मंजुल भारद्वाज
धर्म क्या है? क्या धर्म सत्य है, न्याय है, मानवता है, इंसानियत है, ईश्वर है? धर्म अगर सत्य है तो उसके अनुयायियों में झूठ का बोलबाला क्यों है? धर्म विकारों का उन्मूलन है तो उसके अनुयायियों में नफ़रत, हिंसा, द्वेष, क्लेश क्यों हैं? धर्म न्याय है तो धर्म में भेदभाव क्यों स्वीकार्य है? अन्याय धर्म के अनुयायियों की धारणा क्यों है? धर्म इंसानियत है तो धर्म के नाम पर इंसान का क़त्ल क्यों होता है? धर्म ईश्वर है तो अलग-अलग धर्म क्यों? उनमें श्रेष्ठता का संघर्ष क्यों? छूत-अछूत क्यों? ऊंच-नीच क्यों? अमीर-गरीब क्यों? ईश्वर के सामने तो सब समान होते हैं, तो फिर असमानता का बोलबाला क्यों?
क्या धर्म अन्यायपूर्ण सत्ता नहीं है? क्या धर्म न्याय को नकारने का षड्यंत्र नहीं है? मनुष्य सत्ता पर बैठे और अपनी नाकामी को एक अदृश्य कल्पना के नाम लिखकर मुक्त हो जाए। मनुष्य की अपनी नाकामी को ईश्वर के नाम लिखना ही पाखंड है। अन्याय, हिंसा, शोषण को ढंकने का एक दिव्य वाक्य है- “यह तो ईश्वर की इच्छा है!” बिना ईश्वर के पत्ता भी नहीं हिलता! जो करता है वह ईश्वर करता है तो मनुष्य क्या करता है? क्या ईश्वर की इच्छा है कि मासूमों का, महिलाओं का बलात्कार हो? ईश्वर का नाम लेकर बलात्कार करने के लिए भीड़ को भड़काया जाए। क्या यह ईश्वर की इच्छा है?
क्या यह ईश्वर की इच्छा है कि पूरे देश की सम्पत्ति पर दो-तीन लोगों का कब्ज़ा हो? 10 फ़ीसदी लोगों के पास ऐयाशी के सारे संसाधन मौजूद हों और 90 फ़ीसदी लोग एक-एक दाने के लिए तरसते रहें। भूखे मर जाएं। क्या यह ईश्वर की इच्छा है? क्या यह ईश्वर की इच्छा है कि मनुष्य जानवर का मूत्र पिये और मनुष्य को अछूत माने?
धर्म मनुष्य की सबसे बड़ी विभीषिका है जिसके होने से ही मनुष्य होने की संकल्पना समाप्त हो जाती है। मनुष्य के स्वतंत्र, प्राकृतिक, विविध अस्तित्व को नेस्तानाबूद करने का मार्ग है धर्म। धर्म दरअसल सत्ता के वर्चस्व का ख़ूनी कारनामा है। जब से धर्म ने पैर पसारे तब से अब तक के इतिहास को देख लीजिये! वह सत्ता के लिए मनुष्य के क़त्ल-ओ-ग़ारत का इतिहास है और आज भी जारी है।
धर्म और ईश्वर एक दूसरे का पर्याय बने हुए हैं। ईश्वर के नाम पर लूट के बड़े-बड़े धार्मिक स्थल बने हुए हैं जो भक्तों को संकट से मुक्ति दिलाने के लिए उगाही करते हैं जिसे दान-दक्षिणा का नाम दिया जाता है। विडम्बना देखिये कि इन लूट के अड्डों पर भीड़ लगी रहती है। भगदड़ में भीड़ मारी जाती है। मनुष्य को मनुष्य अपने पैरों से रौंद डालता है पर कहीं कोई दोषी नहीं ठहराया जाता। ग़रीबों की, भिखारियों की लम्बी कतारें चंद टुकड़ों के लिए हमेशा लगी रहती है आज की अदालतों की तरह, पर न भूख मिटती है, न कष्ट दूर होते हैं। सदियों से शोषण की चक्की में भीड़ पिसती रहती है। भीड़ शोषण को अपना भाग्य समझती है पर कभी भी लूट के अड्डों पर सवाल खड़ा नहीं करती। लूट के अड्डों को खत्म नहीं करती, उल्टा उसे मजबूत बनाती है और जैसे ईश्वर रखे उस हाल में रहकर जीवन गुजार देती है क्योंकि धर्म आस्था के अंधे कुएं में धकेल मनुष्य की तर्क बुद्धि को नष्ट कर देती है।
धर्म और ईश्वर के नाम पर सत्ता चलाने वाले अपनी सत्ता पर मंडराते ख़तरे को धर्म का ख़तरा बताते हैं। ‘धर्म ख़तरे में है’ का भ्रम भीड़ में फ़ैलाते हैं। भय और भ्रम पैदा कर दंगा करवाते हैं, युद्ध करवाते हैं। हज़ारों, लाखों लोगों को मरवाकर अपनी सत्ता बचाते हैं और मरने-मारने वाली भीड़ धर्म की रक्षा में खपकर धन्य हो जाती है पर यह कभी नहीं सोचती कि जो ख़तरे में पड़ जाए वह धर्म कहां?
