पुष्पा गुप्ता (शिक्षिका)
_मैं कौन हूँ ? इसी प्रश्न का उत्तर जन्म-जन्मांतनर से मनुष्य खोजता आ रहा है। जिस दिन हमें यह उत्तर अनुभूति द्वारा मिल गया, उसी दिन मै यह जान सकता हूँ “अहं ब्रह्मा S अस्मि” “तत्वमसि” या “सोSहम”।_
इन तीनों महावाक्यों को अपने अस्तित्व के साथ चरितार्थ करने के लिये हम अनादि काल से प्रयत्न करते आये हैं और न जाने कब तक प्रयत्न करते रहेंगे। जब हमारे सारे साधनात्मक प्रयत्न पूर्ण हो जाएंगे और ईश्वर की कृपा होगी, तभी हम जान सकेंगे कि मैं कौन हूँ ?
क्योंकि तब “अहं ब्रह्मा Sअस्मि” “तत्त्वमसि” या “सो$हम” –ये सारे महावाक्य हमारे अस्तित्व के साथ चरितार्थ चुके होंगे। मेरे भीतर ईश्वर की समस्त शक्तियां, प्रकृति की सभी शक्तियां आ चुकी होंगी।
मैं ब्रह्मा भी हो सकूंगा, मैं विष्णु भी हो सकूंगा औऱ मैं महेश भी हो सकूंगा। क्योंकि ये तीनों पद हैं और ब्रह्मांड की समस्त चीजों और व्यक्तित्यों के साथ एक दिन महाप्रलय में ये भी लय हो जाएंगे। प्रकृति ब्रह्म में लीन हो जाएगी। बचेगा केवल एकमात्र ब्रह्म जो न कभी जन्म लेता है और न मरता है। वह अजन्मा है, वह ही एकमात्र अमर है।
यह सही है कि मानव ही ब्रह्माण्ड का ऐसा प्राणी है जिसके पास आत्मा के साथ से सयुंक्त “मन” है। अगर मन न हो तो मानव का अस्तित्व ही न हो। मैं मनुष्य इसलिए हूँ क्योंकि मैं मनु की संतान हूँ। और व्यक्ति इसलिए कहलाता हूँ क्योंकि मैं ही अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व को व्यक्त कर सकता हूँ, चाहे भाव के द्वारा, चाहे विचार के द्वारा या फिर कर्म के द्वारा।
रही आदमी की बात तो इस शब्द को नाहक ही जोड़ दिया है “आदि शब्द से। क्योंकि आदि शब्द संस्कृत का है और आदमी “आदम” शब्द से जुड़ा आदम और हब्बा प्रथम पुरुष और स्त्री थे –स्लामिक दृष्टिकोण से।
यह सत्य है कि हम निरन्तर अपना विकास कर रहे हैं और सभी श्रेष्ठ योनियों में मनुष्य योनि में हूँ।
इसका मतलब यह नहीं है कि अपने भीतर अहंकार उत्पन्न कर लें। हम ईश्वर के एक अंशमात्र के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। मनुष्य की विकास यात्रा में लकड़ी की गाड़ी से लेकर परमाणु बम, कंप्यूटर तक का निर्माण आज सामने आ गया–इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम सबके रचयिता हो गए।
हम सर्जक हो गए। हां, हम एक ब्रह्मा, विष्णु, और महेश की पदवी को उपलब्ध हो सकते हैं जब हमारे भीतर ऎसा सामर्थ्य उत्पन्न हो जाएगा।
जहां तक स्वयंभू होने की बात है, यह सर्वतः गलत है, स्वयंभू मात्र ब्रह्म है।
मैं आदरणीय शाण्डिल्य के विचारों से 90 % सहमत हूँ।
जहां तक “एकोS हम द्वितीयो नास्ति” की बात है, वह तभी चरितार्थ हो सकती है जब ईश्वर की प्रभुता हमारे भीतर आ जायेगी। हम प्रभु की तरह सामर्थ्यवान हो जाएंगे। और बाग महोदय धर्म को उपन्यास मानते हैं।
स्व-धर्म जानने की चीज है, समझने की चीज है। अपने भीतर उत्पन्न करने की चीज है। अपनी प्रगति कीजिये, अपने अंदर विकास कीजिये तब धर्म की बात करना।![]()





