो प्रतिशत ठीक से बोलने,लिखने व समझने वालों की भाषा अंग्रेजी में ही होती है ! भारतीय न्यायालयों द्वारा दिए जाने वाले निर्णय भी लिखित में अंग्रेजी भाषा में ही होते हैं,आदि-आदि बहुत से तर्क और कुतर्क गढ़े गए,दिए गये !
सबसे पहले तो यह स्पष्ट हो जानी चाहिए कि किसी भी देश का वास्तविक और सच्चा साहित्य,नाटक,उपन्यास,लेख,कहानी और व्यंग्य आदि किसी प्रसाशनिक कार्य के लिए नहीं होता है अपितु वह तो वहाँ के समाज में आमजन,मजदूरों, कर्मचारियों,किसानों के साथ घटित हो रहे वर्गीय भेदभावपूर्ण कृत्यों,अत्याचारों,बर्बरताओं, विद्रूपताओं,अंधविश्वासों,पाखंडभरे कुकृत्यों,आदि मानवीयता और एक सभ्य समाज की गरिमा को कलंकित करनेवाले कुकृत्यों और समाजविरोधी कदमों को समाज के सामने सशक्त ढंग से रखने का ही एक माध्यम मात्र होता है। किसी भी गरीब देश और समाज द्वारा बोली जाने वाली भाषा भी अशक्त और कमजोर होती है, उदाहरणार्थ पिछली सदी में ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा शोषित व गुलाम भारत की गरीब जनता द्वारा बोली जानेवाली भाषा हिन्दी गँवारों,गरीबों, गाँवों और असभ्यों की भाषा कहलाने को आज भी अभिशापित है,लेकिन दूसरी तरफ ताकतवर और कभी सूर्य अस्त न होनेवाले ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों और उसके मानसिक तौर पर गुलामों द्वारा बोली जानेवाली अंग्रेजी भाषा ब्रिटिशसाम्राज्यवाद के लगभग पतन हो जाने के बावजूद अभी भी दुनियाभर में अपनी परचम फहरा रही है,क्योंकि ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों की जगह ताकतवर अमेरिकीसाम्राज्यवादियों की भाषा अब अंग्रेजी है ।
इसलिए जब तक कोई देश,वहाँ के रहनेवाले लोग और वहाँ का समाज समृद्धशाली और ताकतवर नहीं होता है,तब तक उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा भी शक्तिशाली और समृद्ध नहीं हो सकती है। उदाहरणार्थ 19 वीं सदी में गरीबी से त्रस्त रूस में फ्रेंच भाषा बोलनेवालों को ही अभिजात्य और बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था,ठीक वैसे ही जैसे आज भारत में मैकाले के सिद्धांत के अनुसार देखने में भारतीय पर मानसिक तौर पर अंग्रेज़ी भाषा, रहनसहन और वैचारिकता के मानसिक गुलाम केवल अंग्रेजी बोल लेनेवाले निहायत मूर्ख को भी बहुत सम्मान और आदर की दृष्टि से देखते हैं,लेकिन सोवियत क्रांति के बाद ब्लादिमीर इल्यीच उल्यानोव लेनिन जैसे आमजनहितैषी, सशक्त,कर्मठ और किसानों,मजदूरों के मसीहा के हाथों में रूस मतलब यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक के राष्ट्रपति के तौर पर सत्ता उनके हाथों आई,तब से उनकी आमजनकल्याणकारी नीतियों के बदौलत 19 सदी का वही अत्यंत गरीब और जर्जर देश रूस दुनिया की एक महाशक्ति के रूप में उठ खड़ा हुआ,वहाँ के मजदूरों, किसानों और आमजन की आर्थिक और सामाजिक जीवन स्तर में स्तरीय सुधार हुआ,उसके बाद दुनियाभर में वही रूसी भाषा बहुत सम्मान की दृष्टि से देखी जाने लगी, रूस में और दुनियाभर में भी रूसी बोलनेवाले अब हिकारत भरी नजरों से नहीं,अपितु सम्मान की दृष्टि से देखे जाने लगे ! आज रूसी भाषा पूरे राजकीय सम्मान के साथ सार्वजनिक स्वीकार्यता के साथ संपूर्ण रूस की राजकीय,शासकीय, एकेडमिक व बोलचाल की भाषा के रूप में अत्यंत गौरवान्वित व सम्मानित भाषा है ! इसलिए भारत में भी अब एक ऐसे सबल,मजबूत, ईमानदार,कर्मठ,देशभक्त,आमजनकल्याणकारी और आमजनहितैषी नीतियों को ईमानदारी और कर्मठता से लागू करनेवाले किसी मन-वचन और कर्म से ईमानदारी से काम करनेवाले नेता की सख्त और शीघ्र जरूरत है,जुमलेबाज,झूठे,दो पूँजीपतियों के हितरक्षक और संपूर्ण देश की आवाम के हितरक्षण के विरूद्ध अनैतिक कार्य करने वाले जैसे फॉसिस्ट,असहिष्णु, क्रूर और बर्बर व्यवहार करनेवाले छद्म प्रधानजनसेवक नेता यह काम कतई नहीं कर सकता ! हमें ऐसा नेता चाहिए जो इस देश के सभी साधारण और आमजन लोगों,मजदूरों,किसानों,कर्मचारियों, आम व्यापारियों,छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों,दिहाड़ी मजदूरों,टैक्सी,टेम्पो,ट्रक ड्राइवरों आदि सभी को आर्थिक तौर पर स्थिति में गुणात्मक सुधार लाकर इस देश को दुनिया के एक अत्यंत सबल व शक्तिशाली राष्ट्रों की श्रेणी में ला दे,उस स्थिति में अंग्रेजी,चीनी भाषा के बाद तीसरे स्थान पर बोली जाने वाली हिन्दी भाषा स्वतः ही एक सशक्त भाषा हो जाएगी,उस स्थिति में हिन्दी को सशक्त भाषा बनाने के लिए हिन्दी दिवस,हिन्दी सप्ताह,गोष्ठियाँ और सेमिनार करने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ेगी !
-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र