धर्म-सत्ता के वर्चस्ववाद का यह खेल सदियों से जारी है। शोषण के इस अनंतकालीन चक्र का शिक्षित, अशिक्षित या विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। उल्टा, अपने आप को शिक्षित व आधुनिक कहने वाली दुनिया ज्यादा पाखंडी है। ज्यादा अंधश्रद्धा, अंधविश्वास के झेरे में फंसी हुई है। विज्ञान का जाप, खोज करने वाले वैज्ञानिक भी धार्मिक सत्ता के लुटेरों जैसे हैं। दुनिया के अमीरों के पैसे पर शोध करते हैं, सबसे सुंदर नारियों को भोगते हैं और शोध का फ़ार्मूला सत्ताधीशों को देते हैं। सत्ताधीश उससे परमाणु बम बना इंसानों को ज़िन्दा भस्म करते हैं। नोबेल से लेकर आइंस्टाइन तक कोई जवाबदारी नहीं लेता। बड़ा गुणगान किया जाता है दवाइयों का। आज विज्ञान की तकनीक से निर्मित दवाइयों से लूट का कारोबार दुनिया में चल रहा है सरे आम; और कोई आवाज़ नहीं उठाता एक वैज्ञानिक जवाबदेही नहीं लेता। कंप्यूटर युग भी धर्म की पोल नहीं खोल पाया। उल्टा, उसके प्रचार का माध्यम बन गया है। वैज्ञानिक आज तक ईश्वर के रहस्य का पर्दाफ़ाश नहीं कर पाए। इसके विपरीत वे ईश्वर की भक्ति में लीन होकर मिसाइल बनाते हैं और सत्ता पर बैठ जाते हैं।
पूरी दुनिया में सत्ता के समीकरण बदल गए। राजतंत्र से लोकतंत्र तक आ गई दुनिया लेकिन वह ईश्वर और धर्म से मुक्ति नहीं पा सकी। आज भी चुना हुआ सत्ताधीश ईश्वर के नाम पर शपथ लेता है। ईश्वर के नाम पर शपथ लेकर युद्ध करता है, शोषण करता है और ईश्वर उसे नहीं रोकता। ईश्वर हो तो रोके?
मेरी कविता है-
मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ!
साम, दाम, दंड, भेद से प्राप्त
सत्ता पर बैठने वाला
हरेक सत्ताधीश
सत्ता पर बैठने से पहले
ईश्वर की शपथ लेता है
विधि, विधान, संविधान के अनुसार
जनकल्याण का उदघोष करता है
ईश्वर का अर्थ है
ई ईमान
स सत्य
व विवेक
र रहम
सत्ता पर बैठते ही सत्ताधीश
ईमान को दरबार के
बाहर टांग देते हैं
सत्य और विवेक को
वनवास भेज देते हैं
रहम को अपनी सत्ता से
हर पल रौंदकर
जनता को भयाक्रांत करते हैं
ईश्वर के नाम पर
यह पाखंड सदियों से
आज तक चलता आया है
ना ईश्वर अपने होने को
सिद्ध करता है
बार बार डंका बजता है
पाखंडी सत्ताधीश का
ना जनता मनुष्य होने का
अधिकार सुनिश्चित करती है
पाखंडी सत्ता के नगाड़ों के शोर से
अंधे गह्वर में
सत्य और विवेक
वनवास काटते हैं !
धर्म सत्ता के गिरोहबाज़ सारी दुनिया में अलग-अलग धार्मिक पद्धतियों से अपना कारबार चलाते हैं। ये पद्धतियां भौगोलिक स्थिति और मौसम से तय होती हैं, पर सत्ताधीश कट्टरवाद का ऐसा तड़का लगाते हैं कि भीड़ अलग भूभाग में भी इन पद्धतियों के लिए लड़ मरती हैं।
धर्मनिरपेक्ष संविधान सम्मत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को ध्वस्त करने के लिए धार्मिक स्थल को देश की आस्था और अस्मिता बनाकर कर देश में धार्मिक उन्माद फैलाया जाता है। संविधान की रक्षा करने वाली अदालत पत्थर को प्रतिवादी मान धार्मिक स्थल बनाने का निर्णय देती है और कोई उस पर सवाल नहीं उठाता।





